26 नवंबर, 1949 को हमारा संविधान अपनाया गया था। लेकिन इसे देश के साथ जोड़ना और लागू करना एक कठिन काम था, जिसे समय चाहिये था। हमारा विकास राष्ट्र, संस्कृति की विविधताओं को एक तार में बांधना संभव होने तक 26 जनवरी का दिन आ गया, यह 1950 की शुरूआत थी जब भारत को जनता द्वारा, जनता के लिये, जनता का ही जनवाद घोषित किया गया, अर्थात देश की संपूर्ण शक्ति, अब ‘‘गणतंत्र दिवस’’ के रूप में मनाने की शुरूआत हो गई। भारतीय जनता, अपनी सारी विविधता के साथ, अपनी सरकार को चुनने का अधिकार रखने लगीं। लेकिन इस आजादी में, आज वास्तविकता कितनी रह गई है? हम अपनी अर्थव्यवस्था, जो हमारे जनवादी समाज की रीढ़ है, की ही पहले चर्चा करते हैं।
हमारी अर्थव्यवस्था आज असत्य के कोहरे में लिपटी है। इन असत्यों में सबसे पहले यह आता है कि भारत विश्व का तीव्रतम गति से विकासशील देश है। इस असत्य के पीछे का सत्य यह है कि जब जी.डी.पी. का पतन निम्नतम स्तर पर पहुंच जाता है तो कोई भी परिवर्तन, उन गहरी खाईयों से उठता कोई भी कदम उम्मीदों के रंगीन भविष्य का द्वार खोल देता है। जितनी ही गहरी खाई होगी कदम उतना ही ऊपर उठता नजर आता है, और इसे स्वर्णिम करना आसान हो जाता है।
एनएसओ के पहले एडवांस इस्टीमेट में, जिसे 2021-22 की राष्ट्रीय आय के लिये, जनवरी,7 को देश के सामने प्रस्तुत किया गया, इस पर सरकारी वक्तव्य में जो कुछ स्पष्ट किया गया, वह था निश्चित कीमतों के आधार पर 2021-22 में जो जीडी.पी. का विकास ;9.2 प्रतिशतद्ध दिखाया गया, वह 2020-21 के -7.3 प्रतिशत की बुनियाद पर था, जो एक भयानक पतन का द्योतक थी। सरकार का लक्ष्य था 7.2 को हटाकर 2019-2020 के 1.9 प्रतिशत को ही सामने लाया जाय और इस तरह अर्थव्यवस्था की लगातार उन्नति को सामने रखा जाय, विशेषकर आज के चुनाव के दौर में। विभिन्न राज्यों में, जिनमें शामिल हैं मणिपुर और गोवा भी। अर्थव्यवस्था की यह गिरावट सत्ता में काबिज पार्टी के लिये अच्छा नहीं था। और इसलिये इसे परतों में लपेटकर रखने की जरूरत सरकार को महसूस हो रही थी। लोभ का मीठा स्वाद तिक्त होने में बहुत समय नहीं लेता।
यह तो सिर्फ शुरूआत है। बर्बादी का दायरा विस्तृत भी है और इसकी गहराई भी अब स्पष्ट होती जा रही है। सार्वजनिक क्षेत्र कॉरपोरेट घरानों के हाथों बिकते जा रहे हैं, जिन्हें न निवेश में दिलचस्पी है, न ही उन्हें चलाने में। वे सिर्फ धन चाहते हैं, और वह भी कम से कम खर्च पर। औद्योगिक विकास उनके दृष्टि क्षेत्र में नहीं आता, उत्पादन भी नहीं, इसलिये जनकल्याण के लिये कदम उठाना तो बस उनके लिये कोरी कल्पना है। रेलवे, हवाई अड्डे, सार्वजनिक क्षेत्र के विशाल उत्पादन केंद्रों में पैसे की कमी के कारण व्यवस्था चरमराती जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उत्पादन का स्तर 1.4 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। खुदरा कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। नवंबर में यह 4.9 प्रतिशत थी, एक महीने बाद दिसंबर में यह 5.6 प्रतिशत हो गई। शहरी इलाकों में कीमतें 5.8 प्रतिशत पर हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मुद्रास्फीति 5.36 तक पहुंच चुकी है। चुनाव नजदीक होने के कारण थोड़ी नरमी भी बरती जा रही है, और पेट्रोल, डीजल की कीमतें स्थिर हैं। रोजगार के स्रोत सूखते जा रहे हैं। रोजगार के अवसर भी कम हो रहे हैं।
सी.एम.आई.ई. के ऑंकड़ों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में रोजगार की दर 8.5 प्रतिशत पर पहुंच गयी है और बेकारी 6.74 प्रतिशत पर। रोजगार के अवसर घटते जा रहे हैं, वेतन न्यूनतम से भी काफी कम मिलता है, साथ ही सबकुछ अस्थायी है। काम के घंटे असीमित हैं, और श्रम कानून मालिकों के स्वार्थ के अनुसार संशोधित कर दिये गये हैं।
महिलाओं और बच्चों की स्थिति सबसे भयानक है। इन्हें हर तरह से शोषित किया जाता है। बच्चों में विकास अवरूद्ध है क्योंकि बुनियादी जरूरत की चीजों की कीमतें भी दुर्लभ हैं, दूध, तेल इत्यादि तो दूर की चीजें, चावल और दाल भी अलभ्य हो गए हैं। इस सबके साथ ही शिक्षा व्यवस्था भी बिखरती जा रही है। शहरों के गरीब इलाकों में और ग्रामीण क्षेत्रों में पल रहे बच्चों में निरक्षरता बढ़ती जा रही है। पिछले दो सालों में उन्हें कोई पाठ नहीं पढ़ाया गया। महिलाओं के लिये बहुत कम रोजगार के अवसर बचे हैं और समान काम के लिये उन्हें पुरूषों से कम वेतन मिलता है।
आर्थिक सुरक्षा के साथ ही देश में जनता की अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिये। संविधान में हमें यह आजादी प्रदान की गई है। हम रोजगार, स्वास्थ्य, बेहतर शिक्षा के लिये मांग कर सकते हैं। अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने की भी हमें आजादी मिली हुई है। लेकिन आज तो इंसान को जीवन पर, अपनी पंरपराओं पर भी भयानक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सांप्रदायिक नफरत, अल्पसंख्यकों पर, उनकी संस्कृति पर हर तरह के हमले हो रहे हैं, ज्वलंत भाषणों से उन्हें पीड़ित तो कर ही रहे हैं, देश को अपनी सारी विरासत को भूल जाने के लिये मजबूर किया जा रहा है।
यह भारत तो हमारे राष्ट्रगीत के भारत से कोई समानता नहीं रखता। (संवाद)
संकट में है भारत का संविधान
शिक्षा व्यवस्था भी बिखरती जा रही है
कृष्णा झा - 2022-01-22 10:42
भारत इस सदी की आज तक की सबसे भयानक त्रासदी से गुजर रहा है। महामारी के भयानक साये में जहां लाखों जानें जा रही हैं, वहीं हमारा जनतांत्रिक समाज भी चुनौतियों से गुजर रहा है। हमारी डेमोक्रसी जिस नींव पर खड़ी है, वह है हमारा संविधान, जो आज सम्मान की जगह व्यंगों का शिकार है। इसकी प्रस्तावना, इसकी धाराएं आज उपहास के दर्द से गुजर रही है। व्यर्थता की कगार पर आज यह आ चुका है, जहां जनता की आवाज, उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी दॉंव पर लगी है। भूख की आह, जीविका की कमी, और अंत में जीवन सभी हाशिये पर हैं। लोगों की पहचान सिर्फ संप्रदाय, जाति और लिंग के आधार पर होती है इसमें प्रत्येक अपनी विभाजनकारी भूमिका में आज सक्रिय है। समाज टुकड़ों में है और हमारी बहुलता आज खतरे में है। सारे इलाके बंटे हुए हैं, रिहायशी क्षेत्र बंटे हुए हैं, हर घर एक गहरे दर्द से गुजर रहा है, क्योंकि लोग वहां इंसान की तरह नहीं, बल्कि महिला और पुरूष के रूप में रहते हैं, दोनों की जगह बंटी हुई है, आजादी की सीमा भी निश्चित कर दी गई है। इंसान में इंसानियत होना अब एक पुरानी धारणा है।