मौसम ने भी इस काम को और मुश्किल बना दिया है। सर्दियों में कोहरे की वजह से अवैध तरीके से सीमा पार करने/आवागमन करने वाले अपराधियों को मदद मिल रही है, जिससे सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मियों/सैनिकों की परेशानी और बढ़ गयी है। सुरक्षाकर्मी इस समय बहुत तनाव में हैं, क्योंकि सैकड़ों लोग भारत में शरण मांग रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक भारत-बांग्लादेश सीमा की ओर जा रहे हैं।

इस तरह के सामूहिक पलायन के प्रयास आमतौर पर बांग्लादेश में सशस्त्र इस्लामी आतंकवादियों द्वारा हिंदुओं और ईसाइयों के खिलाफ किये गये हिंसा/क्रूर हमलों के लंबे दौर के बाद होते हैं। त्रिपुरा के सीमावर्ती क्षेत्रों से आने वाली रिपोर्टों के अनुसार अगरतला रेलवे स्टेशन और आस-पास के इलाकों से 110 से अधिक बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को गिरफ्तार किया गया है। उनमें से अधिकांश की नौकरी की तलाश में दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई और अन्य भारतीय शहरों में जाने की योजना थी।

पूर्वोत्तर की मीडिया में आई खबरों के अनुसार, बीएसएफ, त्रिपुरा पुलिस और सरकारी रेलवे पुलिस (जीआरपी) ने बताया कि पिछले कई महीनों में गिरफ्तार किये गये बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या 600 से अधिक हो गयी है। पकड़े गए रोहिंग्याओं की संख्या करीब 65 है। ये लोग चटगांव (चटगांव) के नजदीक बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में स्थित शिविरों से भागे थे। अवैध विदेशियों को महत्वपूर्ण दस्तावेज हासिल करने में मदद करने वाले करीब 30 भारतीयों को भी गिरफ्तार किया गया है।

बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करने वाले त्रिपुरा और मेघालय में की गयी गिरफ्तारियों की जानकारी मीडिया के लिए प्राप्त करना आसान था, लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा करना आसान नहीं था। पूर्वोत्तर राज्यों के विपरीत, पश्चिम बंगाल के अधिकारियों ने बांग्लादेशी या रोहिंग्या घुसपैठियों की गिरफ्तारी की संख्या के बारे में नियमित ब्रीफिंग नहीं की है, बल्कि उन्होंने कभी-कभार ही ऐसा किया जानकारी दी है। न ही पश्चिम बंगाल के पुलिस बलों द्वारा अवैध सीमा पार करने वाले तथा कानून तोड़ने वालों से लोगों की सुरक्षा के लिए उठाये गये कदमों के बारे में जानकारी दी है। यह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन पश्चिम बंगाल स्थित बीएसएफ अधिकारी भी राज्य के पुलिस बलों द्वारा स्थापित उदाहरण का अनुसरण कर रहे हैं, जो जनहित से जुड़े मामलों पर सोची-समझी चुप्पी बनाये रखते हैं। पश्चिम बंगाल स्थित प्रिंट मीडिया में कवरेज को देखते हुए, उन्होंने पूर्वोत्तर राज्यों में अपने समकक्षों के मीडिया-प्रेमी दृष्टिकोण का पालन नहीं किया है।

चाहे जो भी कारण हो, न तो पश्चिम बंगाल सरकार और न ही पश्चिम बंगाल स्थित बीएसएफ ने पारदर्शिता के मानदंडों का पालन किया है। लोकतंत्र में, अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे लोगों को उनके सामने आने वाले खतरों के बारे में जागरूक करें, खासकर कानून और व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा और रक्षा से संबंधित मामलों में।

लेकिन ढाका में 5 अगस्त को हुए तख्तापलट के बाद पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच संबंधों को प्रभावित करने वाले तनावपूर्ण हालात के दौरान, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव द्वारा एक भी व्यापक सार्वजनिक संदेश या भाषण नहीं दिया गया, बांग्लादेश में सशस्त्र भीड़ द्वारा हिंदुओं और ईसाइयों के खिलाफ किए जा रहे अत्याचारों की तो बात ही छोड़िए।

बीएसएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश सीमा पर ऐसे कई हिस्से हैं, जहां न तो कांटेदार बाड़ है और न ही अवैध रूप से सीमा पार करने वालों को रोकने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया में उनके विचार काफी हद तक उजागर हुए। अन्य रिपोर्टों के अनुसार, बाड़ न होने के कारण तस्करों या अपराधियों के लिए भारत में घुसपैठ करना आसान न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया है।

कुल 4100 किलोमीटर लंबी भारत-बांगलादेश सीमा में से, पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश सीमा 2217 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से लगभग 1000 किलोमीटर की सीमा कठिन भूभाग के कारण सीमांकित या बाड़ नहीं है। दोनों तरफ नदी के किनारों पर भूमि कटाव की समस्या थी। साथ ही नदियों के बहाव में बदलाव और मौसमी रूप से नदी के द्वीपों (चार) का दिखाई देना/गायब होना भी था, जिससे बाड़ लगाना मुश्किल हो गया था। स्वाभाविक रूप से, बीएसएफ को यह काम असामान्य रूप से कठिन लगा और दोनों तरफ के तस्कर/अपराधी इसका पूरा फायदा उठा रहे थे।

इससे भी बदतर समस्या बीएसएफ और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच कभी न खत्म होने वाली सार्वजनिक झड़पों की है। बीएसएफ लंबे समय से राज्य की जड़ता और बाड़ लगाने के लिए जमीन उपलब्ध कराने में अनिच्छा की शिकायत कर रही थी, लेकिन राज्य सरकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। आम धारणा यह है कि टीएमसी अपने मुस्लिम वोट बैंक की रक्षा करना चाहती थी। नतीजा: 1000 किलोमीटर लंबी सीमा कई सालों से अपेक्षाकृत असुरक्षित बनी हुई है, जबकि घुसपैठ में काफी वृद्धि हुई है।

जनगणना के दशक के आंकड़ों के अनुसार, आठ सीमावर्ती जिलों की जनसांख्यिकीय संरचना में मुस्लिम आबादी में बड़ी वृद्धि देखी गयी है।

संयोग से, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भारत की एकमात्र प्रमुख नेता थीं, जिन्होंने घोषणा की कि पश्चिम बंगाल बांग्लादेश से भाग रहे या हमलों का सामना कर रहे लोगों को मानवीय सहायता प्रदान करेगा। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी सरकार ने ममता के रुख का विरोध किया और बांग्लादेश ने विरोध करते हुए बनर्जी को याद दिलाया कि दो संप्रभु देशों के बीच उच्चतम स्तर पर क्षेत्रीय नीति को आकार देने में उनका कोई स्थान नहीं है। जो भी हो, पश्चिम बंगाल द्वारा अपनाये गये इस तरह के विरोधाभासी, यदि भ्रमित करने वाले नहीं, रुख ने दिल्ली और ढाका दोनों को परेशान कर दिया है, जिससे पहले से ही खराब द्विपक्षीय संबंधों में नये तनाव पैदा हो गये हैं। (संवाद)