सरकारी बजट दस्तावेज़ों के अनुसार, 2026–27 में बच्चों से जुड़े कुल आवंटन 1.32 लाख करोड़ रुपयेसे अधिक हो गए हैं, जो पिछले वर्ष के कुल आवंटन 1.16 लाख करोड़ रुपयेकी तुलना में लगभग 16 हजार करोड़ रुपयेअधिक हैं। कुल केंद्रीय बजट में बाल बजट की हिस्सेदारी 2.47 प्रतिशत तक पहुंची हैऔर जीडीपी के अनुपात में यह 0.34 प्रतिशतहै। इनआंकड़ोंसे यह स्पष्ट है कि बजट में वृद्धि हुई है, लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि भारत जैसे देश में, जहां आबादी का बड़ा हिस्सा बच्चों और किशोरों का है, यह हिस्सेदारी अभी भी सीमित है।
बच्चों की ज़रूरतें केवल स्कूल में दाख़िले या भोजन तक सीमित नहीं हैं। पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल, सुरक्षित वातावरण, संरक्षण और सीखने के अवसर—ये सभी बाल विकास की बुनियादी शर्तें हैं। बजट में स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी कुछ अहम योजनाओं में बढ़ोतरी की गई है। आंगनवाड़ी और पोषण सेवाओं के लिए आवंटन बढ़ा है, स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना को अतिरिक्त संसाधन मिले हैं और सुरक्षित पेयजल को बच्चों के स्वास्थ्य से जोड़ते हुए जल जीवन मिशन को फिर से बाल बजट का हिस्सा बनाया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में भी बजट कुछ सकारात्मक संकेत देता है। समग्र शिक्षा अभियान को पहले से अधिक संसाधन मिले हैं। आदिवासी बच्चों के लिए एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में उल्लेखनीय निवेश किया गया है। नवोदय और केंद्रीय विद्यालयों के बजट में बढ़ोतरी तथा सरकारी स्कूलों में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए अटल टिंकरिंग लैब्स के लिए बड़ा प्रावधान यह दर्शाता है कि शिक्षा को केवल नामांकन तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि सीखने की गुणवत्ता और कौशल विकास पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा, अधिक चिंताजनक पहलू भी है। समानता पर आधारित योजनाओं—खासतौर पर छात्रवृत्तियों—में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं दिखती। अनुसूचित जाति के बच्चों के लिए प्री और पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्तियों में कोई वृद्धि नहीं हुई है, जबकि अन्य वंचित वर्गों के लिए केवल मामूली इजाफा किया गया है। इसका सीधा असर उन बच्चों पर पड़ता है, जिनके लिए छात्रवृत्ति शिक्षा में बने रहने का एकमात्र सहारा होती है। शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित किए बिना विकास की बात अधूरी रह जाती है।बच्चों के संरक्षण से जुड़ी योजनाओं में भी बजटीय वृद्धि सीमित रही है। बाल श्रम, तस्करी, हिंसा, शोषण और देखभाल की ज़रूरत वाले बच्चों की चुनौतियां किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों को मजबूत करना केवल प्रशासनिक ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व भी है। यहां सवाल यह उठता है कि क्या मौजूदा आवंटन ज़मीनी स्तर पर प्रभावी सुरक्षा तंत्र खड़ा करने के लिए पर्याप्त है।
इसी संदर्भ में चाइल्ड राइट्स एंड यू की प्रतिक्रिया विशेष महत्व रखती है। संस्था का कहना है कि बाल बजट में हुई बढ़ोतरी सकारात्मक मंशा को दर्शाती है, लेकिन यह भारत की जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं और बच्चों की बढ़ती विकासात्मक जरूरतों के मुकाबले अपर्याप्त है। चाइल्ड राइट्स एंड यू के अनुसार स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा में क्रमिक बढ़ोतरी स्वागतयोग्य है, पर समावेशी और टिकाऊ विकास के लिए बच्चों को कहीं अधिक स्पष्ट और मजबूत प्राथमिकता देना ज़रूरी है। केवल साल-दर-साल मामूली वृद्धि से असमानताओं को दूर नहीं किया जा सकता।जेंडर-उत्तरदायी बजट में बढ़ोतरी का उल्लेख भी इस बहस में महत्वपूर्ण है, क्योंकि लड़कियों की शिक्षा, किशोरियों का पोषण और सुरक्षा सीधे तौर पर बाल विकास से जुड़े हुए हैं। हालांकि समग्र रूप से जेंडर बजट का दायरा बढ़ा है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि इसका लाभ समाज के सबसे कमजोर तबकों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचता है।
कुल मिलाकर, बाल बजट 2026–27 बड़े बदलाव की बजाय सीमित और क्रमिक सुधार को दर्शाता है। अगर भारत को सतत और समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ना है, तो आने वाले बजटों में उचित संसाधनों, समानता और दीर्घकालिक सोच के साथ बच्चों को कहीं ज्यादा मजबूती से वित्तीय योजना के केंद्र में रखना होगा। (संवाद)
बाल बजट : बढ़ती चुनौतियां, सीमित संसाधन
वित्तीय योजना में बच्चों की केंद्रीयता का सवाल
राजु कुमार - 2026-02-05 12:00 UTC
केंद्रीय बजट को प्रायः राजकोषीय प्राथमिकताओं का दस्तावेज़ माना जाता है, लेकिन उसमें बच्चों से जुड़े प्रावधान यह भी स्पष्ट करते हैं कि राज्य दीर्घकालिक विकास को किस तरह परिभाषित करता है। बाल संबंधी आवंटन केवल सामाजिक क्षेत्र तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे मानव पूंजी, भविष्य की उत्पादकता और असमानताओं की दिशा को भी प्रभावित करते हैं। इसी संदर्भ में केंद्रीय बजट 2026–27 में बच्चों के लिए आवंटन में कुछ बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि नीति-निर्माण में बच्चों के महत्व को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया गया है। फिर भी, असली सवाल यह नहीं है कि राशि बढ़ी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इस बढ़ोतरी के साथ बच्चों को वास्तव में विकास की प्राथमिकताओं के केंद्र में रखा गया है और क्या यह निवेश उनकी वास्तविक ज़रूरतों और देश की जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के अनुरूप है।