सुब्बाराव जी का जीवन सादगी, सेवा और अहिंसा के मूल्यों से निर्मित था। उनका जन्म 7 फरवरी 1929 को कर्नाटक के सेलम में हुआ। पिता वकील थे, किंतु किशोरावस्था में ही वे महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ आंदोलन से गहराई से प्रभावित हुए। मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ‘भारत छोड़ो’ के नारे लिखे और कक्षाओं का बहिष्कार किया। इस दौरान उन्हें एक दिन के लिए पुलिस हिरासत में भी रखा गया। पढ़ाई के साथ-साथ वे सेवादल से जुड़े और 1950 के दशक में कांग्रेस सेवादल के सक्रिय कार्यकर्ता बने। विधि की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत को जीवन-लक्ष्य न बनाकर समाज सेवा को अपना मार्ग चुना।

स्वतंत्रता के बाद उनका कार्य राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव और रचनात्मक कार्यों के विस्तार से जुड़ा रहा। वर्ष 1969 में गांधी जन्मशताब्दी के अवसर पर भारत सरकार द्वारा संचालित गांधी रेल प्रदर्शनी को पूरे देश में ले जाने की जिम्मेदारी उन्होंने निभाई। इसके बाद चंबल क्षेत्र में शांति स्थापना के प्रयासों से उनका नाम विशेष रूप से जुड़ा। जौरा में महात्मा गांधी सेवा आश्रम की स्थापना कर उन्होंने चंबल घाटी में संवाद, विश्वास और अहिंसा की राह खोली। 1970 के दशक में हुए ऐतिहासिक बागी आत्मसमर्पण और पुनर्वास में उनकी भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने सैकड़ों बागियों को केवल हथियार छोड़ने के लिए नहीं, बल्कि समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक लौटने के लिए प्रेरित किया। विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण जैसे वरिष्ठ गांधीवादियों के मार्गदर्शन में चंबल में अहिंसा की एक नई परंपरा गढ़ी गई।

सुब्बाराव जी का विश्वास था कि चरित्र निर्माण के बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं है। युवाओं को वे देश की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। इसी सोच से राष्ट्रीय युवा योजना की स्थापना हुई। इसके माध्यम से देशभर में नेतृत्व, सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, जल-संरक्षण और आपदा राहत से जुड़े शिविर आयोजित किए गए। यह कार्य केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, लद्दाख, अंडमान और लक्षद्वीप जैसे दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचा। इन शिविरों के जरिए धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की दीवारों को तोड़ते हुए युवाओं में एकता और मानवता की भावना विकसित की गई।

1990 के दशक में जब देश सांप्रदायिक तनाव के दौर से गुजर रहा था, तब सुब्बाराव जी ने सद्भावना रेल यात्रा के माध्यम से शांति और भाईचारे का संदेश दिया। दो चरणों में चली इस यात्रा में देश के विभिन्न राज्यों से हजारों युवा शामिल हुए। रेल ही उनका घर बनी और अलग-अलग शहर उनकी कर्मभूमि। साइकिल रैलियों और सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि भारत की आत्मा विविधता में एकता और परस्पर सम्मान में निहित है।

व्यक्तिगत जीवन में सुब्बाराव जी सादगी और अनुशासन के प्रतीक थे। वे युवाओं से ‘एक घंटा देश को, एक घंटा देह को’ देने की बात कहते थे। अपना अधिकांश काम स्वयं करते, सादा जीवन जीते और सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान रखते थे। अनेक भारतीय भाषाओं का ज्ञान रखने वाले भाईजी का विश्वास था कि ‘सर्व धर्म-समभाव’ ही भारतीय समाज को जोड़ने की सबसे मजबूत कड़ी है।

27 अक्टूबर 2021 को उनके निधन के बाद भी उनके विचार और आदर्श आज के समय में और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। जब दुनिया हिंसा, विभाजन और असहिष्णुता से जूझ रही है, तब उनका अहिंसक और सेवा-आधारित मार्ग ही समाज और राष्ट्र को स्थायी शांति की दिशा में ले जा सकता है। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर यदि हम सेवा, सद्भाव और सामाजिक जिम्मेदारी को अपने आचरण में उतार सकें, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। (संवाद)