चर्चा है कि स्टैनिकजई अफगानिस्तान के विदेश मंत्री होंगे। उनका भारतीय पृष्ठभूमि भारत के विदेश मंत्रालय के लिए एक छोटी सी राहत की बात हो सकती है। स्टैनिकजई लगातार संदेश दे रहे हैं कि भारत से उनके शासन का रिश्ता अच्छा रहेगा और भारत जिस तरह से अफगानिस्तान के विकास में व्यस्त था, वैसे वह भी आगे रहे। भारत ने अभी तक उस पर बहुत जोश नहीं दिखाया है और वह स्वाभाविक भी है, क्योंकि तालिबान का शासन कैसा होगा, इसके बारे में स्थिति कुछ दिन या कुछ महीने बाद ही स्पष्ट होगी।

अफगानिस्तान का तालिबानी शासन कैसा होगा, यह वहां का आंतरिक मामला है। इसमें भारत कुछ कर नहीं सकता, लेकिन उससे कैसा रिश्ता वह रखेगा, वह यह तो तय कर ही सकता है। भारत खुद एक लोकतांत्रिक देश है और समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों मे विश्वास रखता है। इसलिए इसी तरह के मूल्य रखने वाले देश भारत के सहज स्वाभाविक दोस्त होते हैं, लेकिन क्या अफगानिस्तान में स्वतंत्रता और समता का अधिकार लोगों को मिलेगा? इस सवाल का जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं है। तालिबान के नेता आधिकारिक तौर पर कह रहे हैं कि अब वे बदल गए हैं और 1996 के बाद के 5 सालों तक उन्होंने जैसा शासन किया, वैसा अब वे नहीं करेंगे। उस समय महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक ही नहीं, बल्कि दोयम दर्जे के व्यक्ति के रूप में भी रखा गया। लड़कियों को पढ़ने नहीं दिया जाता था। महिलाओं को घर से बाहर काम करने की इजाजत नहीं थी। महिलाएं परिवार के किसी पुरुष सदस्य के साथ के बिना घर से बाहर नहीं जा सकती थी और अपने परिवार के पुरुष सदस्य के साथ होने के बावजूद, उन्हें ऊपर से नीचे तक बुर्कों से ढके रहना पड़ता था।

तालिबान के प्रवक्ता अब कह रहे हैं कि लड़कियां पढ़ सकती हैं और महिलाएं घर के बाहर काम भी कर सकती हैं, लेकिन उन्हें यह सब शरिया के दायरे में रहकर करना होगा। अब शरिया क्या है, इसके बारे में खुद सभी मुसलमानों में एक राय नहीं है। मुसलमानों के जितने फिर्के हैं, उन सबका शरिया अलग अलग है। तालिबान का शरिया अलग है और इस्लामिक स्टेट का शरिया अलग। भारत का शरिया अलग है, तो पाकिस्तान का शरिया अलग। तालिबान के शरिया का राज दुनिया 5 सालों तक देख चुकी है। अब उनका कोई नया शरिया होगा या वही पुराना होगा, यह देखा जाना अभी बाकी है।

महिलाओं को गुलाम बनाकर रखना यह एक मुद्दा तो भारत के लिए भी है, लेकिन इसके लिए चिंता की बात यह भी है कि क्या अफगानिस्तान एक बार फिर आतंकवादियों की शरणस्थली बनेगा। भारत आतंकवाद एक बड़ा शिकार रहा है और कश्मीर में अभी भी आतंकवादी गतिविधियां जारी हैं और उनमें शामिल दो दुर्दांत संगठन लश्कर-ए-तैयब और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन तालिबान के नजदीकी रहे हैं। कहा जाता है कि उन दोनों संगठनों के आतंकवादी भी तालिबान के साथ मिलकर वहां अमेरिका और उससे समर्थित सरकार से लड़ रहे थे। अलकायदा संगठन भी कश्मीर को आजाद करने की बात करता है। सवाल उठता है कि क्या तालिबान इन संगठनों को अफगानिस्तान की भूमि का इस्तेमाल संरक्षण देने के लिए करेगा या नहीं।

अभी तो वह यही कह रहा है कि भारत में किसी प्रकार की आतंकवादी गतिविधियों को उसका कोई समर्थन नहीं होगा। वह पाकिस्तान और भारत के मामलों से भी अलग रहने की बात कर रहा है, लेकिन दुनिया जानती है कि तालिबान पाकिस्तान का ही बच्चा है। पाकिस्तान में आए अफगानी शरणार्थियों के बच्चों को प्रशिक्षित कर रही पाकिस्तान ने तालिबान खड़ा किया। इस बार यहां तक कहा जा रहा है कि अनेक पाकिस्तानी सैनिक तालिबान के रूप में अफगानिस्तान में सक्रिय थे और तालिबान को बिजली की तेजी से जो जीत मिली, उसके पीछे पाकिस्तानी सैनिक रणनीतिकारों का हाथ था। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान की उपज तालिबान पाकिस्तानी प्रभाव से बाहर निकल पाएंगे। यदि इसका जवाब हां है, तो मानना पड़ेगा कि भारत को तालिबान से कोई नुकसान नहीं है, लेकिन इस सवाल का सही जवाब अभी निकाल पाना असंभव है। तालिबान के प्रवक्ता क्या कह रहे हैं, उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। वे कह रहे हैं कि अमेरिका और नाटो को समर्थन करने वाले लोगों को उन्होंने माफ कर दिया है, लेकिन जमीनी खबरें कुछ और ही कहती हैं। अपने कई विरोधियों की तालिबानियों से हत्या कर दी है और पत्र लिखलिख कर उन्हें अपनी अदालत में वे उन्हें बुला भी रहे हैं। नहीं आने पर उन्हें जान से मार देने की घमकी भी दे रहे हैं। यह सब वैसे समय में हो रहा है, जब तालिबान ने अपनी सरकार का ढंग से गठन भी नहीं किया ळें

जाहिर है, स्थिति बिल्कुल अस्पष्ट है और जबतक स्थिति अस्पष्ट है, तबतक हम तालिबान को शंका की दृष्टि से ही देखेंगे। उन पर तभी विश्वास किया जा सकता, जब उनकी सरकार सही तरीके से गठित होगी और अमीर के फरमान जारी होने शुरू होंगे। अभी तक तो अमीर ने कोई फरमान जारी ही नहीं किया है। गौरतलब है कि तालिबान के अमीर हैब्बातुल्ला अखंडजादा हैं, जिन्होंने अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई बयान जारी नहीं किया है। उनके प्रवक्ता जो कह रहे हैं, वह अखंडजादा की रणनीति का हिस्सा है, या वास्तव में ईमानदार बयान, इसके बारे में पता तो तभी चलेगा, जब अखंडजादा अपना मुह खालेंगे। बहरहाल, भारत को अभी इंतजार करना होगा और अपने सारे कदम फूंक फूंक कर रखने होंगे। (संवाद)