इसके पता लगने की शुरुआत उस समय हुई, जब असम पुलिस ने मेघालय की राजधानी शिलांग से आ रही गाड़ियों की चेकिंग प्रारंभ की थी। यह कुछ महीने पहले की बात है। चेकिंग के दौरान उत्तरी कछार हिल्स स्वायत्त जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी सदस्य के पास से एक करोड़ रुपए की रकम प्राप्त हुई। पूछताछ में उन्होंने बताया कि वह रकम वे एक उग्रवादी संगठन के नेता जेवेल गरलोसा को देने के लिए ले जा रहे थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उस उग्रवादी नेता को वे 3 करोड़ रुपए की रकम पहले भी दे चुके हैं।

गौरतलब है कि पूर्वात्तर राज्यों में स्वायत्त जिला परिषदों को पूर्वाेत्तर के पहाड़ी इलाकों के विकास के लिए गठित किया गया था। उनके मुख्य अधिकारी सदस्य की ताकत अपने जिले में मुख्यमं.त्री की ताकत के बराबर ही होती है।

चूंकि उसमें एक उग्रवादी संगठन शामिल था, इसलिए केन्द्र सरकार ने उसकी जांच का जिम्मा अपने ऊपर लिया और और नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने उसकी जांच शुरू कर दी। पिछले साल 17 नवंबर को अदालत में दखिल किए गए चार्जशीट में एनआईए ने कहा कि हिल्स स्वायत्त परिषद के अनेक चुने गए प्रतिनिधियों ने एक उग्रवादी संगठन के नेता गारलोसा को परिषद के कोष से पैसे निकालकर दिए। हालांकि एनआइए की पूरी रिपार्ट सार्वजनिक नहीं की गई। लेकिन पिछले मार्च महीने में कुछ अखबारों के हाथों में एजेंसी की रिपार्ट आई और उन्हाने उसे प्रकाशित कर दिया।

रिपोर्ट में यह बात खुलकर सामने आई कि स्वायत्त परिषद से कुल 10 अरब रुपए की राशि उस उग्रवादी संगठन के हाथों तक पहुंची। उस घोटाले में गोगोई सरकार के 7 मंत्रियों को शामिल बताया गया है। उसमें एक सांसद भी लिप्त हैं। अनेक अधिकारी और निजी टेकेदार भी उस राशि की लेनदेन में लिप्त पाए गए हैं। पिछले 10 साल से यह घोटाला चल रहा था। एनआईए ने पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश भी की है।

पूरा मामला सामने आने के बाद विपक्ष ने हंगामा मचाना प्रारंभ कर दिया है। उसका कहना है कि इस घोटाले की जांच सीबीआई से की जानी चाहिए। लेकिन मुख्यमंत्री इस मामले की सीबीआई जांच के पक्ष में नहीं थे। कहा जा रहा है कि घोटाले में शामिल सांसद मुख्यमंत्री के करीबी व्यक्ति हैं। घोटाले में शामिल एक मंत्री भी मुख्यमंत्री गोगोई के खासमखास हैं। लेकिन केन्द्र की ओर से भी मुख्यमंत्री पर दबाव पड़ा और उन्हें मामले को सीबीआई के हाथों में देना पड़ा। (संवाद)