दशकों से मध्यपूर्व भारत के लिए एक ज़रूरी आर्थिक जीवनरेखा रहा है: ऊर्जा का आपूर्तिकर्ता, लाखों भारतीय कामगारों के लिए एक ठिकाना, और भारतीय निर्यात के लिए एक ज़रूरी बाजार। अब जब मिसाइल हमलों और नौसैनिक टकरावों से समुद्री परिवहन मार्ग में रुकावट आने और खाड़ी की अर्थव्यवस्थाओं के अस्थिर होने का खतरा है, तो नई दिल्ली में नीति बनाने वाले और अर्थशास्त्री इसके संभावित नतीजों का हिसाब लगाने लगे हैं।
चिंता सिर्फ़ ऊर्जा सुरक्षा तक ही सीमित नहीं है। अगर यह लड़ाई लंबी चली तो वहां काम करने वाले भारतीयों द्वारा भारत में भेजी जाने वाली 50 अरब डॉलर से ज़्यादा के धनप्रेषण, एयरलाइनों का संचालन, फार्मास्यूटिकल निर्यात, आभूषणों का व्यापार और यहां तक कि भारत के सिले हुए वस्त्रा उद्योग में भी रुकावट आ सकती है।
ऑक्सफ़ोर्ड इकोनॉमिक्स की अग्रणी अर्थशास्त्री एलेक्जेंड्रा हरमन ने कहा, “मध्यपूर्व भारत के लिए सिर्फ़ तेल आपूर्तिकर्ता नहीं है। ... यह धनप्रेषण, व्यापार का निरन्तरता और ऊर्जा आयात के ज़रिए भारत के बाहरी संतुलन में गहराई से जुड़ा हुआ है। वहां कोई भी लंबे समय तक अस्थिरता भारतीय अर्थव्यवस्था पर ज़रूर असर डालेगी।”
शायद सबसे बड़ी कमज़ोरी खाड़ी देशों में भारतीय कामगारों के बड़े नेटवर्क में है। भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा रेमिटेंस पाने वाला देश है, जिसे पिछले वित्त वर्ष में लगभग 135 अरब डॉलर मिले। उस धनप्रेषण का लगभग 38 प्रतिशत – 50 अरब डॉलर से ज़्यादा – खाड़ी देशों से आता है, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान शामिल हैं।
इस इलाके में लगभग नब्बे लाख भारतीय रहते हैं, जिनमें से कई विनिर्माण, खनिज तेल सर्विस, हॉस्पिटैलिटी और खुदरा क्षेत्र में काम करते हैं – ये ऐसे क्षेत्र हैं जो भूराजनीतिक संकट के दौरान तेज़ी से सिकुड़ते हैं।
एस एंड पी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस में एशिया-पैसिफिक कंट्री रिस्क की प्रमुख दीपा कुमार ने कहा, “अगर संघर्ष से खाड़ी देशों में आर्थिक गतिविधियों में रुकावट आती है, तो प्रवासी कामगारों को नौकरी जाने या वेतन में कमी का सामना करना पड़ सकता है। ... रेमिटेंस में लगातार गिरावट से भारत का चालू खाता घाटा बढ़ेगा और रुपये पर दबाव पड़ सकता है।” रेमिटेंस खास तौर पर बहुत ज़रूरी हैं केरल, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश जैसे कई भारतीय राज्यों में, जहां अनेक परिवार विदेश में काम करने वाले रिश्तेदारों से घर भेजी जाने वाली रकम पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहते हैं।
अर्थशास्त्री बताते हैं कि संकट के शुरुआती दौर में कभी-कभी रेमिटेंस कुछ समय के लिए बढ़ जाता है, क्योंकि कामगार सावधानी के तौर पर ज़्यादा पैसे घर भेजते हैं। हरमन ने कहा, “अगर प्रवासी कामगार बचत वापस लाने के लिए जल्दी करते हैं, तो थोड़े समय के लिए बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन अगर संघर्ष महीनों तक जारी रहता है और रोज़गार के मौके कम हो जाते हैं, तो कुल मिलाकर प्रवाह कमज़ोर हो जाएगा।”
भारत अपनी कच्चे खनिज तेल की ज़रूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है, और इस आपूर्ति का ज़्यादातर हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से ही आता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य — जिससे होकर दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल आपूर्ति गुज़रती है — मौजूदा लड़ाई में उत्तेजना का एक बिंदु बन गया है, जिससे शिपिंग इंश्योरेंस का खर्च बढ़ रहा है और कुछ जहाज़ मिसाइल या ड्रोन हमलों से बचने के लिए अपना रास्ता बदल रहे हैं। भारत के लिए, इसके नतीजे तुरंत हो सकते हैं।
कच्चे खनिज तेल की ज़्यादा कीमतें सीधे आयात बिल में बढ़ोतरी का कारण बनती हैं। भारत के व्यापार घाटे में तेल का पहले से ही एक बड़ा हिस्सा है, और कीमतों में लगातार बढ़ोतरी सरकार के लिए मुद्रस्फीति के प्रबंधन को मुश्किल बना सकती है।
मुंबई के एक निवेश बैंक के ऊर्जा विश्लेषक ने अपने ग्राहकों की संवेदनशीलता के मद्देनजर नाम न बताने की शर्त पर कहा, "अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बढ़ती हैं, तो भारत की समष्टि अर्थव्यवस्था का संतुलन दबाव में आ जाएगा।"
ईंधन का खर्च परिवहन से लेकर रासायनिक खाद तक हर चीज़ पर असर डालता है, जिसका मतलब है कि मुद्रास्फीति पूरी अर्थव्यवस्था में फैल सकती है। भारत की हवाई परिवहन उद्योग भी दबाव महसूस कर रही है।
सैन्य कार्रवाई के कारण मध्यपूर्व के कुछ हिस्सों में आकाशमार्ग पर रोक होने के कारण, भारतीय एयरलाइंस को यूरोप और उत्तर अमेरिका के लिए अपनी उड़ानों का रास्ता बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। लंबे रूट का मतलब है ज़्यादा ईंधन की खपत और बढ़ी हुई संचालन लागत।
एयर इंडिया, इंडिगो और विस्तारा जैसी एयरलाइंस गल्फ़ एयर कॉरिडोर से रोज़ाना दर्जनों हवाई जहाज चलाती हैं। कोई भी लगातार रुकावट टिकटों की कीमतें बढ़ा सकती है और पहले से ही कम एयरलाइन के लाभ के अन्तर को और कम कर सकती है।
सीएपीए इंडिया के विमानन विश्लेषक कपिल कौल ने कहा, "हवाईक्षेत्र बंद होने से लंबी दूरी की उड़ानों में घंटे बढ़ सकते हैं। ईंधन की कीमतें बढ़ जाती है, वायुयान के संचालन दल को काम पर तैनात करने में मुश्किलें हो जाती है और एयरलाइंस आखिरकार उन लागतों को यात्रियों पर डाल देती हैं।" पहले से ही अस्थिर ईँधन की कीमतों से जूझ रही इंडियन एयरलाइन्स के लिए, इस संकट से लाभ और कम होने का खतरा है।
इंडिया का फ़ार्मास्यूटिकल उद्योंग — जिसे अक्सर "दुनिया की फ़ार्मेसी" कहा जाता है — की मध्यपूर्व में भी बड़ी मौजूदगी है। सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात और इराक जैसे देश भारतीय जेनरिक दवाओं के बड़े आयातक हैं। लॉजिस्टिक्स या वित्तीय प्रणाली में रुकावट शिपमेंट और भुगतान पर असर डाल सकती है।
उन्होंने कहा, "खाड़ी क्षेत्र भारतीय दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए एक ज़रूरी निर्यात मंजिल हैं।"
हैदराबाद की एक फार्मास्यूटिकल कंपनी के वरीय कार्यपालक अधिकारी ने कहा, “शिपिंग में कोई भी देरी या बैंकिंग चैनल में रुकावट से डिलीवरी धीमी हो सकती है। अगर पाबंदियों की प्रणाली सख्त होती है या क्षेत्रीय वित्तीय नेटवर्क पर असर पड़ता है, तो निर्यातकों को भुगतान तय करने में और मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।”
एक और क्षेत्र जो इस झगड़े को घबराहट से देख रहा है, वह है भारत का रत्न और आभूषण उद्योग। खाड़ी देश — खासकर दुबई — हीरे और सोने के लिए एक अहम व्यापारिक केन्द्र है। भारतीय व्यापारी आयात और पुनर्निर्यात के लिए दुबई के सोने के बाजार पर निर्भर हैं। क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधि में मंदी या वित्तीय प्रवाह में रुकावट से आभूषण जैसी लग्ज़री चीज़ों की मांग कम हो सकती है।
जेम एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के एक उद्योग प्रतिनिधि ने कहा, “दुबई असल में वैश्विक सोने के व्यापार का नर्व सेंटर है। अगर क्षेत्रीय अस्थिरता पर्यटन या उपभोक्ता खर्च पर असर डालती है, तो इसका असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ेगा।” भारत का आभूषण उद्योग लाखों लोगों को नौकरी देता है और निर्यात राजस्व में बड़ा योगदान देता है, जिससे यह खाड़ी देशों में लंबे समय तक आर्थिक रुकावटों के प्रति कमजोर हो जाता है।
भारत के टेक्सटाइल और सिले वस्त्रों के निर्यातक मध्यपूर्व को भी अपने अहम बाजार में गिनते हैं। यूनाइटेड अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों में खुदरा क्षेत्र में भारतीय कपड़ों की बड़ी मात्रा में खपत होती है। अगर आर्थिक अनिश्चितता या राजनीतिक अस्थिरता के कारण उपभोक्ता मांग कमजोर होती है, तो ऑर्डर कम हो सकते हैं।
क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रमुख संरक्षक राहुल मेहता ने कहा, "मध्यपूर्व भारतीय कपड़ों के निर्यात के लिए एक स्थिर बाजार रहा है। अगर वहां विनिर्माण और पर्यटन धीमा हो जाता है, तो खुदरा मांग आखिरकार कम हो जाएगी।" इसका असर भारत के बड़े टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ सकता है, जो लाखों कामगारों को सहयोग देता है।
यह टकराव वैश्विक शिपिंग लेन को भी खतरे में डालता है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी के आसपास। भारत आयात और निर्यात दोनों के लिए इन रास्तों पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इस इलाके में चलने वाले जहाजों के इंश्योरेंस प्रीमियम पहले ही बढ़ने लगे हैं, जिससे समुद्री व्यापार की लागत बढ़ रही है।
कुछ शिपिंग कंपनियां सुरक्षा की स्थिति में सुधार होने तक दूसरे रास्तों पर विचार कर रही हैं या कार्गो आवाजाही में देरी कर रही हैं। मुंबई में एक लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ ने कहा, "अगर शिपिंग लागत काफी बढ़ जाती है, तो भारतीय निर्यातकों पर दबाव पड़ेगा। कई क्षेत्रों में मार्जिन पहले से ही कम हैं।" भूराजनीतिक तनाव के बावजूद, भारतीय वित्तीय बाजार अब तक काफी मज़बूत रहे हैं। हालांकि, अर्थशास्त्री चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक अस्थिरता से पूंजी का बहिर्गमन, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
एक वैश्विक निवेश कंपनी के एक वरीय अर्थशास्त्री ने कहा, "अगर तेल की कीमतें एक ही समय में बढ़ती हैं और रेमिटेंस कम होता है, तो इससे भारत के भुगतान संतुलन पर दबाव पड़ेगा। रुपया कमजोर हो सकता है, जिससे सेंट्रल बैंक को दखल देना पड़ सकता है।"
भारत ने पारम्परिक रूप से खाडी देशों और ईरान दोनों के साथ करीबी रिश्ते बनाए रखे हैं, और एक नाजुक राजनयिक संतुलन बनाए रखा है। लेकिन मौजूदा लड़ाई ने नई दिल्ली को एक मुश्किल स्थिति में डाल दिया है: आर्थिक तौर पर इस इलाके पर बहुत ज़्यादा निर्भर होने के बावजूद, युद्ध के नतीजे पर असर डालने में यह काफी हद तक कमज़ोर है।
फिलहाल, नीति बनाने वाले इस घटनाक्रम पर सावधानी से नज़र रख रहे हैं। भारत के रणनीतिगत पेट्रोलियम रिज़र्व अल्पावधि में तेल आपूर्ति में रुकावटों के खिलाफ कुछ राहत देते हैं। ऊर्जा आयात में विविधिकरण और मध्यपूर्व के बाहर व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करना भी दीर्घावधि नीति प्रथमिकताएं हैं। फिर भी, अर्थशास्त्रियों का कहना है कि देश एक बड़े खाड़ी युद्ध के आर्थिक झटकों से खुद को पूरी तरह से नहीं बचा सकता।
हरमन ने कहा, “मध्यपूर्व कई तरह से भारत के आर्थिक ढांचे से जुड़ा हुआ है। अगर लड़ाई बढ़ती है या महीनों तक चलती है, तो इसका असर सभी क्षेत्रों पर पड़ेगा — रेमिटेंस और ऊर्जा से लेकर निर्यात और वित्तीय बाजार तक।”
खाड़ी से आय पर निर्भर लाखों भारतीय परिवारों के लिए, और इस इलाके की आर्थिक किस्मत से जुड़े उद्योगों के लिए, मध्यपूर्व में चल रहा युद्ध कोई दूर का भूराजनीतिक नाटक नहीं है। यह एक उभरती हुई आर्थिक सच्चाई है जिसके नतीजे जल्द ही भारत के दरवाज़े तक पहुंच सकते हैं। (संवाद)
ईरान युद्ध के पांच दिन बाद, भारत को इसका असर महसूस होने लगा
बढ़ते जोखिम का सामना कर रहे हैं भारत को धनप्रेषण, ऊर्जा, और मुख्य निर्यात क्षेत्र
टी एन अशोक - 2026-03-06 11:16 UTC
जैसे-जैसे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच लड़ाई और गहरी होती जा रही है, भारत —जो लड़ाई के मैदान से हज़ारों मील दूर है— खुद को कई तरह के आर्थिक जोखिमों का सामना करते हुए पा रहा है जो तेल की बढ़ती कीमतों से परे कहीं ज़्यादा हैं।