फैसले के विस्तार में जाने से पहले सत्ताधारी भाजपा और विपक्ष की राजनीतिक पार्टियों की अपनी-अपनी राय याद करना सही होगा। सत्तारूढ़ भाजपा और चुनाव आयोग (ईसीआई) ने हमेशा बांग्लादेशी घुसपैठियों समेत अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाकर मतदाता सूचियों को साफ करने पर ज़ोर दिया है, जबकि विपक्ष ने हमेशा इस पर एतराज़ जताया है और हर योग्य मतदाता के मत देने के अधिकार की रक्षा पर ज़ोर दिया है।

हमने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान दो प्राथमिकताओं – मतदाताओं के नाम हटाना और नागरिकों के वोट देने के अधिकार की रक्षा करना – के बीच संघर्ष देखा है। ईसीआई द्वारा तैयार की गई तथाकथित “शुद्ध” मतदाता सूची कभी भी पूरी नहीं हुई, भले ही पश्चिम बंगाल के चुनाव खत्म हो चुके हैं और परिणाम भी आ चुके हैं। ट्रिब्यूनल उन बाहर किए गए मतदाताओं के मामलों की सुनवाई कर रहे हैं जो अपने मत देने के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सके जिससे भाजपा को फ़ायदा हुआ। मौजूदा फ़ैसले में “नागरिकों के वोट देने के अधिकार की रक्षा” को कम प्राथमिकता देना और मतदाताओं के नाम सूची की तथाकथित “शुद्धता” के लिए हटाने पर ज़्यादा है। इसलिए कोई भी आसानी से इस बात पर अलग राय रख सकता है कि आखिर मतदाता सूची की “शुद्धता” क्या है जो “स्वतंत्र और निष्पक्ष” चुनावों के लिए ज़रूरी है?

फैसले की आलोचना करने वालों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर को लागू करने के तरीके की ठीक से जांच नहीं की, जिससे आज़ाद और निष्पक्ष चुनाव कमज़ोर हुए। अदालत ने मुख्य रूप से यह जांचा कि क्या ईसीआई के पास भारत के संविधान की धारा 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कानूनी और संवैधानिक अधिकार हैं? अदालत ने इस बात पर कम ध्यान दिया कि क्या एसआईआर की प्रक्रिया गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक, या जिनके पास दस्तावेज़ नहीं हैं, वैसे मददाताओं को आनुपातिक रूप से बहुत ज़्यादा को मद देने से रोक सकती है? अदालत ने ईसीआई की दस्तावेज़ों की मांग को सही ठहराया, लेकिन आधार पर उसने कहा कि इसे भविष्य में एक “अतिरिक्त संकेतक दस्तावेज” के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है, जो खुद नागरिकता तय नहीं कर सकता।

यह ध्यान देने वाली बात है कि बेंच ने खुद पहले बड़े पैमाने पर जांच प्रक्रिया में “गलती की गुंजाइश” की संभावना को माना था। फिर भी, नए फैसले में ऐसा लगा कि इस प्रणाली को संस्थागत रूप से भरोसेमंद माना गया, बिना इस बात पर पूरी तरह ध्यान दिए कि क्या बड़े पैमाने पर जांच के समय मनमाने ढंग से मतदाताओं के नाम काटे जाने से बच सकता है?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बिहार में एसआईआर करने के लिए जून 2025 में ईसीआई द्वारा जारी अधिसूचना को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया है। बेंच ने कहा, “जब कानून खुद किसी भी समय, कारणों को दर्ज करते हुए चुनाव आयोग को जो उसे उचित लगे उस तरीके से विशेष पुनरीक्षण की इजाज़त देता है, तो इस विवादित काम को सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं किया जा सकता कि यह हर तरह से आम पुरनीक्षण के लिए सोचे गए आम तरीकों से मेल नहीं खाता है। हमारी राय में, विवादित एसआईआर, जन प्रतिनिधित्व कानून और नियमों की जगह नहीं लेता है। बल्कि, यह धारा 21(3) में दिए गए सटीक कानूनी दायरे में आर्टिकल 324 के तहत संवैधानिक प्रवधान में जान डालता है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपनी कानूनी शक्तियों से परे काम किया है।”

पीठ ने एसआईआर के बताए गए मकसद पर ज़ोर दिया और कहा कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के संवैधानिक लक्ष्य से जुड़ा है। इसने यह भी कहा कि चुनाव सिर्फ़ मतदान के तरीकों पर निर्भर नहीं करते, बल्कि असल में मतदाता सूची की ईमानदारी, सटीकता और भरोसे पर निर्भर करते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव है।

पीठ का हर शब्द महत्वपूर्ण लगता है, लेकिन अलग-अलग लोगों के लिए इसका अलग-अलग मतलब होता है। “मतदाता सूची की ईमानदारी, सटीकता और भरोसा” क्या होता है? जब हम फ़ैसले को पढ़ते हैं तो इस सवाल का जवाब साफ़ नहीं होता, क्योंकि विपक्ष का यही आरोप है कि “मतदाता सूची की ईमानदारी, सटीकता और भरोसे” से समझौता किया गया है क्योंकि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और ईसीआई ने एसआईआर को एक खास तरीके से करवाने की साज़िश की है। इसलिए “लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव” यानी ईमानदारी और सटीकता के साथ शुद्ध भरोसेमंद मतदाता सूची तैयार करना, इस फ़ैसले की रोशनी में सवालिया निशान बना हुआ है। पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनलों के फ़ैसले, जिनमें हज़ारों ऐसे योग्य नागरिकों को पाया गया था जिन्हें मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया था, जिससे उनके मत देने के अधिकार का उल्लंघन हुआ था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “इस तरह की प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं से सहायक दस्तावेज़ जमा करने के लिए कहना, इस धारणा को नकारना नहीं है। बल्कि, यह उस प्रक्रिया को दिखाता है जिसके ज़रिए आयोग मौजूदा एंट्रीज़ की पुष्टि करना चाहता है या, जहां ज़रूरी हो, उन्हें ठीक करना चाहता है। यह धारणा बनी रहती है, लेकिन यह जांच की संभावना को खत्म नहीं करती।”

इसके अलावा, अदालत ने कहा कि ईसीआई के पास मतदाता सूची में शामिल करने के मकसद से नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच करने का अधिकार है, लेकिन ईसीआई का नकारात्मक फ़ैसला इस बात का पक्का सबूत नहीं है कि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “नागरिकता तय करने के ऐसे फ़ैसले का असर भी उसी हिसाब से सीमित होता है। यह व्यक्ति के मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को प्रभावित करता है और इस तरह चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार को भी। हालांकि, यह व्यक्ति को नागरिकता के दावे से वंचित नहीं करता, और न ही यह नागरिकता क़ानून के तहत सक्षम अधिकारी द्वारा उस सवाल पर फ़ैसला करने के रास्ते बंद करता है।”

एसआईआर से देश किस दिशा में आगे बढ़ेगा? इसका संकेत फ़ैसले में ही मिलता है। इसमें कहा गया है कि जिन मामलों में आयोग को यह भरोसा नहीं होता कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने के लिए ज़रूरी शर्तों को पूरा करता है, तो आयोग की यह ज़िम्मेदारी होगी कि वह ऐसे व्यक्ति के नाम को क़ानून के मुताबिक फ़ैसले के लिए केंद्र सरकार के सक्षम अधिकारी के पास भेजे।

यह विपक्ष के इस डर की पुष्टि करता है कि “एसआईआर एक तरह से एनआरसी का ही दूसरा रूप था” जिसे भारत जल्द ही देखेगा, जैसा कि हमने असम के मामले में पहले ही देखा है जहां डी-वोटरों (संदिग्ध वोटरों) को उनकी नागरिकता की जांच के लिए अधिकारियों के पास भेजा गया था। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कोर्ट ने ईसीआई से कहा है कि वह 2003 की मतदाता सूची से संदिग्ध नागरिकता के आधार पर हटाए गए लोगों के नाम चार हफ़्तों के अंदर केंद्र सरकार को भेजे। (संवाद)