27 फरवरी, 2015 को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने भारत की संसद में खुद एक बयान दिया था, "मैं ऐसी बातें सुनता रहता हूं कि सरकार मनरेगा को खत्म करने की योजना बना रही है, या पहले ही कर चुकी है। मुझे पता है कि आप कई क्षेत्रों में मेरे अनुभव पर संदेह करते हैं लेकिन मुझे यकीन है कि आप स्वीकार करेंगे कि मेरे पास राजनीतिक कौशल है। मेरा राजनीतिक कौशल मुझे बताता है कि मनरेगा को खत्म नहीं करना चाहिए। मैं ऐसी गलती नहीं करूंगा क्योंकि मनरेगा आपकी विफलता का एक जीवित स्मारक है।"
सचमुच, उन्होंने मनरेगा योजना को केवल जीवित रखा और उसे कभी भी उस तरह से लागू नहीं होने दिया जैसी कि इसकी मूल अवधारणा थी। साल दर साल इसके बजट में कटौती की गई और कथित तौर पर योजना में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए इसमें कई तकनीकी और अन्य प्रक्रियात्मक तरीकों को शामिल करके कार्यान्वयन को कठिन बना दिया गया। जैसा कि हम देख रहे हैं कि अब मनरेगा योजना को बहुत बुरी तरह से लागू किया जा रहा है, जैसे कि सरकार इस योजना को कांग्रेस की विफलता के रूप में ही रुपांतरित करने के लिए प्रतिबद्ध थी, क्योंकि यह कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा लाई गई थी।
10 महीने पहले 18 मार्च, 2025 को राज्यसभा में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार इस योजना को नुकसान पहुंचा रही है। वह शून्यकाल के दौरान पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर योजनाबद्ध तरीके से मनरेगा योजना को कमजोर करने का आरोप लगा रही थीं।
मनरेगा योजना 2 फरवरी, 2006 को दिवंगत पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार द्वारा शुरू की गई प्रमुख गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम है और यह अधिनियम सितंबर 2005 में पारित किया गया था। 2006-07 में मनरेगा बजट आवंटन 11,300 करोड़ रुपये था जो 2013-14 में बढ़कर 33,000 करोड़ रुपये हो गया। मौजूदा कीमतों पर, 2006-07 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 37.9 लाख करोड़ रुपये था, और 2013-14 में यह 113.55 लाख करोड़ रुपये था। इसलिए, दोनों वर्षों के लिए मनरेगा योजना में आवंटन का प्रतिशत लगभग 0.29 था।
बाद में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में इस योजना का क्या हुआ? मनरेगा योजना को 2024-25 के लिए 86,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जो 2025-26 में 86,000 करोड़ रुपये पर स्थिर है। वर्ष 2025-26 के लिए सकल घरेलू उत्पाद का अनुमान वर्तमान कीमत पर 3,56,97,923 रुपये है, जबकि वर्ष 2024-25 के लिए संशोधित अनुमान 3,24,11,406 करोड़ रुपये है। इस प्रकार, सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में 2024-25 के लिए मनरेगा योजना का आवंटन 0.26 प्रतिशत था, और 2025-26 के लिए यह 0.24 प्रतिशत है।
आंकड़े खुद ही बोलते हैं, सोनिया गांधी ने ठीक ही कहा था कि बजट आवंटन 86,000 करोड़ रुपये पर स्थिर बना हुआ है – जो सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में 10 साल का सबसे निचला स्तर है। सोनिया ने कहा कि "लाखों ग्रामीण गरीबों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा जाल" होने के बावजूद" यह चिंता का विषय है कि “वर्तमान भाजपा सरकार ने योजना को व्यवस्थित रूप से कमजोर कर दिया है।" उन्होंने कहा, "इसके अलावा, अनुमान से पता चलता है कि आवंटित धन का लगभग 20 प्रतिशत पिछले वर्षों के लंबित बकाया को चुकाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।" सोनिया गांधी ने यह भी बताया था कि 2024-25 में मनरेगा श्रमिकों को 279 रुपये प्रति दिन की अधिसूचित दर पर औसतन 44.62 दिनों का काम मिला। सोनिया गांधी ने तब प्रति दिन कम से कम 400 रुपये की मजदूरी और साल में 100 दिन के कानूनी वादे के स्थान पर 150 दिन काम की मांग की थी। मनरेगा मजदूर साल में 200 दिन काम की मांग कर रहे हैं।
मनरेगा के तहत सरकार को ग्रामीण बेरोजगारों को मांग पर काम देना था, एक रूपरेखा जिसे नए ‘वीबी-जी राम जी’ बिल के तहत खत्म किया जा रहा है, जो एक नई आपूर्ति संचालित योजना रूपरेखा पेश करेगी। किस वजह से प्रधानमंत्री को अपना मन बदलना पड़ा और वह मनरेगा को क्यों बदलने जा रहे हैं? लगता है कि उनका पोषित सपना "कांग्रेस मुक्त भारत" की राजनीति ही इसका मूल है, और कुछ नहीं। जाहिर है इसका ग्रामीण मजदूरों से कोई लेना-देना नहीं है।
वीबी-जी राम जी बिल के प्रस्ताव इसे स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। नए आपूर्ति संचालित ढांचे के तहत, आवंटन एक निश्चित बजट के भीतर सीमित किया जाएगा जो केंद्र निर्धारित करेगा। इसके अलावा, रोजगार केवल केंद्र द्वारा अधिसूचित ग्रामीण क्षेत्रों में ही प्रदान किया जाएगा। यह हमें पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की याद दिलाता है, जिसके कारण राज्य में मनरेगा का कार्यान्वयन बंद कर दिया गया था। केंद्र ने राज्य को फंड भेजना बंद कर दिया था। अदालतों को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा जिसके परिणामस्वरूप कोलकाता उच्च न्यायालय और भारत के सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने महत्वपूर्ण कानूनी फैसले दिए।
जून 2025 में, कोलकाता उच्च न्यायालय ने केंद्र को पश्चिम बंगाल में इस योजना को 1 अगस्त, 2025 से फिर से शुरू करने का आदेश दिया। केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की। अक्टूबर 2025 में, सर्वोच्च न्यायालय ने कोलकाता उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए केंद्र की याचिका खारिज कर दी और योजना को फिर से शुरू करने का रास्ता साफ कर दिया। अब नया विधेयक केंद्र को यह अधिसूचित करने का अधिकार देता है कि नई योजना कहां लागू की जाएगी, जिससे न्यायिक जांच को दरकिनार किया जा सकेगा। इसका मतलब यह भी है कि देश भर के पूरे ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा का सार्वभौमिक कार्यान्वयन केवल कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रहेगा जहां केंद्र इसे लागू करने के लिए चुनेगा।
वीबी-जी राम जी बिल ने कानूनी तौर पर वायदा किए गए 100 दिनों के काम को बढ़ाकर 125 दिन कर दिया। यह बहुत कम है, जो किसी भी श्रमिक के लिए पूरे वर्ष अपने परिवार को खिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है, भले ही उन्हें वास्तव में वायदा के अनुसार काम दिया जाये। याद दिला दें कि पिछले साल 2024-25 में मनरेगा मजदूरों को औसतन केवल 44.62 दिन का काम दिया गया था, जो मोदी सरकार का निराशाजनक प्रदर्शन था। इस ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, यह बेहद संदिग्ध है कि मोदी सरकार वायदे के मुताबिक 125 दिन का काम देगी।
किसी योजना को कई तरीके से ध्वस्त किया जा सकता है। इस पर विचार करें। राज्य पहले से ही धन संकट से गुजर रहे हैं। वर्तमान में, मनरेगा के तहत, इस योजना के वित्तपोषण में केंद्र और राज्यों की हिस्सेदारी 90:10 प्रतिशत है। हालांकि, प्रावधान के तहत, केंद्र श्रम मजदूरी का 100 प्रतिशत और सामग्री लागत का 75 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है। बाकी खर्च राज्यों को वहन करना होगा। वीबी-जी राम जी विधेयक के तहत, राज्यों की हिस्सेदारी को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है। इसका मतलब है कि मोदी सरकार अपना हिस्सा 90 फीसदी से घटाकर सिर्फ 60 फीसदी करके अपनी वित्तीय जिम्मेदारी राज्यों पर डाल रही है।
उत्तर-पूर्व भारत और अन्य हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू और कश्मीर के लिए, वीबी-जी राम जी बिल कहता है कि फंडिंग में केंद्र और राज्यों की हिस्सेदारी 90:10 प्रतिशत होगी।
वीबी-जी राम जी विधेयक के तहत, केंद्र के पास कथित तौर पर "श्रम की उपलब्धता को सुविधाजनक बनाने" के लिए चरम कृषि मौसम के दौरान योजना को रोकने की शक्ति होगी। इसका मतलब है कि ग्रामीण श्रमिकों को सरकार की दया पर ऐसी जगह काम मिलेगा जहां अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में काम उपलब्ध होंगी। यह मजदूरों को एक जगह से दूसरी जगह ले हांकने जैसा होगा, जो उन्हें विवश करने के लिए गुलामों जैसा व्यवहार होगा।
मनरेगा योजना में तकनीकी हस्तक्षेप, जैसे मोबाइल ऐप-बेस उपस्थिति प्रणाली, जियोटैगिंग और आधार आधारित भुगतान प्रणाली, जो अनेक श्रमिकों को काम से बाहर कर रही है, को अब कानून में संहिताबद्ध किया जाएगा, हालांकि पूरे कार्यबल के लिए डिजिटल ढांचा तैयार नहीं है। सरकार भारत श्रम शक्ति नीति 2025, जो राष्ट्रीय रोजगार नीति होगी, के तहत डिजिटल ढांचा भी ला रही है। यह अनेक ग्रामीण श्रमिकों को काम से डिजिटल तरीके से बाहर कर देगा।
15 दिसंबर, 2025 को, वीबी-जी राम जी विधेयक की प्रति भारत की संसद के सदस्यों के बीच प्रसारित की गई, जिसमें कहा गया कि यह "विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप एक ग्रामीण विकास ढांचे की स्थापना करने वाला एक कानून है।” मनरेगा संघर्ष मोर्चा ने विधेयक को तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए आरोप लगाया है कि नया विधेयक ग्रामीण श्रमिकों के लिए नौकरी की गारंटी को वापस ले लेता है। (संवाद)
आखिर मांग आधारित मनरेगा को क्यों खत्म कर रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
2015 में मोदी इसे कांग्रेस की विफलता के जीवित स्मारक के रूप में रखना चाहते थे
डॉ. ज्ञान पाठक - 2025-12-17 11:43 UTC
भारत की केंद्र सरकार लोकसभा में विकसित भारत - रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक (वीबी-जी राम जी) पेश करने के लिए तैयार है, जो वर्तमान महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 को खत्म करेगा जिसके तहत मांग आधारित मनरेगा योजना को जीवित रखा जा रहा है, अगर हम प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों पर विश्वास करें। मांग आधारित मनरेगा योजना ढांचे को खत्म कर दिया जाएगा और नए कानून के तहत एक नई "आपूर्ति आधारित योजना" शुरू की जाएगी।