मनमोहन सिंह की सरकार अपने दूसरे कार्यकाल मे अपने आपको कुछ ज्यादा ही निश्चिंत पा रही है। इसका कारण यह नहीं है कि इस बार उसे कोई अपार बहुमत मिला है। सच तो यह है कि यूपीए की घटक पार्टियों को लोकसभा में साधारण बहुमत भी प्राप्त नहीं है। कुछ गैर यूपीए दलों और निर्दलीय सांसदों के बूते यह सरकार चला रही है। और यदि लोकसभा में सभी विपक्षी पार्टियां एकजुठ हो जाए, तो इसे अपने बहुमत जुटाने के लाले पड़ जाय। इसके बावजूद यदि केन्द्र सरकार अपने आपको ज्यादा निश्चिंत पा रही है, तो उसका कारण यही है कि विपक्ष पूरी तरह विभाजित है और भाजपा व वामदल लोकसभा में खराब प्रदर्शन के कारण हौसलापस्ती के दौर से गुजर रहे हैं।

लेकिन बढती महंगाई ने उन्हें एक साथ आने का मौका दे दिया है। बजट सत्र में ही महंगाई के मसले पर वामदल और भाजपा साथ साथ थे। केन्द्र सरकार के सामने संयुक्त विपक्ष चुनौती पेश कर रहा था। बजट सत्र के विराम के पहले केन्द्र सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक लाकर विपक्षी एकता को तोड़ दिया। लेकिन उसके बाद मुलायम सिंह यादव और लालू यादव ने यूपीए सरकार से बागी तेव दिखाते हुए उसके अस्तित्व पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया था। विराम के बाद बजट सत्र मे फिर केन्द्र सरकार को संयुैत विपक्ष की चुनौती का सामना करना पड़ रहा था। वित्तीय विधेयक के बाद विपक्ष ने कटौती प्रस्ताव भी पेश किए। उसे सदन में गिराने के लिए केन्द्र सरकार ने सीबीआई का इस्तेमाल किया। मायावती के सौदेबाजी कर उनके सांसदों का सरकार के लिए समर्थन सुनिश्चित किया गया। लालू और मुलायम के सांसदों की मतदान में अनुपस्थिति सुनिश्चित कराई गई और केन्द्र सरकार ने शीबू सोरेन का मत पाने में भी सफलता प्राप्त की।

यानी केन्द्र सरकार अपना अस्तित्व बचाने के लिए सांसदों के बहुमत पर नहीं, बल्कि सदन के प्रबंधन पर आश्रित है। इस तरह का प्रबंधन टिकाऊ नहीं होता। एक बार या दो बार तो इस तरह की तिकड़म काम में आ जाती है, लेकिन यह समस्या का स्थाई समाधान नहीं होता। एक तरफ सरकार सदन में प्रबंधन के द्वारा अपना बहुमत बनाए रखने की कोशिश करे और दूसरी तरफ विपक्ष को एकजुट होने के लिए आधार प्रदान करता रहे, तो इसे बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती।

बंद ने जो केन्द्र सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है, वह है भाजपा के साथ मिलकर वामदलों की राजनैतिक संघर्ष में शामिल होने की तत्परता। भाजपा ने कभी भी वामदलों के साथ मिलकर साझा मसलों पर राजनैतिक कार्रवाई करने में झिझक नहीं दिखाई है। सच तो यह है कि वामदल ही भाजपा से दूर भागते रहे हैं। किसी भी मसले पर वे भाजपा को अपने साथ राजनैतिक प्रदर्शन और घरना में शामिल होते नहीं देखना चाहते हैं, लेकिन इस बार वे पहली बार भाजपा के साथ दिखे। उनका भाजपा के प्रति पैदा हुआ नया दृष्टिकोण केन्द्र सरकार के लिए खतरनाक हो सकता है।

यह सच है कि भाजपा और वामदल ने एक साथ 5 जुलाई को बंद की घोषणा नहीं की। शरद यादव ने बंद के लिए 5 जुलाई का दिन तय किया। वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक हैं, इसलिए भाजपा वह अन्य राजग घटको को उस दिन बंद के लिए तैयार करने में कोई दिक्कत नहीं हुई। उन्होंने वामदलों सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओं से भी अलग अलग बात की और सबको 5 जुलाई के दिन को ही बंद के लिए राजी करा लिया। महंगाई के मुद्दे पर सभी पार्टियां अपने अपने तरीके और समय तालिका के अनुसार विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। पेट्रोल और डीजल की कीमत बढाए जाने के बाद शरद यादव ने 5 जुलाई के दिन सबको अपना विरोध् प्रदर्शन के लिए बंद आयोजित करने के लिए तैयार कर लिया।

शरद यादव राजग के संयोजक रहे हैंख् लेकिन वे मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान वाम दलों की भूमिका की प्रशंसा करते रहते थे। वे अभी भी मनमोहन सिंह की पिछली सरकार के सारे अच्छे कामों का श्रेय वामदलो को ही देते रहते हैं। इसलिए भाजपा के साथ रहने के बावजूद वामदलों के नेताओं के साथ उनका सम्मान का संबंध बना हुआ है। इसी का लाभ उठाते हुए उन्होनंे वह कर दिखाया, जिसे बहुत लोग सोच भी नही सकते थे। वामदल और भाजपा को जोड़ने वाली एक कड़ी के रूप मे शरद यादव की भूमिका केन्द्र सरकार की स्थिरता के लिए खतरा है।

इस बंद में बिहार के लालू यादव और रामविलास पासवान शामिल नहीं थे। उत्तर प्रदेश की अजित सिंह और मायावती भी इसमें शामिल नहीं थी। बिहार में राजद का जद(यू) के साथ 36 का आंकड़ा है, इसलिए वह इसमें शामिल नहीं हो सकता था, क्योकि उसे तो महंगाई के मसले पर नीतीश सरकार को भी घेरना है। उसी तरह मुलायम सिंह यादव अपने विराध प्रदर्शन में मायावती के खिलाफ भी निशाना साधते हैं, भले ही वह मुद्दा महंगाई का ही क्यों न हो। इसलिए उत्तर प्रदेश बसपा को बंद के समर्थन में शामिल करवाने की कोशिश ही नहीं की गई। अजित सिंह केन्द्र सरकार में शामिल होने के लिए बातचीत चला रहे हैं, इसलिए उन्होंने भी इसमें हिस्सा नहीं लियाण् लेकिन इसके अलावा अन्य सभी विपक्षी पार्टियों ने बंद में हिस्सा लिया और बंद सफल भी रहा।

इस महीने के अंतिम सप्ताह में संसद का मानसून सत्र भी चलेगा। उसमें फिर केन्द्र सरकार के खिलाफ विपक्ष एकजुट रहेगा। महंगाई के मसले पर देश की अर्थव्यवस्था को अभी कोई राहत मिलती दिखाई नहीं दे रही है। जाहिर है, यह मसला राजनीति को तनावपूर्ण बनाता रहेगा। वैसे माहौल में केन्द्र सरकार लालू, मुलायम और मायावती पर बहुत भरोसा नहीं कर सकते। वे केन्द्र सरकार के दबाव में तभी आते हैंख् जब उन्हें लगता है कि केन्द्र सरकार अस्थिर है, लेकिन जब कभी भी उन्हें लगेगा कि उनके मत सरकार के खिलाफ पड़ने से सरकार गिर जाएगी, तो उनपर सरकार का दबाव भी काम नहीं आएगा। जाहिर है कि 5 जुलाई के भारत बंद के बाद केन्द्र सरकार की स्थिरता पर खतरा बढ़ गया है। इसलिए केन्द्र सरकार के हित में यही होगा कि वह टकराव की जगह सर्वानुमति की नीति अपनाते हुए नीतियां तैयार करे। (संवाद)