आखिरकार सूचना अधिकार के सुखद और सफल परिणाम देखने को मिलने लगे। इस अ़िधकार ने ही लम्बे समय तक धूल खाती फाईलों को पंख दिये वरना तो आम आदमी के सरकारी काम हर बाबू को बापूजी के दर्शन कराने पर ही होने लगे थे। इस कारण इस अधिकार की पैरवी करने में उच्च पदाधिकारियों ने भी मदद की। मगर मजेदार बात यह निकल कर आयी कि धीरे-धीरे आम आदमी ने अपने अधिकार को लेकर अकले ही लड़ने का मन बना लिया। ऐसे में यह एक कारगर हथियार साबित हुआ। उसके धूल खाते आवेदनों पर सुनवाई न केवल तेज हो गयी साथ ही साथ पारदर्शिता ने अन्य दसियों लोगों को लुटने से बचना सिखाया।
सूचना अधिकार अधिनियम के आने के बाद, आज, अब जो अगर रफी साहब किसी प्रेमी के लिए चांद से पूछते, ‘देखा है कहीं मेरे यार सा हंसी? तो उनके गीत में कदाचित चाँद का जवाब होता कि ‘ऐ माशूक! तेरी महबूब है तो हंसी, बहुत ही हंसी! पर सबसे हंसी शायद नहीं, नहीं! नहीं!!’ जी हाँ, सच और पूरे सच के सिवा कुछ कहना अब भारी पड़ जाता।
सूचना अधिनियम 2005 में मिला है, भारत के आम आदमी को सरकारी तंत्र से और सरकारी सुविधा प्राप्त सभी संस्थाओं से सीधे तौर पर सही जवाब मांगने का अधिकार और यदि देखा जाए तो परोक्ष रुप से हर कोई इस अधिनियम में पड़ जाएगा। भारत में सूचना का यह अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही उपलब्ध है। यह सूचना अधिकार अधिनियम 12 अक्टूबर 2005 से लागू हुआ है। कुछ राज्य सरकारों ने इसे पहले ही आंरभ कर दिया था और अब यह पूरू देश में सभी जगह पर लागू है। इसमें आम जनता, आम नागरिक को सरकारी कार्य देखना, दस्तावेज और आलेख की प्रतिलिपियां लेना या हार्ड कापी या साड्डट कापी के रूप में या विडियो अथवा टेप में से सूचना लेना संभव करा दिया है। सूचना या जानकारी का अर्थ है किसी भी तरह के दस्तावेज, आदेश, प्रेस विज्ञप्ति, विचार, समझौते या आंकड़े या किसी भी रूप में लिखित या इलैक्ट्रानिक के रूप में जो कहीं पर भी हो, लेकिन सरकारी अधिकारी अथवा सार्वजनिक क्षेत्र से उपलब्ध हो सकें। जानकारी प्राप्त करने के लिए सूचना अधिकारी के पास एक साधारण कागज में आवेदन किया जा सकता है।
इस अधिकार ने ब्यूरोंक्रेट्स को उस किसी फिल्म में चित्रित होटल के बैरे की औकात के समकक्ष में ला दिया है जो सिर्फ रुपये की शक्ल देखने पर ही जवाब देता है। चलचित्रों में ऐसे अदाकार का चित्रण खूब है जो जवाब देने में ढिठाई से अनिच्छुकता दर्शाता है, मगर हरे-हरे नोटों की झलकीयों को देखते ही बिना ब्रेक की गाडी की तरह उसकी जुबान चलती है। सूचना अधिकार अधिनियम केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों पर समान रूप से लागू है। सूचना अधिकार अधिनियम में केन्द्रीय सरकार से महज रु. दस के पोस्टल आर्डर या बैंक ड्राफ्ट अथवा नकद में शुल्क भुगतान कर जानकारी प्राप्त की जा सकती है। कुछ राज्यों में यह शुल्क 5रु से 500रु तक विभिन्न वर्गो के अनुसार लागू है। इसमें भी जो गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं, उनसे किसी भी तरह से फीस नहीं ली जा सकती है। सबसे अच्छी बात यह है कि किसी भी आवेदक से सूचना पूछने व मांगने का कारण नहीं पूछा जा सकता है।
नकारात्मक सोच वाले और कार्यअवरोधक परजीवी इसमें खोट की बात कहते हैं, पर वे भूल जाते है कि चाकू के अविष्कार के साथ ही दुरूपयोग को तथा डायनामाइट के अविष्कार के साथ ही अमानवीय प्रयुक्त को भी दुनिया ले देखा। लोक अदालतों की तरह, त्वरित न्याय के लिए सूचना का अधिकार भी कम से कम कुछ प्रतिशत तक कारगर तो है। कई छोटे-मोटे कार्य जो सालों से लंबित थे। फौरन निपट गए। राशनकार्ड, बिजली कनैक्शन, पासपोर्ट और परिवहन परिचय पत्र का सीधे-सीधे एक बार के सवाल में ही हल हो जाता हैः- जब यह पूछा जाए कि फाइल की जिम्मेदारी किसके हाथ में है? अगर सूचना संबंधित अधिकारी के क्षेत्र से नहीं है तो धारा 6-1(3) अथवा धारा 5 के अंतर्गत इसको उसे विस्तारित कर देगा। तब नये संबंधित अधिकारी से उत्तर अपेक्षित होता है या फिर दुबारा आवश्यक्तता होने पर वार्तालाप करना पड़ता है। साधारणतया सूचना 30 दिनों के अंतर्गत प्रदान की जानी होती है, पर यदि यहां पर तीसरी पार्टी का या अन्य विभाग से भी सूचना लेनी होती है तो इसमें 40 दिनों तक का समय दिया जाता है। तीसरी पार्टी के सबंध में सूचना प्रदान करने के पूर्व धारा 11 के अंतर्गत सूचना अधिकारी अन्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी को जानकारी प्रदान करेने के पूर्व दस दिनों की कारण बताओ नोटीस देगा और उसकी एक प्रति आवेदक के पास भी भेजेगा। जहाँ जीवन व मृत्यु की बात हो वहाँ पर सूचना 48 घंटे में उपलब्ध करानी होती है। लेकिन मानवाधिकार उल्लंघन के क्षेत्र में, यदि गुप्तचर विभाग या सुरक्षा विभाग से सूचना मांगी जाती है तो इसके लिए 45 दिनों तक का समय दिया गया है। अगर 30 दिनों के अन्दर इसका जवाब नहीं आता है, तो सूचना प्रदान नहीं की गई तो ऐसा माना जाता है कि 30 दिनों तक सूचना नहीं मिली या सूचना नहीं दी गई है। जब सूचना 30 दिनों के अंतर्गत नहीं प्राप्त होती है तो पहली अपील आवेदक पुर्नवाद अधिकारी के पास कर सकता है। अगर पहली अपील का भी जवाब 30 दिनों से कम समय में नहीं मिलता है तो मुख्य सूचना अधिकारी के नाम पर आखिरी अपील की जा सकती है। दोषी जिम्मेदार अधिकारी पर अपील अधिकारी सूचना की देरी के लिए 250/- प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम 25000 रु. तक का दण्ड कर सकता है। इसी तरह त्रुटि पूर्ण सूचना प्रदान किये जाने पर दण्ड विधान लागू है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी बेब पेज पर उपलब्ध है। सूचना देने की भाषा पूछी गई भाषा के अनुसार भाषा व स्वरूप में ही दी जा सकती है।
सड़सठ साल हो चुके आजादी को फिर भी हालत तो अब तक भी वैसी ही है, किसी भी दफ्तर में चले जाएं, जनता का अनुभव है कुर्सी पर बैठा हर अफसर के दूसरे से काम कराने के लिए इशारा करेगा और दूसरा उसके बाद तीसरे के लिए बोलेगा। मजे की बात तब होती है कि जिस तीसरे आदमी के हाथ काम का होना माना जाएगाा वही तीसरा आदमी हमेशा दफ्तर से बाहर होगा या छुट्टी पर होगा या मीटिंग में होगा। सालों से लोगों की शिकायत पर सरकारी विभाग की कोेई प्रतिक्रिया नहीं मिलने से वे निराश रहते थे। सरकारीतंत्र उनकी शिकायतों, पत्रों पर हफ्तों महीनों कोई संज्ञान नहीं लेता था। इस कारण छोटे-बड़े हर काम के लिए जनता या तो जन प्रतिनिधियों का आश्रय लेती अथवा उन खास पहुँच वाले तथाकथित नेक बंदों का, जो हर काम के लिए बिचौलिए का काम करते है। आधे-अधूरे रहकर आजाद हुए राष्ट्र के नागरिकों की खून पसीने की कमाई से तनख्वाह लेने वाले अधिकारी देश के आम आदमी को हर अधिकार से वंचित रखे हुए थे। उस पर से इधर आतकंवादी गतिविधियों ने सुरक्षा के दृष्टिकोण से कार्यालयों की प्रवेश प्रक्रिया को अतिजटिल बना दिया है। एक-एक अधिकारी से मिलने के लिए स्वागत कक्ष में घंटों तक इंतजार करना पड़ता है। कई बार तो स्वागतकक्ष पर लम्बे इंतजार के बाद तैनात सुरक्षा कर्मी के मुँह टका सा जवाब, ‘अधिकारी के पास समय नहीं है’, का मिलता है और बेचारा नागरिक मजबूरन वहीं का वहीं रह जाता है।
आजादी के परवानों ने कभी यह नहीं सोचा था कि आजाद होते न होते देश में सेवा भावना पूरी तरह स्वार्थ में बदल जाएगी। यों तो सविंधान में पत्र का उत्तर देने के लिए भी प्रत्येक अधिकारी के पास का समय नियत है। यह समय सीमा तीस दिवस से लेकर नब्बे दिनों तक है। मगर उत्तर प्राप्त न होने पर आम आदमी केवल मात्र शिकायत व कार्मिक विभाग में उक्त लिपिक अथवा अधिकारी के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की शिकायत कर पाता। उसकी दरख्वास्त पर कोई कार्यवाही हो या न हो, वह कुछ नहीं कर सकता था। इस स्थिति में जीते-जीते अपने हक के लिए न केवल लड़ना छोड दिया साथ ही किसी तरह की शिकायत करने का माद्दा वह खो चुका। तगं आ कर तब वह दुनिया के बेहतरीन हथियार कलम की ताकत पर शक करने लगा। इसकी स्याही उसे कोरे कागज के न दिखने एवं न किसी को बदल पाने में नाकामयाब होती नजर आने लगी। पर सूचना अधिनियम में आम आदमी के हाथ वह हथियार मिला है, जिससे उसके आवेदन को मजबूती मिली है। जिस तरह से तेजाबो में सबसे खतरनाक तेजाब अम्लराज है जोकि सोने तक को गला देता है; ठीक उसी तरह इस अधिनियम के तहत आवेदन ने बडे से बडे अधिकारी यहाँ तक की उच्चतम् न्यायालय को भी, जिस आम आदमी के पैसे से वेतन लेता है, जवाब देने के लिए जिम्मेदार बना दिया। बेइज्जत हो कर, मन मार कर, सिर झुका कर लौट जाने की बजाय कई मामलों में, जहाँ विभाग की लापरवाही, सुस्ती और टालु रवैये से जनता को परेशान करता है, वहां अधिकार के साथ काम करवा सकता है। पर इस पर भी नौकरशाही की शनि नजर लग गयी। यों तो इसके घेरे में संसद और सुप्रीम कोर्ट समेत सारे दफ्तर आ गये पर अब असफल कोशिशें जारी हैं, अपने को इससे बचाने के लिऐ। जागरूक नागरिकों को सावधान रहने की जरूरत है। कई मौकों पर अधिकारी केवल उपलब्ध दस्तावेज के आधार पर सूचना प्रदान कर टका सा जवाब दे रहे है। अपने यहाँ की फाईलों को अनउपलब्ध बता कर या घुमा फिरा कर जवाब देना जारी हो गया है। इसको समझना होगा। अगर हिम्मत बाधें अपने अधिकार का अपरहण होने से नहीं रोका तो हमारी ही कमी कहलाएगी। दुनिया का सबसे मजबूत हथियार चलाना भी तो एक निपुणता की मांग करता है।
भारत
सूचना के अधिकार पर भी अब नौकरशाही की नजर
डॉ अतुल कुमार - 2010-06-30 13:47
नई दिल्ली: सूचना के अधिकार पर भी अब नौकरशाही की नजर लग गयी। यों तो इसके घेरे में संसद और सुप्रीम कोर्ट समेत सारे दफ्तर आ गये पर अब भी असफल कोशिशें जारी हैं ताकि इन्हें इस कानून के दायरे में आने से बचाया जा सके। जागरूक नागरिकों को सावधान रहने की जरूरत है। कई मौकों पर अधिकारी केवल उपलब्ध दस्तावेज के आधार पर सूचना प्रदान कर टका सा जवाब दे रहे हैं। अपने यहाँ की फाईलों को अनुपलब्ध बता कर या घुमा फिरा कर जवाब देने का सिलसिला जारी हो गया है। इसको समझना होगा। अगर हिम्मत बाधें अपने अधिकार का अपरहण होने से नहीं रोका तो हमारी ही कमी कहलाएगी।