जिस रोज गैस हादसा हुआ था, उस रोज यूनियन कार्बाइड के डॉक्टरों ने जो रवैया अपनाया, उसके कारण भी लोगों की जान गई। रात सवा एक बजे से गैस पीड़ित हमीदिया अस्पताल में आने लगें थे। वह भोपाल का सबसे बड़ा अस्पताल है। गैस पीड़ित पहले अपनी आंखों में जलन की शिकायत लेकर वहां आए थे। यह 2 और 3 दिसंबर के बीच वाली रात थी। उस रोज डॉक्टर मुश्ताक अहमद और डाक्टर गंधे उस समय ड्यूटी पर थे। जब उन्होंने देखा कि मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही हैख् तो स्वाभाविक रूप से वे चिंतित हो गए। उन्होंने तत्काल यूनियन कार्बाइड के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डाक्टर लोया से संपर्क किया और गैस के कारण आ रहे मरीजों के बारे में उन्होंने उनसे बात की और जानना चाहा कि वह किस प्रकार की गैस है और वह कितना खतरनाक है। उन्होंने मरीजों के इलाज के लिए उनसे सलाह भी मांगी। जवाब में डाक्टर लोया ने कह दिया कि घबराने की कोई बात नहीं है। गैस का असर जल्द समाप्त हो जाएगा और उन्होंने सलाह दी कि मराजों को कहे कि वे अपनी आंखों को भींगे कपड़े से ढककर रखें। लोया ने यह भी बताया कि वह गैस जहरीली नहीं है।
जब उससे बात नहीं बनी तों हमीदिया के डाक्टरों ने फिर लोया से संपर्क किया और गैस के बारे में जानना चाहा। लोया ने फिर अपनी पुरानी सलाह दुहरा दी। स्थिति जितनी गंभीर थी, लोया उतने ही लापरवाह थे। अस्पताल के डाक्टर जो कर सकते थे, कर रहे थे। देखते देखते मरीजों की संख्या बढ़कर 4500 हो गई। आंख की जलन के साथ साथ अब उन्हें सांस की तकलीफ भी होने लगी थी। एक समय ऐसा आया कि मरीजों का इलाज कर रहे दोनों डाक्टरों की आंखांे में भी जलन होने लगी और उन्हें भी सांस लेने में दिक्कत आने लगी।
यूनियन कार्बाइड के डाक्टरों की लापरवाही का वह एकमात्र मामला नहीं था। 15 दिसंबर को अमेरिका के डाक्टर भोपाल आए थे। वे कंपनी की ओर से ही आए थे। प्रेस कान्फ्रेंस में ही उनकी स्थानीय डाक्टरों से झड़प हो गई। स्थानीय डाक्टरों का कहना था कि गैस के कारण मरे लोगों के फेफड़े से फास्जीन गैस मिली हैख् लेकिन वे डाक्टर उसे मानने को तैयार ही नहीं थे। फास्जीन का लंबे समय तक असर रहता है और प्रभावित लोगों की आने वाली जिंदगी भी दांव पर लगी हुई है, यह कंपनी के डाक्टर नहीं मान रहे थे। इस तरह डाक्टरों ने एक बार फिर भारी लापरवाही दिखाई और मरीजों के गैस के प्रभाव से मुक्त होने का नुस्खाए जो वे बता सकते थे, उसे उन्होंने नहीं बताया।
कुछ दिनों के बाद रिपोर्ट आई कि सोडियम थाइसल्फेट के इस्तेमाल से मरीजों को फायदा होता है। कुछ मरीजों को वह दवा दी भी गई और उससे उनको फायदा भी हुआ। उससे हुए फायदे का यह संवाददाता खुद चश्मदीद गवाह है। लेकिन कुछ दिनों के बाद दिल्ली की किसी अज्ञात ताकत के इशारे पर सोडियम थाइसल्फेट का डोज दिया जाना रोक दिया गया। हमीदिया के कुछ डाक्टरों ने बाद में बताया कि कुछ अतिमहत्वपूर्ण लोगों को उस दवा के डोज दिए गए और उसके बाद उसे रोक दिया गया। जाहिर है इलाज में भी कुछ चुनिदंा लोगों का ध्यान ही रखा गया। इसके लिए कौन जिम्मेदार था? क्या वह भी सजा का हकदार नहीं है?
गैस रिसाव के बाद स्थानीय लोगों द्वारा किस तरह की सावधानी बरती जानी चाहिए, इसके बारे में अमरिका स्थित गैस प्लांट के शहर के लोगांे को पहले से ही जानकारी दे दी गई थीख् लेकिन भोपाल के लोगों को कुछ भी नहीं बताया गया था। अमेरिका के लोगांें को बताया गया था कि गैस रिसाव की स्थिति में उन्हें अपने दरवाजे और खिडकियां बंद कर देनी चाहिए और उन पर गीला कपड़ा डाल देना चाहिए। यदि भोपाल के लोगों को भी इस तरह की जानकारी होती तो नुकसान काफी कम होते। तक लोग अपने घरों में बंद होकर गैस का खतरा समाप्त होने का इुतजार करते, लेकिन यहां तो लोग घर से निकलकर अस्पताल की ओर भाग रहे थे और गैस का बादल उनकी मौत बनकर उनका पीछा कर रहा था। लोगों को पहले से इस तरह की जानकारी देना किसकी जिम्मेदारी थी? क्या इस जिम्मेदारी से चूकने के लिए उन्हें सजा नहीं मिलनी चाहिए?(संवाद)
भोपाल गैस त्रासदी: दोषी डाक्टरों को सजा क्यों नहीं?
एल एस हरदेनिया - 2010-06-28 08:47
भोपालः पिछले 7 जून को भोपाल त्रासदी से जुड़े फैसले में यूनियन कार्बाइड के कुछ अधिकारियों को सुनाई गई साधारण सजा पर तो बवाल मचा है और उस कंपनी के अध्यक्ष एंडरसन के कानून की गिरफ्त से बाहर रहने पर भी हाय तोबा मची हुई है। इसमे गलत कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि जुर्म के हिसाब से मिली सजा नाकाफी है और मुख्य गुनाहगार पर तो मुकदमा तक भी नहीं चला है। लेकिन इनके अलावा भी और लोग हैं, जिनपर मुकदमें नहीं चलाए गए, जबकि उनका गुनाह भी कोई कम नहीं था।