यह पुस्तक बेरोज़गारी, असमानता, पर्यावरण संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि सभी की याद दिलाती है और इस बात पर बल देती है कि ये सब समय के संकेत हैं। यदि हम इन्हें अनसुना करते हैं, तो समय आगे बढ़ जाएगा, लेकिन हमारी समस्याएं और गहरी हो जाएंगी। समय चेतावनी देता है, दंड नहीं—पर चेतावनी की अनदेखी दंड में बदल जाती है।

पुस्तक इस बात पर बल देती है कि समय से संवाद का अर्थ केवल वर्तमान को समझना नहीं, भविष्य के प्रति उत्तरदायी होना भी है। आने वाली पीढ़ियां हमसे सवाल करेंगी—हमने उन्हें कैसा समय सौंपा? अवसरों से भरा या संकटों से घिरा? सुरक्षित या अस्थिर? यह संवाद आज ही शुरू करना होगा, क्योंकि भविष्य उसी समय का विस्तार है, जिसे हम आज जी रहे हैं।

पुस्तक के लेखक शक्ति शरण सिंह एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिसके कारण जहां एक ओर उनकी भाषा में रिपोर्ताज की महक है तो दूसरी ओर मित्रों के बीच होने वाले संवाद की मुक्त धारा की झलक भी। लेखक इस बात पर बल देते हुए लगते हैं कि स्मृति विस्मृत नहीं होतीं, और वह विख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘जो बीत गयी सो बात गयी’ के विवेक पर प्रश्न कर बैठते हैं और पूछते हैं कि क्या वाक़ई गहरे ज़ेहन में असर करने वाली कुछ बातें बीती हुई महसूस होती हैं! नहीं, बहुत-सी यादें उनमें लिपटी हुई, अक्सर साथ चलती हैं।

यह इस बात का एक उदाहरण है कि लेखक किस प्रकार चीजों को नये सिरे से सोचने के पक्षधर हैं। वह बतकही में कही-अनकही बातों और यादों को भी विचारण के केन्द्र में रखने पर बल देते हैं यह कहते हुए, “कितनी स्मृतियाँ हैं, उनमें कितनी बातें हैं जो यथार्थ से शुरू होती हैं और धीरे-धीरे स्वप्न में तब्दील हो जाती हैं।“

बतकही में कही-अनकही की बातों पर लेखक का मानना है कि बिना किसी आग्रह-दुराग्रह के, पूरी स्वच्छंदता के साथ बतकही करना एक महत्त्वपूर्ण और सुखद अनुभव होता है। ‘संवाद’ में उम्मीद का ज़िक्र स्वतः शामिल है, एक-दूसरे की आंखों में आशा की किरणें दिखती हैं। संवाद मानो पेड़ हो, उसपर उगी अनगिनत पत्तियां मानो कान, जो अपनी सरसराहट से हमसे बात करती हैं। ये पेड़ अपने तनों का सहारा देकर, हमें गिरने से बचाता है।

यह वह समय होता है जब हम अपने एहसासों, विचारों और अनुभवों को बिना झिझके खुलकर साझा करते हैं। ’बतकही’ दरअसल हमें सहज बनाता है, अपने संदेश को स्पष्टता से और सही ढंग से रखने के लिए। आज का दौर डिजिटल क्रान्ति का दौर है, एक ओर यहां विशेषकर युवाओं को अनगिनत प्लेटफार्म हासिल हैं जहां वे पूरी आज़ादी से अपने विचारों को अभिव्यक्त करते हैं लेकिन दूसरी ओर स्मार्ट फ़ोन, इंटरनेट ने सामाजिक सम्पर्क, संचार और आत्म-अभिव्यक्ति को नए ढंग से परिभाषित भी किया है। हालांकि यह डिजिटल विसर्जन, मानसिक स्वास्थ्य, गोपनीयता और रिश्तों की प्रामाणिकता पर तमाम तरह के प्रभावों को लेकर चिंता पैदा करता है।

आज का युवा तकनीकी प्रगति, तेज़ी से बदलती सामाजिक-आर्थिक रूप से गतिशील और विकसित हो रहे सांस्कृतिक मूल्यों से प्रेरित होकर अज्ञात महासागरों में गोता लगा रहा है। वे संभवतः समझ नहीं पा रहे हैं कि असल में यह अज्ञात महासागर उनके मौलिकता के लिए ज़रूरी तत्व को उनसे दूर कर रहा है, उन्हें चकमा दे रहा है।

जैसे-जैसे वे इस डिजिटल सागर में और गहरे जाते हैं, वे इससे उत्पन्न चुनौतियों के समाधान के बजाए विभिन्न प्रकार की समस्याओं में धंसते चले जाते हैं। ऐसे में सार्थक संवाद ही वह प्राथमिक तरीक़ा है जिससे ज़िंदगी को और बेहतर जीना, और समाधान की ओर मुसलसल आगे बढ़ा जा सकता है। ज़िंदगी के हर पड़ाव में, चाहे वह हमारे सभी सम्बंधों या पार्टनरशिप का हो, संवाद ही है जो इन सम्बन्धों के बीच एक ऐसा पुल निर्मित करता है जिसके माध्यम से हम अपने भावों, ख़ुशियों के साथ-साथ अपनी तकलीफ़ों को भी बड़ी आसानी से व्यक्त कर पाते हैं। संवाद तमाम तरह के बोझ से हमें निश्चित तौर पर हल्का करता है। तभी हम मुसीबत के समय में भी पूरे धैर्य से काम करते हैं, और समस्या को हल करने की दिशा में आगे बढ़ पाते हैं।

अंततः हम यह कह सकते हैं कि संवाद हमारे सम्बन्धों के लिए एक महत्त्वपूर्ण और ज़रूरी उपकरण है, इससे आस-पास भी और अन्य हमारे आत्मीय लोगों से एक स्वस्थ, स्थाई और संजीवनी सम्बन्ध बना रहता है।

लेखक कहते हैं, “इसलिए संवाद को ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा मानना चाहिए। संवाद को निरन्तर अपने जीवन में बनाए रखिए, इसे रुकने मत दीजिए। रुक भी जाए तो अपनी तरफ़ से कभी टूटने मत दीजिए…यह किताब ‘कही-अनकही’ सार्थक संवाद के तासीर को ज़िन्दगी में बनाए रखने, उसे स्थापित करने का प्रयास मात्र है। मेरे जीवन अनुभव से मैंने संवाद की महत्ता को जैसा महसूस किया, उसे कुछ क़िस्सों के हवाले से अब आपको सौंपता हूं। प्रेम, लगाव, दोस्ती में बातों-मुलाक़ातों, बतकही के कई रंग होते हैं, कुछ रंग जो यहां अपनी कलम से उतार सका, वह आपके हवाले करता हूं।“

पुस्तक का नामः समय से संवाद
लेखक: शक्ति शरण सिंह
मूल्य – 195 रुपये
पेपरबैक, पृष्ठ – 88
प्रकाशक – आकृति प्रकाशन
एफ- 29, सादतपुर एक्सटेंशन
करावल नगर, दिल्ली - 110090