नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2024-25 की दूसरी तिमाही के लिए जीडीपी वृद्धि लगभग 5.4 प्रतिशत है और पूरे वर्ष 2024-25 के लिए वृद्धि 2023-24 में 8.2 प्रतिशत की तुलना में 6.5 प्रतिशत अनुमानित है। यह भारत के विकास पथ पर एक बड़ा झटका है, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बहुचर्चित विकसित भारत कार्यक्रम के माध्यम से 2047 तक भारत को उच्च आय वाला देश बनाने की बात कर रहे हैं।

आइए भारतीय अर्थव्यवस्था के नवीनतम रुझानों पर नज़र डालें। पहला, लोगों का उपभोग पैटर्न और दूसरा, रोज़गार सृजन परिदृश्य। ये दोनों मुद्दे देश की अर्थव्यवस्था के विकास और लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के साथ जटिल रूप से जुड़े हुए हैं। विकास का मतलब सिर्फ़ उच्च जीडीपी आँकड़ा नहीं है। यह विकास की गुणवत्ता से संबंधित है और क्या जीडीपी वृद्धि में अतिरिक्त वृद्धि ने देश की आबादी के बड़े हिस्से को मज़दूरी, स्वास्थ्य और शिक्षा सहित अन्य सामाजिक संकेतकों में वृद्धि के मामले में मदद की है?

नरेंद्र मोदी सरकार के पिछले दस वर्षों से अधिक समय में, बुनियादी ढाँचे के विकास और निजी निवेश दोनों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों पर ज़ोर दिया गया। ग्रामीण और शहरी ग़रीबों तक धन पहुँचाने के लिए कोई विशेष कार्यक्रम नहीं थे। 2020 और 2021 में महामारी ने गरीबों और मध्यम वर्गों के जीवन स्तर को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया, जिसका असर उपभोग पर पड़ा। जैसा कि नवीनतम घरेलू उपभोग डेटा से पता चलता है, स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। खाद्य पदार्थों की उच्च कीमत ने निम्न और मध्यम वर्ग की गैर-खाद्य वस्तुओं की खरीद पर अधिक खर्च करने की क्षमता को खत्म कर दिया है। इसके अलावा स्वास्थ्य देखभाल की लागत ने पिछले दो वर्षों में बड़ी संख्या में लोगों को उनकी पिछली गरीबी स्तर से बाहर की स्थिति से गरीबी स्तर पर ला दिया है।

कुछ विशेषज्ञों द्वारा किये गये हाल के अध्ययनों से पता चला है कि नियमित श्रमिकों के लिए वास्तविक मजदूरी- जिसमें बेहतर वेतन वाली श्रेणी के लोग भी शामिल हैं, 2017-18 और 2022-23 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति वर्ष 0.9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 0.7 प्रतिशत की गिरावट आयी है। 2011-12 की तुलना में भी यह गिरावट वास्तविक है। इसका मतलब है कि निम्न मध्यम वर्ग के लोगों और तुलनात्मक रूप से बेहतर वर्गों की क्रय क्षमता में 2011-12 की तुलना में भी गिरावट आयी है। इससे मांग में सुस्ती आयी है, जैसा कि सभी एफएमसीजी कंपनियां कह रही हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में व्हाइट गुड्स सेक्टर का बाजार लोगों की भुगतान क्षमता कम होने के कारण गर्म हो रहा है। उपभोक्ता खाद्य पदार्थों, स्वास्थ्य और शिक्षा सहित आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति में बहुत व्यस्त हैं। गैर-खाद्य वस्तुओं की खपत की मांग में ठहराव इतना चिंताजनक हो गया है कि खुद सीईओ कम आय वाले परिवारों की खर्च करने की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार को तत्काल कुछ करने की आवश्यकता की बात कर रहे हैं।

व्हाइट गुड्स के निर्माताओं सहित देश के बड़े नियोक्ताओं के संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) को एफएमसीजी कंपनियों द्वारा व्हाइट गुड्स की मांग को बढ़ाने के लिए केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग लगातार मिल रही है। एक असामान्य मांग में, सीआईआई ने मांग को बढ़ाने के लिए शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों को कवर करने वाले कम आय वाले परिवारों को उपभोग वाउचर शुरू करने की योजना को अपने बजट प्रस्तावों में सूचीबद्ध किया है। इसके अलावा, सरकारी कार्यक्रमों के तहत दिये जाने वाले वेतन में वृद्धि और पीएम-किसान के तहत किसानों को दी जाने वाली नकद सहायता में वृद्धि होनी चाहिए।

भारतीय उद्योग निकाय आखिरकार वही बात कह रहे हैं जो वामपंथी दल और डॉ. अमर्त्य सेन और डॉ. प्रणब बर्धन जैसे कई प्रमुख अर्थशास्त्री लंबे समय से कहते आ रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ावा देने के लिए गरीबों को अधिक नकद भुगतान की आवश्यकता को रेखांकित कर रहे हैं। गरीबों और अन्य कम आय वाले परिवारों के पास खर्च करने के लिए अधिक पैसा होना चाहिए और इसी तरह खपत बढ़ेगी जिससे मांग में तेजी आयेगी।

मोदी सरकार ने निवेश के लिए उद्योग को बड़ी कर रियायतें दी हैं लेकिन निजी निवेश में तेजी नहीं आयी है क्योंकि निवेशक भी मांग-आपूर्ति की स्थिति के बारे में सुनिश्चित नहीं हैं। अब, जब उद्योग निकाय सरकार से ग्रामीण और शहरी गरीबों की खरीद क्षमता बढ़ाने के लिए अधिक धन खर्च करने का आग्रह कर रहे हैं, तो यह सही समय है कि मोदी सरकार 2025-26 के बजट में उनके लिए अधिक धन जुटाने के लिए कुछ विशिष्ट उपायों की घोषणा करे। इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। पहले ही बहुत देर हो चुकी है, लेकिन देर से ही सही ऐसा करना आवश्यक है।

मांग बढ़ाने के मुद्दे के अलावा, अगला जरूरी मुद्दा बड़ी संख्या में नौकरियों का सृजन करने की तत्काल आवश्यकता है। सरकार के अनुसार 2022-23 वित्तीय वर्ष में बेरोजगारी दर केवल 3.2% थी, जो गैर-आधिकारिक अध्ययनों में बतायी गयी दर की तुलना में बहुत कम है। निजी थिंक-टैंक, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने कहा कि मई 2024 में बेरोजगारी 7.0% थी, जो महामारी से पहले लगभग 6% थी, और जून 2024 में बढ़कर 9.2% हो गयी।

हमारे प्रधानमंत्री हाई टेक और एआई की बात करने के शौकीन हैं। उस क्षेत्र को बढ़ावा देने पर किसी को आपत्ति नहीं है। लेकिन इससे अतिरिक्त रोजगार सृजन की गुंजाइश सीमित है। हमें लाखों की संख्या में नौकरियों की जरूरत है और यह केवल श्रम प्रधान उद्योगों और एमएसएमई क्षेत्र के विस्तार और उसे बढ़ावा देने से ही पैदा हो सकती है। युद्ध स्तर पर नौकरियां पैदा करनी होंगी। रोजगार सृजन से लोगों के हाथों में अधिक आय होगी जिससे खपत और मांग में वृद्धि होगी।

ये दो तत्काल कार्य हैं। यदि तेल की कीमतें निम्न स्तर पर बनी रहती हैं तो 2025-26 में राजकोषीय स्थिति में सुधार हो सकता है। अभी तक यह पता नहीं है कि ट्रंप शासन की टैरिफ नीति अमेरिका को किये जाने वाले भारतीय निर्यात को किस तरह प्रभावित करेगी। लेकिन अमेरिकी सरकार का अंतिम निर्णय जो भी हो, हमारे नीति निर्माताओं को स्थिति से निपटने के लिए अपने स्वयं के विकल्प के साथ तैयार रहना होगा। नये वित्त वर्ष में मांग को बढ़ाने और रोजगार सृजन पर पूरा ध्यान केंद्रित करना होगा। यह तभी संभव है जब लोगों को खर्च करने के लिए अधिक धन उपलब्ध कराया जाये। अगर भारत की अधिकांश आबादी एक उभरती हुई बाजार अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं बन सकती तो विकसित भारत की सारी बातें बेमानी होंगी। (संवाद)