रक्षा मंत्रालय की महत्तवाकांक्षी परियोजना, रोहतांग सुरंग पर 28 जून से काम शुरू होते ही ये सब कुछ बदलने वाला। इस सुरंग की बदौलत बर्फ की चादर से ढके रोहतांग दर्रे में हर मौसम में इस्तेमाल किया जा सकने वाला सड़क संपर्क कायम हो सकेगा। रक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाले अंतर-सेवा संगठन (आईएसओ), सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को अपने 50 वर्षों के गौरवषाली इतिहास का सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य रोहतांग सुरंग की खुदाई का काम सौंपा गया है।

युगांतकारी निर्माण

8.8 किलोमीटर की यह रोहतांग सुरंग स्विट्जरलैंड की आल्प्स पहाड़ियों में जल्द ही बनकर तैयार होने जा रही 57 किलोमीटर लंबी गोटहार्ड बेस रेल सुरंग के सामने बौनी रहेगी। इतना ही नहीं, 3,053 मीटर से लेकर 3,080 मीटर की ऊंचाइयों के बीच बनने वाली रोहतांग सुरंग, चीन की फेंगहुषान रेल सुरंग के मुकाबले सबसे ऊंची सुरंग भी नहीं होगी। फेंगहुषान रेल सुरंग, चीन की शिंघाई-तिब्बत रेलवे लाइन का हिस्सा है जो 4,905 मीटर (16,093 फुट) की ऊंचाई पर वर्ष 2002 में बनकर तैयार हुई। तो भला ऐसी कौन सी खासियत है, जो रोहतांग सुरंग को एक अनूठा इंजीनियरिंग चमत्कार बना रही है? उत्तर है -इसकी मुख्य विषेषता इसकी लंबाई और ऊंचाई का मिश्रण है। वर्ष 2015 में बनकर तैयार होने वाली रोहतांग सुरंग, इस ऊंचाई पर बनने वाली दुनिया की सबसे लंबी सुरंग होगी। यह दरअसल 2,500 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर दुनिया भर के किसी भी हिस्से में बनी लंबी सुरंगों से भी कहीं ज्यादा लंबी होगी। मसलन, तुलनात्मक रूप से रोहतांग सुरंग (लंबाई 8.802 किलोमीटर, ऊंचाई 3,080 मीटर), तजाकिस्तान की अंज़ोब रोड सुरंग (लंबाई 5 किलोमीटर, ऊंचाई 3,372 मीटर), ब्रिाटेन द्वारा 1891 में पाकिस्तान में क्वेटा के निकट बनवाई गई खोजक रेल सुरंग (लंबाई 3.9 किलोमीटर, ऊंचाई 3,912 मीटर ) और अमेरिका की आइजेनहॉवर स्मारक सुरंग (लंबाई-2.731 किलोमीटर, ऊंचाई 3,401 मीटर ) या फिर ऊंचाई के मामले में फेंगहुषान रेल सुरंग लंबाई 1.338 किलोमीटर, ऊंचाई 4,905 मीटर ) और पेरू की ला गेलेरा रेल सुरंग (लंबाई 1.177 किलोमीटर, ऊंचाई 4,781 मीटर ) के करीब है।

भारत में रेल/सड़क सुंरगें

इसी तरह रोहतांग सुरंग की पहचान भारत की सबसे लंबी रेल/सड़क सुंरग के रूप में भी नहीं है, यह गौरव तो जम्मू-कष्मीर के बनिहाल में जल्द ही बनकर तैयार होने वाली 10.96 किलोमीटर लंबी पीर पंजाल रेल सुरंग को हासिल होगा। अगले बरस बनकर तैयार होने वाली यह सुरंग जम्मू-श्रीनगर रेल लाइन का हिस्सा होगी, हालांकि बनिहाल सुरंग बहुत कम ऊंचाई पर होगी। इसकी-अधिकतम ऊंचाई 2,200 मीटर और औसत ऊंचाई 1,750 मीटर है। देष की अब तक की सबसे लंबी सुरंग, 6.5 किलोमीटर की लंबाई वाली करबुड सुरंग है, जो महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में है। यह कोंकण रेल नेटवर्क का हिस्सा है लेकिन पष्चिमी घाट पर स्थित होने की वजह से इसकी ऊंचाई नाममात्र की और महज 50 फुट से भी कम है। भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंग 2.8 किलोमीटर की लंबाई वाली जवाहर सुरंग है। बनिहाल में 2,209 मीटर की ऊंचाई पर, वर्ष 1956 में बनकर तैयार हुई इस सुरंग के दोनों ओर दोहरी ट्यूब सुरंगे हैं, जो इसे अनूठा बनाती है।

राजीव गांधी के दिमाग़ की उपज

रोहतांग सुरंग की परिकल्पना पहले-पहल 1983 में, सामरिक जरूरतें पूरी करने के लिए मनाली-सारचू-लेह मार्ग को हर मौसम में इस्तेमाल करने लायक बनाने के रूप में की गई थी। शुरूआती अध्ययन 1984 में भारतीय भू-सर्वेक्षण विभाग (जीएसआई) और मनाली स्थित हिम एवं हिमस्खलन प्रतिष्ठान (एसएएसई) ने कराया था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मूल परिकल्पना, महत्त्वाकांक्षी रोहतांग सुरंग के लिए विस्तृत संभावनाओं के अध्ययन को मंजूरी 14 जनवरी 1987 में राजीव गांधी की ही अध्यक्षता में हुई एक बैठक में दी गई। यह तय किया गया कि सबसे पहले वास्तविक सुरंग स्थल तक पहुंचने के लिए मार्ग का निर्माण किया जाए। सुरंग के दक्षिणी द्वार से मनाली की ओर इस मार्ग की लंबाई 14.84 किलोमीटर तथा चंद्रा नदी पर मनाली-सारचू मार्ग को 78.7 किलोमीटर पर जोड़ने वाले सुरंग के निकास स्थल, उत्तरी द्वार तक 0.94 किलोमीटर है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 26 मई 2002 को 180 करोड़ रुपये की लागत वाले इस मार्ग की आधारषिला रखी। सुरंग स्थल के दक्षिणी द्वार तक जाने वाला मार्ग, जिस पर 18 हिमस्खलन संरक्षण ढांचों का निर्माण किया जा रहा है, वर्ष 2005 में बनकर तैयार हुआ।

महत्वांकाक्षी परियोजना को मूर्त रूप देना

सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 1,495 करोड़ रुपये की लागत वाली रोहतांग सुरंग परियोजना को सितंबर 2009 में मंजूरी दी। भारत के एफकॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और दुनिया की चौथी बड़ी निर्माण कंपनी ऑस्ट्रिया की स्ट्रॉबेग एसई के संयुक्त उद्यम मैसर्स स्ट्रॉबेग एसई-एफकॉन्स को एक अंतर्राष्ट्रीय निविदा के माध्यम से निर्माण का ठेका दिया गया। फिलहाल प्रारंभिक कार्य और संसाधन लगाने का काम प्रगति पर है। सुरंग की खुदाई का काम इसी महीने प्रारंभ होगा और इस कार्य के 63 महीनों बाद, वर्ष 2015 तक पूरा होने की संभावना है। मैसर्ज एसएमईसी इंटरनेषनल प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक अंतर्राष्ट्रीय फर्म को बीआरओ ने रोहतांग परियोजना के पूरा होने तक परामर्षदाता के रूप में साथ जोड़ा है।

प्रमुख विषेषताएं

सुरंग का डिजाइन कई मायनों में अनोखा होगा। लंबे फासले और ऊंचाई पर होने की वजह से इसके असाधारण वातावरण के मद्देनजर सुरंग में वायु चलचित्र के लिये पूरी सुरंग में विषाल आकार के पंखे हवा को भीतर और बाहर फेंकेंगे। घोड़े की नाल के आकार केे क्रॉससेक्शन वाली यह सुरंग सड़क की सतह पर 11.25 मीटर चौड़ी होगी, जिससे दोनो ओर से यातायात के लिए पर्याप्त जगह बचेगी और अधिकतम 80 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार वाले वाहनों की आवाजाही संभव हो सकेगी। परंतु संभवत: अकेली रोहतांग सुरंग के माध्यम से मनाली-केलांग-लेह राजमार्ग पर हर मौसम में सड़क संपर्क कायम रख पाना संभव न हो सकेगा, क्योंकि उसके रास्ते में बर्फ से ढके दो दर्रे और भी पड़ते हैं। ये दर्रे-बारालाचा ला और थागलांग ला हैं। इससे निपटने के लिए इस परियोजना में हर मौसम में सड़क संपर्क संभव करने वाली 292 किलोमीटर लंबी नीमू-पदम-दारचा मार्ग की परिकल्पना की गई है जो षिनकुनला दर्रे से होती हुई, जम्मू-कष्मीर के दूरदराज के जांस्कर क्षेत्र को पार करेगी। इस पर 286 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत आएगी।

नई संभावनाओं के द्वार

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी 28 जून को जब रोहतांग सुरंग की खुदाई का कार्य शुरू करने की आधारषिला रखेंगी, तो हिमाचल प्रदेष और जम्मू-कष्मीर के दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों की महत्तवाकांक्षाएं पूरी करने की दिषा में यह एक और कदम साबित होगा। भूमि पूजन के अवसर पर रक्षा मंत्री श्री ए.के. एंटनी और रक्षा राज्य मंत्री श्री एम.एम.पल्लम राजू, मुख्यमंत्रियों श्री प्रेम कुमार धूमल, और श्री उमर अब्दुल्ला और इस्पात मंत्री श्री वीरभद्र सिंह की मौजूदगी महत्तवपूर्ण रणनीतिक एवं विकासात्मक ढांचागत परियोजना के महत्तव को ही रेखांकित करती है। बनकर तैयार होते ही रोहतांग सुरंग, सड़क के फासले को करीब 48 किलोमीटर घटाने और यात्रा में लगने वाले समय में करीब चार घंटे की कमी लाने के साथ-साथ, लाहौल-स्पीति और लद्दाख के दूरदराज के इलाकों तक पूरे साल निर्बाध पहुंच सुलभ कराएगी। यह व्यापार और पर्यटन की नई संभावनाओं के द्वार खोलेगी और स्थानीय आबादी के लाभ के लिए रोजगार के साधन जुटाएगी।

रोहतांग परियोजना

इस दुस्साध्य कार्य का जिम्मा उठाने के लिए बीआरओ ने अलग से 'रोहतांग परियोजना', का गठन किया है। देष भर में बीआरओ की यह 18वीं ऐसी परियोजना है। इस वर्ष सात मई को अपना स्वर्ण जयंती वर्ष मनाने वाला बीआरओ, रक्षा मंत्रालय के अधीन ढांचागत निर्माण और समेकन के क्षेत्र का एक प्रमुख संगठन है। बीआरओ ने 48,300 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़कें, 36 किलोमीटर की लंबाई वाले 400 प्रमुख पुल और 19 सामरिक हवाई अड़डा बनाए हैं। उसने ज्यादातर कार्यों को दुरूह परिस्थितियों और कठिन जलवायु स्थिति में ही अंजाम दिया है। वर्तमान में बीआरओ 28,000 किलोमीटर लंबाई वाली 699 सड़कों पर काम कर रहा है, जिसमें नये निर्माण के साथ-साथ, दो-लेन का कार्य भी शामिल है। बीआरओ के जवान 3,000 किलोमीटर की लंबाई वाली 95 सड़कों से बर्फ हटाने का कार्य भी करते हैं।

सीमा सड़क संगठन-राष्ट्र के सड़क निर्माता

'श्रमेण सर्वम साध्यम्' के आदर्श वाक्य, जिसका अर्थ है "परिश्रम से सबकुछ हासिल किया जा सकता है' से प्रेरित, बीआरओ के मुख्य आधार, जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स (जीआरईएफ) के कर्मियों का अथाह उत्साह और साहस ज्यादातर गुमनामी के अंधेरे में ही गुम हो जाता है। इसके 60 प्रतिषत से ज्यादा कर्मी ऊंचाई वाले इलाकों में, बेहद कठिन हालात तथा उग्रवाद की आशंका वाले इलाकों में तैनात हैं। इस बल ने वर्ष 2000 से अब तक अपने 1,161 जवानांे को बर्फीले मौसम तथा गहरी घाटियांे तथा खड्डों से कई हजार फुट ऊंर्ची सीधी चट्टानों पर काम करते हुए, कुदरत की अनिष्चितता और हादसों की वजह से, और कई बार उग्रवादियों के हमलों में खोया है। पिछले दशक भर में बीआरओ के 1,850 जवानों की सेवाकाल में ही स्वाभाविक कारणों से मौत हुई है, इनमें से ज्यादातर मौतों की वजह कार्य की कठिन परिस्थितियों की वजह से हुई बीमारियां मानी जा सकती हैं। बीआरओ के नायकों, जिनका सबसे बड़ा शत्रु और कोई नहीं, बल्कि प्रकृति की कठोर गोद है, के गौरव का अक्स, उनके बहादुर जवानों को मिले 22 कीर्ति चक्रों और 212 शौर्य चक्रों तथा एक शलाका (बार) में देखा जा सकता है। तो, अगली बार आप जब कभी भी हिमालय क्षेत्र की किसी सीमावर्ती सड़क से गुजरे, तो उसकी खूबसूरती, स्वच्छता और पहाड़ियों के वैभव का आनंद उठाते हुए, थोड़ी देर रूकें और क्षण भर के लिए सोचें कि किस तरह कभी-कभार प्रकृति मां इतनी कठोर और निर्मम हो जाती है। हर एक या दो मील पर आने वाले तीखे मोड़ पर आप पत्थरों के अनेक स्मारकों पर जो उकेरा देखेंगे, वे उन जवानों के साहस, कड़ी मेहनत, दृढ़ता और महान बलिदान की शौर्य गाथाएं होंगी, जिन्होंने भावी पीढ़ियों की खातिर उस मार्ग को प्रशस्त किया।