गुरुवार, 17 अगस्त 2006

नाभिकीय मुद्दे में नया मोड़

प्रधान मंत्री आपत्तियां भी सुनें

ज्ञान पाठक

भारत-अमेरिकी नाभिकीय समझौते के मुद्दे में एक नया मोड़ आ गया है। प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा जुलाई 2005 को जो समझौता किया गया था उसका विरोध थम गया है और लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां उसी पर राजी हो गयी हैं। अब इस समझौते और इसकी शर्तों का विरोध नहीं हो रहा बल्कि अमेरिका द्वारा भविष्य में भारत की बांहें मरोड़ने की संभावनाओं का विरोध हो रहा है। हमारे अधिसंख्य सांसद भयभीत हैं। देशहित के प्रति चिंतित हैं। अपनी चिंताओं से अमेरिका को अवगत कराना चाहते हैं। वे चाहते थे कि संसद में एक प्रस्ताव लाकर अपनी चिंता व्यक्त की जाये। सरकार ने कहा कि आप बिल्कुल न घबड़ाएं।

मामला यहीं पर जाकर नहीं थमा। संसद में चिंता प्रस्ताव लाने पर जोर देने वालों में विपक्षी राजनीतिक पार्टियों के सांसद तो थे ही, सरकार के समर्थक सांसद भी थे। ये सभी किसी समय जुलाई 2005 के समझौते के विरोधी थे। वे अमेरिका के हाथों भारत की ऐसी तैसी नहीं करवाना चाहते थे। लेकिन वह तो बीते दिनों की बात है। उसके बाद तो यहां यमुना में काफी पानी बह चुका है। प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने सबको उसके लिए राजी करवा लिया।

राजी होने के लिए उन सांसदों की एक ही इच्छा थी कि प्रधान मंत्री संसद में आकर बस बोल भर दें कि समझौते के कार्यान्वयन के समय भारत के हितों को आघात नहीं पहुंचाया जायेगा। यह तो आज के दौर में बहुत छोटी सी बात थी। मानवीय चेहरे में कठोर नयी अर्थव्यवस्था को लागू करने वाले मनमोहन सिंह के लिए यह सहज बात थी। उन्होंने मार्च 2006 में संसद में आकर वैसा कह दिया। विरोधी सांसद ‘ना ना करते हां उन्हीं से कर बैठे।’ लेकिन साथ-साथ यह भी कहते रहे, कि समझौते का कार्यान्वयन उसी तरह से हो जैसा कि आश्वासन दिया गया है।

समय बीतता गया और फिर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में इस समझौते के संबंध में एक विधेयक आया। उसमें कुछ ऐसी बातें थीं कि हमारे इन सांसदों को समझौते के कार्यान्वयन के समय ज्यादा आघात का खतरा महसूस हुआ। बस फिर क्या था। बात बिगड़ गयी। जो राजी हो गये थे पुनः भयभीत हो उठे। उन्होंने कहना शुरु किया कि वे इतना बर्दाश्त नहीं करेंगे।

इस तरह इस पूरे भारत-अमेरिकी नाभिकीय समझौते के मसले में एक नया अप्रत्याशित मोड़ आ गया। विरोधी सांसदों ने कहा कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित विधेयक की नयी शर्तें उन्हें मंजूर नहीं हैं। भारत सरकार के प्रतिनिधियों ने उनसे कहा कि वे बिल्कुल न घबड़एं। भारतीय हितों को आघात नहीं पहुंचने दिया जायेगा। लेकिन उन्होंने सरकार से मांग की कि संसद में एक प्रस्ताव लाया जाये जिसमें भारत की (मतलब उनकी) चिंताओं का जिक्र हो। ऐसी मांग करने वालों में सरकार की सहयोगी वामपंथी राजनीतिक पार्टियां भी थीं और विपक्षी राजनीतिक पार्टी भाजपा भी।

सौतिया डाह के बारे में संभवतः आप वाकिफ होंगे। सौतनों का एक साथ रह पाना मुश्किल होता है। यह स्वाभाविक है, चाहे वे एक ही इरादा क्यों न रखती हों। एक ही इरादा व्यक्त कर लेने के बाद वाम राजनीतिक पार्टियों और भाजपा से साथ कुछ ऐसा ही हुआ लगता है। मंशा तो एक ही थी पर दोनों एक साथ कैसे रह सकती थीं !

कांग्रेस ने इस मानसिकता का लाभ उठाया। उसने अपनी सहयोगी बहनों (वाम राजनीतिक पार्टियों) से कानाफूसी करनी शुरू कर दी। समझाया बुझाया कि भाजपा के साथ उनका खड़ा दिखना ठीक नहीं। यह बात उनकी समझ में भी आ गयी। फिर तो वाम राजनीतिक पार्टियों ने कहना शुरू किया कि वे भाजपा के साथ खड़ी नहीं होंगी, चाहे उनका एक ही इरादा क्यों न हो।

इस तरह कुछ दिन और बीत गये। फिर वाम पार्टियों ने कहना शुरू कर दिया कि संसद में प्रस्ताव न आये तो कोई बात नहीं। कम से कम उनकी चिंताएं संसद में किसी न किसी रुप में रखी जायें। वह प्रधान मंत्री के बयान के रुप में भी हो सकता है।

इस बीच कुछ और प्रमुख लोगों की चिंताएं सामने आयी हैं जिनमें वे वैज्ञानिक भी शामिल हैं जिनके नेतृत्व में भारत अपने दम पर एक नाभिकीय शक्ति के रुप में उभरा और नाभिकीय परीक्षण भी किये गये। मनमोहन सिंह तो नाभिकीय परीक्षणों के विरुद्ध रहे हैं। भला वह उनकी आपत्तियों पर उनसे क्यों बात करेंगे ! सो उन्होंने उनसे बात न करने का निर्णय किया है। वह अपने ही उन लोगों से बात कर रहे हैं जो समझौता प्रक्रिया में उनके साथ हैं। वह कह रहे हैं कि चिंता की कोई बात नहीं। समझौता वही लागू होगा और उतना ही लागू होगा जितना करार है।

फिर भी अच्छा तो यह होता कि प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह हां में हां मिलाने वालों के अलावा उन लोगों की भी सुन लेते जिन्हें सिर्फ नयी शर्तों पर ही आपत्तियां नहीं बल्कि जो उनके मूल 2005 के समझौते से भी राजी नहीं हैं। #