जो फारस की खाड़ी में एक दूर के सैन्य टकराव के तौर पर शुरू हुआ था, वह तीन हफ़्तों के अंदर, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक आर्थिक आपातकाल में बदल गया है — जिसके राजनीतिक नतीजे मोदी सरकार के लिए किसी भी विपक्षी अभियान से कम नुकसानदायक साबित नहीं होगा।
पहले झटके विमानन क्षेत्र में महसूस किए गए। 28 फरवरी से 9 मार्च तक, इंडिगो और एयर इंडिया मिडिल ईस्ट, यूरोप और नॉर्थ अमेरिका के लिए अपनी 1,230 उड़ानों में से 64 प्रति शत नहीं चला पाए। मध्य पूर्व का वायु मार्ग बंद है जबकि पाकिस्तान के ऊपर से उड़ानों पर अप्रैल 2025 से ही प्रतिबंध लागू है।
इससे विमानों का संचालन लागत बढ़ गया है क्योंकि उनके अन्तर्राष्ट्रीय मार्ग बदल गये हैं, दूरियां अधिक हो गयी हैं और ईंधन का खर्च, जो पहले से ही संचालन लागत का 30 से 40 प्रतिशत है, पर अतिरिक्त 11 प्रतिशत फेडरल कर, और कुछ जगहों पर कर 29 प्रतिशत तक बढ़ गया है।
एयर इंडिया, जिसे पिछले साल से ही $433 मिलियन का नुकसान हो रहा है और अकेले पाकिस्तान एयरस्पेस बैन से सालाना $600 मिलियन का नुकसान होने का अनुमान है, अब एक साथ दूसरे संकट से भी जूझ रही है।
विमानन के अलावा, ऊर्जा का झटका भारत के औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला में तेज़ी से फैल रहा है। कतर का एलएनजी उत्पादन रुकने और होर्मुज होकर शिपिंग में आयी रुकावट के कारण गेल और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने औद्योगिक उपभोक्ताओं को गैस की आपूर्ति या तो कम कर दी है या रोक दी है।
रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 94 रुपया प्रति डालर से ऊपर हो गया है। रिज़र्व बैंक ने रुपये को स्थिर करने के लिए लगभग 12 अरब डालर का भंडार बेचा है और नकद बनाए रखने के लिए 1 ट्रिलियन रुपये के बॉन्ड खरीदे हैं। वित्त बाजार में घबराहट है। सेंट्रल बैंक किसी भी गड़बड़ समायोजन को रोकने के लिए काफी मशक्कत कर रहा है।
फर्टिलाइजर और कृषि उत्पादन पर असर पड़ रहा है। गुजरात नर्मदा वैली फर्टिलाइजर्स समेत अन्य विनिर्माताओं ने उत्पादन में कटौती की घोषणा की है। भारत अपनी फर्टिलाइजर की ज़रूरतों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा आयात करता है। इसकी कमी से अनाज उत्पादन पर असर पड़ेगा और खाद्य पदार्थों में आने वाली महंगाई गांव के गरीबों और शहरी कामगारों को बुरी तरह प्रभावित करेगी।
ऐसे हालात में जहां तेल की कीमत औसतन $120 प्रति बैरल है, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मुख्य अर्थशास्त्री का अनुमान है कि मुद्रास्फीति बढ़कर 4.8% हो जाएगी जबकि जीडीपी 7 प्रतिशत से घटकर 6.2 प्रतिशत हो जाएगी। एक ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए जिसकी राजनीतिक कहानी काफी हद तक जीडीपी विकास की रफ़्तार पर टिकी है, एक गंभीर समस्या पेश करती है।
सेरामिक्स और टाइल्स सेक्टर – जो भाजपा के गढ़ गुजरात में है – उत्पादन में कटौती की योजना बना रहा है। भारत के शहरों के रेस्टोरेंट और होटल गैस की कमी के कारण ठीक से नहीं चल पा रहे हैं। ये महज कोई आंकड़े नहीं हैं - ये लाखों छोटे व्यवसायों की संचालन सच्चाई है जिनमें लाखों कामगार काम करते हैं।
जेम्स और ज्वेलरी सेक्टर, जो काफी विदेशी मुद्रा कमाता है, आयात और निर्यात में रुकावट से परेशान हो गया है। जिंदल स्टेनलेस ने शिपमेंट में देरी की चेतावनी दी है। कई औद्योगिक क्षेत्रों के निर्यातक बंदरगाहों में फंसे सामान की शिकायत कर रहे हैं, और सरकार मध्य पूर्व जाने वाले निर्यात के लिए आपातकालीन भंडारण की व्यवस्था कर रही है।
सरकार ने पहले ही वाणिज्यिक रसोई गैस की कीमतें बढ़ा दी हैं। एलपीजी की कीमतें बढ़ाना एक संवेदनशील कदम है। भाजपा के लिए एलपीजी सब्सिडी निम्न मध्य आय वर्ग के परिवारों तक पहुंचने का आधार रही है। खुदरा पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें अभी के लिए स्थिर हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि अगर तेल $110 से ऊपर बना रहा तो इस स्थिति को बनाए रखना मुश्किल होगा। रुपये की कमजोरी किसी भी कीमत को स्थिर रखने के फैसले के बावजूद आयात मूल्य को बढ़ाती है।
मोदी की सरकार के लिए राजनयिक संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि उसके कदमों ने नई दिल्ली को साफ तौर पर अमेरिका-इज़राइल-खाड़ी खेमे में रखा है। फिर भी भारत का ईरान से काफी जुड़ाव है और इसे आसानी से नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। रणनीतिगत तौर पर ईरान इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भारत के लिए महत्वपूर्ण है तथा ईरान ने आर्मेनिया तक भारतीय सैन्य आपूर्ति को भी आसान बनाया है। एक करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में काम करते हैं, और ऐसे पैसे भेजते हैं जो आर्थिक रूप से बहुत ज़रूरी हैं। भारत-खाड़ी का सालाना व्यापार करीब 200 अरब डालर का है।
भारत जहां एक ओर ईरान से संबंध बनाये रखने की कोशिश कर रहा है वहीं वाशिंगटन के लिए उपयोगी, ईजरायल का हमजोली बनने की कोशिश कर रहा है। परन्तु विडम्बना है कि दो नावों पर सवार रह पाना मुश्किल होगा।
विपक्षी कांग्रेस ने सरकार पर तटस्थता छोड़ने का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ, अमेरिकी गठबंधन के प्रति सहानुभूति रखने वाले विश्लेषकों का तर्क है कि भारत को अपनी पश्चिमी साझेदारी में और ज़्यादा शामिल होना चाहिए। लड़ाई की आर्थिक लागत प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को और ज़्यादा असहज बना रही है।
यहीं पर भूराजनीतिक चुनावी गणित है, और यहीं पर मोदी सरकार की कमज़ोरी सबसे ज़्यादा सामने आती है। भाजपा के पास अभी पूरी तरह से बहुमत नहीं है। यह गठबंधन के हिसाब से सरकार चलाती है, और उसके सहयोगियों के अपने वोटर हैं और अपने आर्थिक दर्द भी जिन्हें सहने की अपनी सीमा है।
अभी पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। जिन राज्यों में खेती-बाड़ी और मज़दूर वर्ग के वोटर ज़्यादा हैं — वहां रासायनिक खाद और रसोई गैस की कमी और उनके कीमतों में वृद्धि के साथ-साथ खाद्य पदार्थों की महंगाई से सबसे ज़्यादा राजनीतिक असर डालती है। भारत के चुनाव बताते हैं कि गांवों के मतदाता महंगायी के झटकों पर विपरीत प्रतिक्रिया देते हैं।
2024 के आम चुनाव में पहले ही ग्रामीण इलाकों में भाजपा के जनाधार में अचानक कमी दिखी है। इस कमज़ोरी के ऊपर लगातार आर्थिक तंगी, एक ऐसा मेल है जिसका विपक्षी पार्टियां काफी कुशलता से फायदा उठा सकती हैं। यदि यही हाल रहा तो 2029 के चुनाव में भाजपा के वजूद का सवाल उपस्थित होगा।
मोदी की सरकार यह बात साफ़ समझती है और इसलिए सरकार इस समस्या को हल्के में नहीं ले रही। वह जानती है कि एनडीए का राजनीतिक ढांचा कितना आर्थिक दर्द झेल सकता है। वह कदम उठाने की कोशिश कर ही है इससे पहले कि समीकरण बदलने लगें।
ईरान युद्ध ने आने के लिए भारत से इजाज़त नहीं मांगी थी और न ही यह लंबे समय तक बने रहने के लिए इजाज़त मांगेगा। अगर यह लंबा खिंचता है — अगर तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, गैस की कमी बनी रहती है, खाद महंगी रहती है, और रुपया कमज़ोर रहता है — तो मिसाइलों का उड़ना बंद होने के बहुत बाद तक भी भारतीय राजनीति में एक ही सवाल हावी रहेगा: वह आर्थिक चमत्कार किसने गंवाया? यह सवाल, किसी भी विदेश नीति के रुख से कहीं ज़्यादा, मोदी की राजनीतिक विरासत — और भारत के अगले दशक को परिभाषित करेगा। (संवाद)
पश्चिम एशिया में युद्ध और भारत का बढ़ता आर्थिक-राजनीतिक संकट
ईरान युद्ध शीघ्र नहीं रुका तो गड़बड़ा सकता है 2026-27 के बजट का आधार
अशोक नीलकंठन आयर्स - 2026-03-26 11:09 UTC
जब नरेंद्र मोदी 26 फरवरी को नेसेट को संबोधित करने के लिए येरुशलम गए तो वह ऐसा करने वाले भारत के पहले प्रधान मंत्री बने, और उनके जाने के समय का एक साफ रणनीतिगत संकेत था। दो दिन बाद, अमेरिका और इज़राइली सेनाओं ने ईरान पर हमला शुरु कर दिया। अब युद्ध की विभीषिका ने नई दिल्ली के दरवाजे पर दस्तक दे दिया है, जो यहां ठहरने वाला है, चुपचाप जाने वाला नहीं। फिर यदि ईरान युद्ध ज्यादा समय तक चला तो 2026-27 के भारतीय बजट का आधार गड़बड़ा जायेगा।