भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं के लिए आयोजित रात्रिभोज को वापस लेने तक तो नीतीश कुमार अपने निर्णय को उचित करार दे सकते थे। भोज देना और भोज मांगना राजनीतिज्ञों के बीच राजनैतिक मामला है और भोज का आमंत्रण देकर उसे वापस ले लेना भी राजनैतिक कदम ही माना जा सकता हैए हालांकि सामाजिक दृष्टिकोण से भोज का निमंत्रण देकर वापस ले लेना बहुत ही आपत्तिजनक माना जाता है। इसके कारण सामाजिक रिश्तों में खटास ही नहीं आती, बल्कि ये रिश्ते पूरी तरह टूट भी जाते हैं।
लेकिन गुजरात सरकार द्वारा बिहार मुख्यमंत्री राहत कोष में दी गई 5 करोड़ रुपए की राशि को वापस कर नीतीश कुमार ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसको उचित बताते हुए वे खुद भी अपना मुह खोल नहीं सके हैं। उनकी इस कदम के लिए चौतरफा निंदा हुई। अपने आलोचकों को बिना समय गंवाए जवाब देने के लिए मशहूर नीतीश कुमार ने इस मसले पर उनकी हुई आलोचना पर एक शब्द भी नहीं बोला। वे बोल भी नहीं सकते थे, क्योंकि मुख्यमंत्री राहत कोष में आया पैसा उनका अपना पैसा नहीं होता है, जिसे वे चाहें तो वापस कर दें। उन्होंने 5 करोड़ रुपए वापस करके जो अपनी बदमिजाजी दिखाई, उसकी अन्य कोई मिसाल भारत में ही क्या, पूरी दुनिया में भी नहीं मिल सकती।
नरेन्द्र मोदी से अपनी दूरी दिखाकर नीतीश कुमार अपने सहयोगी भाजपा की सांप्रदायिकता का पूरा ठीकरा गुजरात के मुख्यमंत्री के सिर पर ही फोड़ना चाहतें हैं। वे यह शायद मुसलमानों को बताना चाहतें हैं कि भाजपा सांप्रदायिक नरेन्द्र मोदी के कारण ही है और यदि नरेन्द्र मोदी को अलग कर दिया जाए, तो भाजपा उनकी तरह धर्मनिरपेक्ष है। पहले नीतीश जैसे लोग अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में कहा करते थे कि अटलजी गलत पार्टी में शामिल एक सही व्यक्ति हैं। इसी तरह के जुमले का इस्तेमाल करके उनके जैसे लोगों ने भाजपा के साथ गठबंधन किया और कहा कि उनका संबध अटलजी है और उनके कारण भाजपा से उनका गठबंधन है। अब क्या नीतीश नरेन्द्र मोदी से अपनी दूरी दिखाते हुए यह कहना चाहते हैं कि नरेन्द्र मोदी एक सही पार्टी के गलत नेता हैं? उनकी सरकार में शामिल एक मंत्री ने कहा भी कि भाजपा को वे सेकुलर पार्टी मानते हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी की छवि नन सेकुलर नेता की है। क्या नीतीश भी ऐसा ही मानते हैं? यदि वह वास्तव में ऐसा ही मानते हैं, तो उन्हें यह भी सोच लेना चाहिए कि देश की जनता और खासकर मुसलमान उतने बेवकूफ नहीं हैं, जिनता वे उन्हें समझते हैं।
नीतीश कुमार ने 5 करोड़ रुपए लौटाकर कोसी के दर्द को एक बार फिर हरा कर दिया है। कोसी की आपदा आजादी के बाद बिहार में आई सबसे बड़ी आपदा थी। बिहार के छात्रों को पाठ्यपूस्तकों में पढ़ाया जाता रहा है कि बिहार का दुख कोसी है। कभी बिहार के एक बड़े हिस्से को कोसी अपनी बाढ़ से तबाह किया करती थीख् लेकिन उस पर बांध बनाकर कोसी के दुख को समाप्त कर दिया गया था, लेकिन 2008 में पहली बार बिहार में आजादी के बाद पैदा हुउ लोगों ने देखा कि कोसी को बिहार का दुख क्यों कहते हैं। समय के साथ 2008 में बिहार को मिला कोसी से दुख कम हो रहा था, एकाएक नीतीश कुमार ने उस दुख को हरा कर दिया। उन्होेने 5 करोड़ रुपए वापस कर दिए, जिसका इस्तेमाल कोसी के बाढ़ पीड़ितों को करना था। एक तरफ तो मुख्यमंत्री कोसी बाढ़ पीड़ितों के लिए केन्द्र सरकार से और भी सहायता राशि की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर जो गुजरात सरकार ने उन्हें कोसी के पीड़ितों के लिए दिए, उसे भी लौटा दिया ओर वह भी इसलिए कि नरेन्द्र मोदी के समर्थकों ने लुधियाना की खिंची एक ऐसी तस्वीर अखबारों में छपवा दी, जिसमें वे श्री मोदी के साथ हाथ में हाथ मिलाकर प्रसन्न मुद्रा में खड़े थे। उस तस्वीर के बाद नीतीश को श्री मोदी से अपनी दूरी दिखानी थी। और उसके लिए उन्हें भाजपा नेताओ को दिए गए भोज के निमंत्रण को तो वापस लिया ही और 5 करोड़ रुपए भी लौटा दिए। इसके कारण वे बिहार में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में उपहास के पात्र बन गए हैं।
मोदी प्रकरण में नीतीश ने अपने राजनैतिक विरोधियों को कोसी के मसले पर राजनीति करने का तो मौका दे ही दिया है, उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले को भी एक बार फिर से उठाने का मौका दे दिया है। गोधरा रेल हादसे के बाद हुए दंगों को समय पर नहीं रोक पाने के लिए नरेन्द्र मोदी को मुस्लिम विरोधी के रूप में पेश किया जाता है। अब बाबरी मस्जिद विध्वंस और गोधरा बाद के गुजरात दंगों की तुलना की जा रही है और कहा जा रहा है कि बाबरी मस्जिद का घ्वंस मुसलमानों के लिए गोधरा बाद के दंगों से ज्यादा मायने रखता है। यदि बाबरी मस्जिद विध्वंस के नायक लालकृष्ण आडवाणी को नीतीश अपना नेता मानकर उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर सकते हैं, तो फिर नरेन्द्र मोदी से उनकी चिढ़ क्यों? कांग्रेस के एक नेता प्रेमचंद मिश्र ने कहा कि नीतीश कुमार यदि मुसलमानों को खुश करने के लिए नरेन्द्र मोदी से अपनी दूरी दिखाने के लिए 5 करोड़ रुपए वापस कर सकते हैं, तो फिर उन्होेने अपने मंत्रिमंडल में बाबरी मस्जिद के ध्वंस में शामिल 4 लोगों को क्यों शामिल कर रखा है? बतौर प्रेमचंद मिश्र उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और अश्विनी कुमार चौबे बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाले कारसेवकों में शामिल थे। ये दोनों तो भाजपा के हैं। श्री मिश्र के अनुसार जनता दल(यू) की मंत्री रेणु देवी भी कारसेवकों की उस भीड़ में शामिल थींख् जिन्होनें बाबरी मस्जिद को तोड़ा।
जाहिर है, सवाल किया जाएगा कि बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाले मोदी (सुशील मोदी) को तो वे सेकुलर मानते हैं, जबकि गोधरा बाद के दंगों को समय पर न रोक सकने वाले मोदी (नरेन्द्र मोदी) को वे कम्युनल मानते हैं। जाहिर है नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी के प्रकरण के द्वारा अपने राजनैतिक विरोघियों को पाखंडी साबित करने के लिए भरपूर विस्फोटक उपलब्ध करवा दिए हैं। अब बिहार के चुनाव में मुसलमानों को अपनी ओर झुकाने के लिए नीतीश विरोधी नेता नरेन्द्र मोदी को नहीं, बल्कि लालकृष्ण आडवाणी और सुशील कुमार मोदी को ही मसला बनाएंगे। जाहिर है भाजपा को साथ रखकर नीतीश कुमार वैसे भी मुस्लिम वोट नहीं ले पाएंगे। यदि उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ दिया तो शायद उन्हेे कुछ मुस्लिम मत मिल जाएं, लेकिन जो नुकसान होगा वह बहुत ही ज्यादा होगा। (संवाद)
नीतीश का मोदी प्रश्न: रणनीति उलटी पड़ी
उपेन्द्र प्रसाद - 2010-06-26 07:59
बिहार में भाजपा और जनता दल (यू) के बीच तनाव फिलहाल समाप्त हो गया है। दोनों दल गठबंधन में बने हुए हैं और आगामी विधानसभा के सत्र का सामना मिलजुलकर ही करेंगे। यह भी लगभग तय है कि दोनों विधानसभा का अगला चुनाव भी मिलजुलकर ही लड़ेंगे। लेकिन बिहार में मतदाताओं का सामना करते समय नीतीश कुमार पहले की तरह नैतिकता के ऊंचे धरातल पर खड़ा नहीं दिखाई देंगे। इस पूरे विवाद में उनकी छवि बिहार के लोगों के बीच तो खराब हुई ही है, अपने राजनैतिक विरोधियों को अपने खिलाफ बोलने के लिए भी उन्होेने अपने मोदी विवाद के द्वारा बहुत कुछ उपलब्ध करा दिया है।