लेकिन मुख्यसचिव मुख्यमंत्री से आदेश लेते हैं। और उस समय मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह थे। जाहिर है अर्जुन सिंह ने ही उन्हें छोड़ने के लिए कहा था। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि अर्जुन सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर मुख्य सचिव को वैसा करने के लिए कहा होगा। और राजीव गांधी पर अमेरिका की ओर से उसके लिए दबाव पड़ा होगा।
मुख्य सचिव तो अब इस दुनिया में नहीं ही हैं, राजीव गांधी भी अब हमारे बीच में नहीं हैं। अर्जुन सिंह कुछ बता सकते हैं, लेकिन उन्होंने मौन व्रत धारण कर रखा है। अमेरिका में उस समय रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति थे। उनकी तरफ अथवा उनके प्रशासन की तरफ से भारत सरकार के ऊपर कोई दबाव था या नहीं, यह तो अमेरिका बताने से रहा।
एंडरसन की रिहाई को लेकर कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने विवाद की शुरुआत की। उन्होंने कह दिया कि विदेशी दबाव मे एंडरसन को छोड़ा गया था। उस समय श्री सिंह अर्जुन मंत्रिमंडल में शामिल थे। उनका इस तरह का बयान दोष को अर्जुन के सिर से हटाकर राजीव गांधी के सिर पर डालने वाला था, क्योंकि विदेशी दबाव सीधे किसी राज्य सरकार पर तो नहीं पड़ सकता, बल्कि वह केन्द्र सरकार के माध्यम से ही आ सकता है।
जब से राजीव गांधी का नाम इस विवाद में आया है, कांग्रेस के लोग उनकी प्रतिष्ठा बचाने के प्रयास में जुट गए हैं। राजीव गांधी सोनिया गांधी के पति थे और राहुल गांधी के पिता। इसलिए इस मामले में उन्हें बचाना कांग्रेस और केन्द्र सरकार दोनों के लिए पहली प्राथमिकता है। कांग्रेस चाह रही है कि अर्जुन सिंह सारा दोष अपने सिर पर ले लें। अर्जुन सिंह फिलहाल राजनैतिक वनवास भुगत रहे हैं। कांग्रेस के सत्ता प्रतिष्ठान से उन्हें अलग थलग कर दिया गया है। इसलिए उनसे कांग्रेस सह उम्मीद नहीं कर सकती कि वे सारा दोष अपने सिर पर मुफ्त में ले लेंगे। हांष् यदि वे अपने सिर पर दोष लेते भी हैं, तो वे इसकी कीमत वसूल करना चाहेंगे।
सारे घटनाक्रम ने अर्जुन सिंह के विरोधियों को मौका दिया है कि वे श्री सिंह पर हावी हो जाएं। सत्यव्रत चतुर्वेदी उनके घनघोर विरोधी हैं। वे अर्जुन सिंह पर दबाव बना रहे हैं कि वे सच सच बताएं कि आखिर उन्होंने एंडरसन को छोड़ने के लिए क्यों कहा था। अर्जुन सिंह का कोई भी जवाब उ्रन्हें परेशानी में डाल सकता है। यदि वे सारा दोष अपने सिप पर ले लेते हैं, तो लोग उनके खिलाफ हो जाएंगे और एंडरसन को देश से भगाने का मुकदमा भी उनके ऊपर चल सकता है। और यदि वे राजीव गाधी पर इसका दोष डालते हैं तो उनकी कांग्रेस से हमेशा के लिए छुट्टी हो जाएगी। इस तरह दोनों सूरत में वे मारे जाते हैं। उनकी इसी लाचारी का फायदा सत्यव्रत चतुर्वेदी ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी भी उठाना चाह रहे हैं।
दूसरी तरफ भाजपा में भी इसके कारण अंदरूनी कलह सतह पर आ गया है। बाबूलाल मुख्यमंत्री रह चुके हैं। फिलहाल वे एक मंत्री हैं और भोपाल गैस पीड़ितों से जुड़ा महकमा भी उन्हीं के पास है। उन्होंने भोपाल गैस पीड़ितों की उपेक्षा का आरोप 1991 के बाद की सभी केन्द्र सरकारों पर लगा दिया। उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी गै पीड़ितों के साथ मानवता नहीं दिखाई। वाजपेयी और आडवाणी पर तो उन्होंने निजी आरोप लगाए कि बार बार भोपाल गैय त्रासदी की याद दिलाने पर भी उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगा। हालांकि बाद में बाबूलाल गौर ने लीपापोती की है, लेकिन उससे उन्होंने जो कहा वह झुठलाया नहीं जा सका है।
कांग्रेस और भाजपा के अंदर छिड़े घमासान के बीच सबकी नजर पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पर है। सब यह जानना चाहते हैं कि आखिर उनका क्या कहना है, लेकिन अजु्न सिंह चुप हैं और कहने के लिए उचित मौके की तलाश कर रहे हैं। (संवाद)
गैस हादसे ने सभी दलों को विभाजित किया
सबकी नजर अब अर्जुन सिंह पर
एल एस हरदेनिया - 2010-06-21 11:33
भोपालः भोपाल हादसे पर आए अदालती फैसले के बाद राज्य की राजनीति में उफान आ गया है और दोनों मुख्य पार्टियों का अंदरूनी कलह सतह पर आ गया है। फैसला देते हुए माननीय न्यायाधीश ने कहा था कि यूनियन कार्बाइड के तत्कालीन अध्यक्ष एंडरसन को तत्कालीन मुख्य सचिव ब्रह्मस्वरूप के आदेश पर रिहा कर दिया गया था। ब्रह्मस्वरूप अब इस देनिय में नहीं हैं, इसलिए वे यह नहीं बता सकते कि उन्होंने वैसा क्यों किया था।