दोनों के निशाने पर कांग्रेस ही थी। यह 1967 के चुनाव के बाद हिन्दी राज्यों में संयुक्त विधायक दलो की याद दिला देता है, जब भारतीय जन संघ और वामदल एक साथ उनमें दिखाई देते थे। 1977 की जनता पार्टी सरकार और 1989 की जनता दल सरकार के दौरान भी इस तरह की दोस्ती दिखाई पड़ रही थी। इन दोनों मौकों पर वामदल बाहर से सरकार का समर्थन करते दिखाई दे रहे थे। 1977 मे तो जनसंघ जनता पार्टी का हिस्सा थी। 1989 में भाजपा जनता दल की सरकार का बाहर से समर्थन कर रही थी।
संयुक्त मोर्चा की दो सरकारों- देवेगौड़ा और गुजराल सरकार- के दौरान वामदलों की रणनीति में बदलाव आया। उस समय सीपीआई तो सरकार में थी, शेष दल सरकार का बाहर से समर्थन कर रहे थे। उस समय सरकार को बाहर से भाजपा का नहीं, बल्कि कांग्रेस का समर्थन मिल रहा था। उस समय कांग्रेस और वामदलों का साझा उद्देश्य भाजपा को सत्ता से बाहर रखना था।
लेकिन वामदलों को अहसास हुआ कि वे गैरकांग्रेसवाद की राजनीति करके भाजपा को ही मजबूत कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने भाजपा को कमजोर करने के लिए गैरकांग्रेसवाद की राजनीति का त्याग कर दिया। 2004 में जब भाजपा को सत्ता से बाहर रखने की बात आई, तो वामदलों ने केन्द्र की सरकार बनाने में कांग्रेस का साथ दे दिया।
लेकिन कांग्रेस के साथ वामदलों के रिश्ते उस समय टूटे जब केन्द्र सरकार ने अमेरिका के साथ परमाणु करार को किसी भी कीमत पर सफल बनाने का फैसला कर लिया। उस समय संसद में वामदल और भाजपा एक साथ सरकार के खिलाफ मतदान करते दिखाई दिए। उसके बाद तो अनेक मसलों पद दोनों ने एक साथ एक प्रकार के निर्णय लिए है। 5 जुलाई के भारत बंद के दिन दोनों का एक ही मसले पर एक ही प्रकार से विरोध प्रदर्शन उसी श्रृंखला की ताजा कड़ी थी। अब तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में भी दोनों पक्षों के बीच परोक्ष रूप से ही सही, लेकिन तालमेल बना रहेगा।
जब 1960 और 1970 के दशक में दोनों एक साथ आए थे, तो उस समय की तस्वीर इस समय की तस्वीर से अलग थी। उस समय कांग्रेस देश की राजनीति की एक बहुत बड़ी ताकत थी और दोनों पक्ष कांग्रेस को मात देने के लिए आतुर थे। उस समय कांग्रेस के खिलाफ एकजुट होना उनके अपने अस्तित्व के लिए भी जरूरी था। हालांकि तब वामपंथी नेताओं ने यह नहीं सोचा था कि उस गैरकांग्रेसवाद का नतीजा भगवा पार्टी की बढ़ी ताकत के रूप में सामने आएगा। उन्हें तो बस यही लग रहा था कि कांग्रेस के कमजोर होने के बाद वे मजबूत होंगे।
अब यदि भाजपा और वामदल एक साथ गैरकांग्रेसवाद की राजनीति करते हैं तो शायद दोनों में से किसी को भी फायदा नहीं होगा। उस समय वामदल वैचारिक स्तर पर एक बड़ी ताकत थी, लेकिन सोवियत संघ के पतन और चीन द्वारा बाजारवादी दर्शन को स्वीकार करने के बाद भारत के वामदलों का वैचारिक आधार भी कमजोर हुआ है। इसलिए उनके बहुत मजबूत होने की सभावना कम है। उसी तरह भाजपा भी लगातार कमजोर हो रही है। एक समय उसके साथ देश की 23 पार्टियां हुआ करती थीं, जो अब घटकर 3 हो गई हैं। अब भाजपा के साथ सिर्फ शिवसेना, अकाली दल और जनता दल (यू) रह गए हैं। नीतीश कुमार के साथ भाजपा का रिश्ता भी डांवाडोल हो रहा है। संभव है कि आगामी विधानसभा चुनाव क बाद वह रिश्ता भी टूट जाय।
यानी एक बार फिर कांग्रेस के प्रभुत्व वाले युग की वापसी हो रही है, हालांकि सच यह भी है कि आज कांग्रेस उतना मजबूत नहीं है, जितना वह पहले हुआ करती थीं। अब एक तरफ कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे की सरकार है, तो दूसरी तरफ वामदल और भाजपा और उनके साथ अनेक क्षेत्रीय दल। इस तरह राजनीति में टकराव का माहौल बन चुका है।(संवाद)
वामदलों का गैरकांग्रेसवाद
राजनैतिक टकराव बढ़ने के आसार
अमूल्य गांगुली - 2010-07-07 11:46
आजादी के बाद गैरकांग्रेसवाद की जो राजनीति चल रही थी, अब वह वापस आ रही है। हालांकि वामदल कह रहे हैं कि पेट्रोल की कीमतों के बढ़ाने के विरोध में 5 जुलाई के उनके बंद के दिन ही भाजपा का भी बंद महज एक संयोग था। लेकिन यह तथ्य कि दोनों उस रोज एक ही खेमे में थे, को कोई नहीं झुठला नहीं सकता।