पटना के बाद विपक्ष के दूसरे महासम्मेलन के महत्व को लेकर प्रधान मंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष जेपीनड्डा ने सार्वजनिक तौर पर जो कुछ भी कहा, उससे लगता है कि भाजपा नेतृत्व बौखला गया है। भाजपा के चुनावी चार्ट पर भारत के निर्णयों के प्रभाव का आकलन करने के लिए सभी स्तरों पर कवायद शुरू हो गयी है, जिसे नवीनतम घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर अद्यतन किया जा रहा है।

राज्य विधानसभा चुनावों से चार महीने पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में राजनीतिक मूड के बारे में चुनाव विश्लेषकों द्वारा हाल ही में बताये गये रुझानों से भगवाधारी चिंतित हैं।इन तीन राज्यों में, लोकसभा की कुल सीटें 65 हैं। इन 65 सीटों में से, 2019 के आम चुनावों में, भाजपा को आश्चर्यजनक रूप से 61 सीटें मिलीं थीं, जबकि कांग्रेस को मात्र 3 सीटें ही मिल पायी थीं।

अब भाजपा और कांग्रेस दोनों द्वारा किये गये गहन प्रचार के बारे में आ रही रपटों से संकेत मिलता है कि कांग्रेस राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की तुलना में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है।सिर्फ मध्य प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कांग्रेस नेता कमल नाथ से आगे हैं, लेकिन इस राज्य में भी अंतर कम होता जा रहा है। कांग्रेस की बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने सिंधिया वंशज ज्योतिरादित्य के प्रभाव वाले विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी सफलता हासिल की है।

तीनों राज्यों में कांग्रेस संगठन सक्रिय हैं और कमल नाथ, शिवराज को पद से हटाने के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं। यह लक्ष्य संभावित के दायरे में आता दिख रहा है।तीन राज्यों की विधानसभाओं में भाजपा की संभावित हार से निश्चित रूप से कांग्रेस को बड़ी ताकत मिलेगी। विपक्षी मोर्चा इंडिया में सहयोगियों के बीच भी व्यवहार में परिपक्वता के संकेत दिख रहे हैं।

कांग्रेस सितंबर से पहले से ही पश्चिम तक भारत जोड़ो यात्रा के दूसरे चरण की योजना बना रही है।यह दूसरे चरण की नयी यात्रा बड़े पैमाने पर महाराष्ट्र और गुजरात को कवर करेगी।2024 के लोकसभा चुनावों के लिए दोनों राज्य भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हैं।2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपाको गुजरात में 26 में से 26 और महाराष्ट्र में कुल 48 में से 23 सीटें मिली थीं। भाजपा गुजरात में ज्यादा सीटें गंवाना बर्दाश्त नहीं कर सकती। लेकिन ऐसी संभावना आगामी गुजरात यात्रा के बाद 2024 के चुनाव में पैदा हो सकती है। लगभग तीन दशकों से भाजपा शासन में रहे राज्य में सत्ता विरोधी लहर बढ़ रही है।

बेंगलुरु सम्मेलन में निर्णय के तहत कांग्रेस और आप के बीच संभावित सीट-बंटवारे की व्यवस्था एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी, जिसके परिणामस्वरूप भाजपा की सीटें गंभीर रूप से कम हो सकती हैं।अगर यह सहमति बन जाती है तो कांग्रेस और आप दोनों के लिए गुजरात में जीत की स्थिति होगी।हालाँकि, भाजपा इस विपक्षी सीट-बंटवारे की व्यवस्था के लिए इंतजार नहीं कर सकती है, जिससे गुजरात से लोकसभा में भगवा पार्टी के कुल प्रभुत्व को खतरा हो।

यही हाल उत्तर प्रदेश का भी है, जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं। 2019 के चुनाव में भाजपा को 62 सीटें मिली थीं जहां समाजवादी पार्टी उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी है। सपा ने बेंगलुरू सम्मेलन में भाग लिया और वह इंडिया मोर्चे का हिस्सा है।कांग्रेस और सपादोनों पार्टियों की अपनी-अपनी ताकत को लेकर यहां बड़ी समस्या है।कांग्रेस को उम्मीद है कि उसे दलितों और मुस्लिमों का अपना समर्थन आधार एक बार फिर वापस मिल रहा है। सपा और कांग्रेस दोनों ही बसपा के गृह क्षेत्र से दलितों पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। इंडिया गठबंधन के दोनों साझेदारों के बीच राज्य में हितों का टकराव भी है।लेकिन फिर भी लोकसभा चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के बीच सीटों का बंटवारा सुनिश्चित करने की कोशिशें शुरू कर दी गयी हैं। यह समय लेने वाला और बाधाओं से भरी होगी।लेकिन अगर यह सफल होती है तो इससे भाजपा की उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा सीटें पाने की महत्वाकांक्षा को बड़ा झटका लगेगा।

अन्य हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा को 2024 को लोकसभा चुनावों में भारी नुकसान होने की उम्मीद है। उत्तर प्रदेश में भाजपा हार का जोखिम नहीं उठा सकती, इसलिए उसके लिए इंडिया गठबंधन को अपने सीट-बंटवारे के फॉर्मूले को सफल बनाने की अनुमति देना घातक है,जिसे फलीभूत होने में अभी कई महीने लगेंगे।

कुछ भाजपा विशेषज्ञों का मानना है कि समय जीत या हार का सार है और इंडिया गठबंधन को एकजुट होने और अपने 'संकल्प' को लागू करने की स्थिति में नहीं रहने देना चाहिए।भाजपा के थिंक टैंक के अनुसार, आने वाले दिनों में इंडिया गठबंधन को केवल लाभ ही होगा और इसलिए उसे अपना कार्यक्रम पूरा करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।पीएम मोदी को सही समय आने पर इंडिया गठबंधन पर हमला करना होगा, ऐसी उनकी सोच है।

2004 में, प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अचानक निर्धारित समय सितंबर-अक्टूबर सेपहले अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव की घोषणा की थी, भाजपा के 'इंडिया शाइनिंग' के जादू के तहत।हालाकिंवाजपेयी हार गये,जिससे कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी नेताओं को भी आश्चर्य हुआ।1999 में कारगिल युद्ध में जीत के कुछ ही महीने बाद प्रधानमंत्री वाजपेयी ने लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी थी जिसका फायदा एनडीए और भाजपा को मिला था।

2019 में लोकसभा चुनाव तय समय पर हुए। उस साल फरवरी से पहले कोई बड़ी लहर नहीं थी। लेकिन फरवरी में पुलावामा में सामूहिक हमला और बालाकोट हमला हुआ।कुछ सप्ताह बाद हुए लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने आम नागरिकों की राष्ट्रवादी भावनाओं का फायदा उठाया।अभी, यदि लोकसभा चुनाव निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार होते हैं, तो यह 2024 में अप्रैल और मई होंगे।

2019 में, लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में हुए थे। परिणाम 23 मई को घोषित किये गये थे। भाजपा को 303 सीटें मिलीं, जो पार्टी के इतिहास में अभूतपूर्व है।नरेंद्र मोदी एक बार फिर भाजपा समर्थकों के चहेते बन गये। अप्रैल-मई 2024 में निर्धारित लोकसभा चुनाव में आठ महीने बचे हैं। अमित शाह के साथ एनडीए के मास्टर रणनीतिकारपीएम कौन केनये तुरुप का इक्का अपने सीने से लगाए बैठे हैं?क्या वे इंडिया गठबंधन को बिना किसी बाधा के ताकत हासिल करने दे सकते हैं?यह भारतीय राजनीति के लाख टके का सवाल है कि अगला लोकसभा चुनाव कब और कैसा होगा।(संवाद)