स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार ने गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के पुनरूद्धार के लिए वर्ष 2014-15 में नमामि गंगे कार्यक्रम (एनजीपी) शुरू किया था, जो मार्च 2021 तक पांच वर्षों के लिए था और जिसका और विस्तार कर दिया गया है। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत, गंगा नदी को स्वच्छ और इसका पुनरूद्धार करने के लिए विविध और समग्र उपाय किए जाते हैं, जिनमें अपशिष्ट जल उपचार, नदी तट प्रबंधन, ई-प्रवाह सुनिश्चित करना, ग्रामीण स्वच्छता, वृक्षारोपण, जैव विविधता संरक्षण और जन भागीदारी शामिल हैं।
केंदीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2026 तक, कुल 524 परियोजनाओं को 43,030 करोड़ रूपए की लागत से स्वीकृत किया गया,जिनमें से 355 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। अब तक एनआरसीपी ने देश के 17 राज्यों में फैले 100 शहरों की 58 नदियों को कवर किया है और 3,019 मिलियन लीटर (एमएलडी) प्रतिदिन की सीवेज उपचार क्षमता का सृजन किया है। ज्ञात हो कि गंगा बेसिन 11 राज्यों में फैला हुआ है, जो भारत के 27 फीसदी भूमि क्षेत्र को कवर करता है और 47 फीसदी जनसंख्या को पोषण प्रदान करता है। दक्षिण भारत के तेलंगाना में मूसी नदी, गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा, कावेरी, महानदी और पेरियार नामक छह नदी बेसिनों की प्रदूषण मुक्ति के लिए कार्य चल रहा है।
नमामि गंगे कार्यक्रम के अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), गंगा नदी के पांच मुख्य धारा वाले राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश,बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में 112 स्थानों पर गंगा नदी की जल गुणवत्ता की मैन्युअल निगरानी करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की प्रदूषित नदी खंडों (पीआरएस) पर वर्ष 2018 और वर्ष 2025 की रिपोर्टों के अनुसार गंगा नदी के मुख्य प्रवाह की जल गुणवत्ता में सुधार हुआ है। इसके अतिरिक्त वर्ष 2025 (जनवरी से अगस्त) के दौरान गंगा नदी के जल गुणवत्ता ऑकडों (मीडियन वैल्यू) के आधार पर यह पाया गया है कि गंगा नदी के सभी स्थानों पर पीएच और घुलीय ऑक्सीजन (डीओ) स्नान मानदंडों के लिए निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं। तथापि, उत्तर प्रदेश में फर्रुखाबाद से कानपुर में पुराना राजापुर, रायबरेली में डलमऊ और मिर्जापुर अनुप्रवाह से तारीघाट, गाजीपुर के स्थानों व हिस्सों को छोड़कर उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा नदी के पूरे प्रवाह में जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) मानकों के अनुरूप पाया गया है। वर्ष 2024-25 के दौरान गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 50 स्थानों पर और यमुना नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 26 स्थानों पर की गई जैव निगरानी के अनुसार, जैविक जल गुणवत्ता (बीडब्ल्यूक्यू) मुख्य रूप से अच्छी से मध्यम रही।
नदियों की सफाई एक सतत प्रक्रिया है और यह राज्य सरकारों व संघ राज्य क्षेत्रों, स्थानीय निकायों और उद्योगों की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वे प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण के लिए नदियों और अन्य जल निकायों में सीवेज और औद्योगिक अपशिष्टों के निर्वहन से पहले उनका आवश्यक उपचार सुनिश्चित करें। नमामि गंगे कार्यक्रम और एनआरसीपी दोनों के तहत, गंगा और देश की अन्य नदियों को साफ करने और संरक्षित करने के प्रयासों में जनता के बीच जिम्मेदारी और सहभागिता की भावना को बढ़ावा देने के लिए व्यापक जन जागरूकता अभियान भी इन कार्यक्रमों के तहल चलाए गए हैं, जिनमें शैक्षिक सामग्री, सामुदायिक संपर्क, स्कूल कार्यक्रम, जनसंचार अभियान, सफाई अभियान और ऑनलाइन सहभागिता शामिल हैं। स्वच्छता पखवाड़ा गंगा उत्सव, गंगा रन, गंगा राफ्टिंग अभियान, ट्रेकिंग, वृक्षारोपण अभियान, घाट पर योग, गंगा आरती सामाजिक संदेश के साथ घाट पे हाट और कई अन्य ऐसी गतिविधियाँ भी आयोजित की जा रही हैं।
उच्चतम न्यायालय ने भी प्रदूषित नदियों को लेकर काफी टिप्पणियां की थी पर वर्ष 2021 से स्वतः संज्ञान कार्यवाही बंद कर दी है और प्राथमिक निगरानी की जिम्मेदारी राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण को सौंप दी है। न्यायालय का मानना था कि एनजीटी जैसे विशेष न्यायाधिकरण इन स्थितियों की निरंतर निगरानी करने के लिए बेहतर रूप से सक्षम हैं। एमसी मेहता बनाम भारत संघ, 1987 वाद में उच्चतम न्यायालय ने प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मूल अधिकार का हिस्सा माना है। इस वाद के तहत, उच्चतम न्यायालय ने उद्योगों को तब तक के लिए गंगा नदी में प्रदूषणकारी अपशिष्ट छोड़ने से रोक दिया जब तक कि वे उपचार संयंत्र स्थापित नहीं कर लेते।
असल मे कड़े पर्यावरण कानूनों के लागू होने के बावजूद, कर्मचारियों की कमी और खराब निगरानी के कारण उद्योगों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती है। उदाहरण के लिए यमुना नदी के किनारे स्थित कारखाने सख्त विनियामक निगरानी के अभाव में नियमित रूप से बिना शोधन किए अपशिष्ट को नदी में डंप करते हैं। भारत का 60 फीसदी से अधिक सीवेज बिना शोधन के सीधे नदियों में प्रवाहित हो जाता है। नदी प्रबंधन में कई एजेंसियों की भागीदारी से कार्यों का ओवरलैप और प्रशासनिक अक्षमता उत्पन्न होती है।उदाहरण के लिए, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रायः स्थानीय नगरपालिका अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित करने में विफल रहते हैं, जिससे अवैध अपशिष्ट निपटान पर कार्रवाई धीमी हो जाती है।विस्तृत परियोजना रिपोर्टों की स्वीकृति में देरी, कार्यान्वयन की धीमी गति और निधि का कम उपयोग देखा गया है। उदाहरण के लिए वर्ष 2024-25 तक नमामि गंगे कार्यक्रम के लिए आवंटित धन का केवल 69 फीसदी ही उपयोग किया गया था।
नदियों के प्रदूषित होने से रोकने में कितना कामयाब है नमामि गंगे कार्यक्रम
एस एन वर्मा - 2026-06-05 03:54 UTC
भारत में मजबूत विधिक प्रावधानों के बावजूद कमजोर प्रवर्तन, खराब समन्वय और अपर्याप्त अवसंरचना के कारण नदी प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। पिछले कुछ वर्षों में नदियों और अन्य जल निकायों पर पानी की बढ़ती मांग के कारण गंगा नदी जैसे कई नदियों के जल की गुणवत्ता में गिरावट आई है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव से स्थिति और भी गंभीर होने की आशंका है।