एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों में कुल अपराधों में 6 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन बीएनएसलागू होने के बाद अपराध श्रेणियों में हुए पुनर्वर्गीकरण के कारण इन आंकड़ों को सतही तौर पर पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। असली चिंता यह है कि वर्तमान समय में बच्चों के खिलाफ अपराध बढ़ते जा रहे हैं जबकि कुल अपराधों में कमी बताई जा रही है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार देश में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,87,702 मामले दर्ज किए गए, जो 2023 के मुकाबले 5.8 प्रतिशत अधिक हैं। वर्ष 2020 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,28,531 मामले दर्ज हुए थे, जो 2024 तक बढ़कर 1,87,702 हो गए। यानी चार वर्षों में इनमें 46 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।

यह बढ़ोतरी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि तेजी से बदलते सामाजिक ताने-बाने की भी तस्वीर पेश करती है। परिवारों में संवाद कम हुआ है और मोबाइल स्क्रीन पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है। अब बहुत कम उम्र में ही बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन पहुंच रहे हैं। ऑनलाइन पढ़ाई, गेमिंग, वीडियो प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने बच्चों का डिजिटल संसार विस्तृत किया है, लेकिन उसी अनुपात में उनकी निगरानी और सुरक्षा की चुनौतियां भी बढ़ी हैं।

बीते कुछ वर्षों में बच्चों की दुनिया में डिजिटल माध्यमों की मौजूदगी तेजी से बढ़ी है। पहले मोहल्ला, स्कूल और परिवार बच्चों के अनुभवों का मुख्य हिस्सा होते थे, लेकिन अब मोबाइल स्क्रीन उनके रोजमर्रा के जीवन का बड़ा हिस्सा बनती जा रही है। कई अभिभावक इसे आधुनिक जीवन की सामान्य जरूरत मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही वह जगह है जहां बच्चे बिना तैयारी के एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, जहां अपराधी, फर्जी पहचान, अश्लील सामग्री और डिजिटल शोषण लगातार मौजूद हैं।

एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध अब गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ 1,238 साइबर अपराध दर्ज हुए, जिनमें से 1,099 मामले बच्चों से जुड़ी यौन स्पष्ट सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण से संबंधित थे। यानी लगभग हर 10 में से 9 साइबर अपराध ऐसे थे, जिनका संबंध बच्चों की यौन शोषणकारी डिजिटल सामग्री से था। यह तथ्य बताता है कि इंटरनेट अब केवल सूचना या मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि अपराधियों के लिए बच्चों तक पहुंचने का आसान रास्ता भी बनता जा रहा है।बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध कुछ राज्यों में ज्यादा तेजी से उभरते दिख रहे हैं। छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और केरल ऐसे राज्यों में शामिल हैं, जहां इस तरह के सबसे अधिक मामले दर्ज हुए। अकेले इन पांच राज्यों में ही देश के करीब दो-तिहाई साइबर अपराध दर्ज किए गए।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन गेमिंग और निजी चैटिंग एप्स ने बच्चों तक पहुंचना आसान बना दिया है। कई बार बच्चे यह समझ ही नहीं पाते कि सामने वाला व्यक्ति कौन है और उसकी मंशा क्या है। डिजिटल ‘ग्रूमिंग’, फर्जी पहचान, ब्लैकमेल और निजी तस्वीरों के दुरुपयोग जैसे खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई तकनीक ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अब फर्जी तस्वीरें और वीडियो बनाना पहले की तुलना में कहीं आसान हो गया है और इनके जरिए बच्चों को ब्लैकमेल करने तथा यौन शोषण के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है।एनसीआरबी के अनुसार पॉक्सो अधिनियम के तहत 2024 में 69,191 मामले दर्ज किए गए। इनमें 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग की किशोरियां सबसे अधिक प्रभावित रहीं। इस आयु वर्ग में 23,497 पीड़ित दर्ज किए गए और इनमें लगभग 99.5 प्रतिशत लड़कियां थीं। ये आंकड़े समाज में किशोरियों की बढ़ती असुरक्षा की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं।

क्राई — चाइल्ड राइट्स एंड यू की कार्यक्रम निदेशक सोहा मोइत्रा कहती हैं, “आज के अत्यधिक डिजिटल और एआई संचालित दौर में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा केवल स्क्रीन नियंत्रित करने का विषय नहीं रह गई है। बच्चों को ऐसे भरोसेमंद वयस्कों, मजबूत सहयोग तंत्र और सुरक्षित माहौल की जरूरत है, जहां वे बिना डर अपनी बात साझा कर सकें। डिजिटल साक्षरता और भावनात्मक सहयोग बच्चों को संभावित खतरों को समय रहते पहचानने में मदद कर सकते हैं।”

दरअसल, आज परिवारों में साथ बैठकर बातचीत करने का समय लगातार कम हो रहा है। पहले बच्चे अपने डर, उलझन और अनुभव घर में साझा करते थे, लेकिन अब उनका बड़ा समय मोबाइल स्क्रीन के साथ गुजरता है। कई अभिभावक स्वयं भी डिजिटल व्यस्तताओं में इतने उलझे रहते हैं कि बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। यह स्थिति बच्चों को भावनात्मक अकेलेपन की ओर धकेलती है, जिसका फायदा अपराधी उठाते हैं।

इस परिस्थिति में बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस या कानून की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। स्कूलों, परिवारों, समुदायों और डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों — सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। बच्चों को डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन सुरक्षा और साइबर खतरों के बारे में शुरुआती स्तर से ही जागरूक करना होगा। साथ ही, अभिभावकों को यह समझना होगा कि बच्चों को केवल मोबाइल देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके डिजिटल संसार को समझना और उसमें साथ बने रहना भी उतना ही जरूरी है।

एनसीआरबी के ताजा आंकड़े दरअसल एक बड़े सामाजिक बदलाव की चेतावनी हैं। सुरक्षित बचपन अब केवल सड़कों, स्कूलों और घरों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह मोबाइल स्क्रीन और डिजिटल दुनिया की सुरक्षा से भी जुड़ चुका है। यदि समाज ने समय रहते इस बदलते खतरे को गंभीरता से नहीं समझा, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा हो सकता है। (संवाद)