बीएचईएल कॉरपोरेशन ने वर्ष 2025-26 में 33,782 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया, जो पिछले वर्ष के 28,339 करोड़ रुपये की तुलना में लगभग 19 प्रतिशत अधिक है। कर पूर्व लाभ (पीबीटी) 725 करोड़ रुपये से बढ़कर 2116 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि कर बाद लाभ (पीएटी) 513 करोड़ रुपये से बढ़कर 1578 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। सार्वजनिक क्षेत्र की औद्योगिक कंपनियों में इस तरह की वृद्धि को आमतौर पर ऑर्डर प्रवाह, उत्पादन क्षमता और लागत नियंत्रण में सुधार से जोड़कर देखा जाता है।

मदर यूनिट के रूप में पहचान रखने वाली भोपाल इकाई के आंकड़े भी उल्लेखनीय हैं। यूनिट का टर्नओवर 4277 करोड़ रुपये से बढ़कर 4647 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि कर पूर्व लाभ 272 करोड़ रुपये से बढ़कर 581 करोड़ रुपये हो गया। लाभ में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। कैश कलेक्शन की स्थिति में भी सुधार हुआ है और ऑर्डर बुक मजबूत हुई है। बीएचईएल की विभिन्न इकाइयों में भोपाल यूनिट लंबे समय से उत्पादन और तकनीकी आधार वाली इकाई मानी जाती रही है, इसलिए इसके प्रदर्शन को कॉरपोरेशन की समग्र स्थिति के संकेतक के रूप में भी देखा जाता है।

पिछले वित्त वर्ष में भी भेल भोपाल ने कॉरपोरेट स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करने वाली इकाइयों में स्थान बनाया था। उस समय कार्यपालक निदेशक रहे एस. एम. रामनाथन के कार्यकाल में यूनिट ने उत्पादन और ऑर्डर प्राप्ति में वृद्धि दर्ज की थी। अब निदेशक के रूप में उनकी भूमिका जारी है और वर्तमान कार्यपालक निदेशक पी. के. उपाध्याय ने हालिया उपलब्धियों के संदर्भ में उनके नेतृत्व का उल्लेख किया है। सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े औद्योगिक उपक्रमों में प्रशासनिक और नीतिगत निरंतरता को प्रदर्शन सुधार के एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में देखा जाता है।

तकनीकी स्तर पर भी बीएचईएल भोपाल ने कुछ महत्वपूर्ण कार्य दर्ज किए हैं। वर्ष 2025-26 में 88 ट्रांसफॉर्मर और रेक्टिफायर कमीशन किए गए। भारत का पहला 500 एमवीए 400/220/33 केवी तीन-फेज आईसीटी बिना ओएलटीसी के कमीशन किया गया, जिसे तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। यूएचवी लैब की एनएबीएल मान्यता का 2029 तक पुनर्प्रमाणीकरण गुणवत्ता मानकों को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों ने बीएचईएल जैसी कंपनियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। पारंपरिक थर्मल पावर उपकरणों की मांग में बदलाव, हरित ऊर्जा की ओर बढ़ता रुझान और निजी कंपनियों की बढ़ती उपस्थिति ने सार्वजनिक क्षेत्र के इस उपक्रम को भी अपनी रणनीति में बदलाव के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि कंपनी ट्रांसमिशन, रक्षा, परमाणु ऊर्जा और हरित ऊर्जा क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। आने वाले वर्षों में बीएचईएल की स्थिति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि वह ऊर्जा क्षेत्र के इस संक्रमणकाल के अनुरूप खुद को कितनी तेजी से ढाल पाती है।

भोपाल इकाई को मिले राष्ट्रीय पुरस्कार भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। ईईपीसी क्वालिटी अवॉर्ड 2025 में प्लेटिनम अवॉर्ड, ईटी गवर्नमेंट पीएसयू लीडरशिप एंड एक्सीलेंस गोल्ड अवॉर्ड तथा बेस्ट सेफ्टी प्रोजेक्ट अवॉर्ड यह संकेत देते हैं कि उत्पादन के साथ गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

स्वतंत्रता के बाद औद्योगिक आत्मनिर्भरता की नीति के तहत 1956 में भोपाल में स्थापित यह इकाई लंबे समय तक देश के भारी विद्युत उपकरण उत्पादन का प्रमुख केंद्र रही। एक समय बीएचईएल को देश की ऊर्जा अवसंरचना के प्रमुख आधारों में गिना जाता था। हालांकि उदारीकरण के बाद बदलते औद्योगिक माहौल, निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और घटते ऑर्डर प्रवाह ने इसकी स्थिति को प्रभावित किया।

हाल के दो वर्षों के आंकड़े यह संकेत जरूर देते हैं कि बीएचईएल फिर से अपने परिचालन आधार को मजबूत करने की कोशिश में है। बढ़ता टर्नओवर, लाभ में सुधार और ऑर्डर बुक में वृद्धि इसके संकेतक हैं। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 4716 करोड़ रुपये के लक्ष्य का निर्धारण भी इसी दिशा में देखा जा रहा है।बीएचईएल की तकनीकी क्षमता, उत्पादन आधार और अनुभवी मानव संसाधन प्रमुख ताकतें हैं, जबकि बदलता ऊर्जा बाजार और निजी प्रतिस्पर्धा इसकी प्रमुख चुनौतियां बनी हुई हैं। (संवाद)