सभी स्थितियों का आकलन करते हुए, ओईसीडी आउटलुक ने कहा कि बढ़ती महंगाई का असर निजी खपत पर पड़ने की आशंका है, जबकि तेल और गैस की ऊंची कीमतों और गैस राशनिंग के कारण निवेश धीमा हो जाएगा। रोजगार में वृद्धि और श्रम बाजार में भागीदारी कमजोर होने की संभावना है। खाद्य पदार्थों, ऊर्जा और उर्वरक की ऊंची कीमतों और मुद्रा का मूल्य घटने के कारण वित्त वर्ष 2026-27 में महंगाई बढ़कर 4.8% होने का अनुमान है। चालू खाता घाटा बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि घरेलू मांग में कमी के असर की तुलना में ऊर्जा आयात की लागत अधिक होगी। ऊर्जा राशनिंग के लंबे समय तक जारी रहने से विकास दर और कमजोर हो सकती है।
औद्योगिक उत्पादन में सुस्ती समेत उच्च तीव्रता वाले संकेतक बताते हैं कि भारत की विकास दर की रफ़्तार धीमी पड़ रही है। खुदरा संकेतक और उपभोक्ता मनोभाव के सर्वे-आधारित आंकड़े निजी खपत में कमी की ओर इशारा करते हैं, क्योंकि खाद्य पदार्थों और ऊर्जा की ऊंची कीमतों का असर परिवारों की वास्तविक क्रय शक्ति पर पड़ रहा है।
अप्रैल में सालाना आधार पर मुद्रास्फीति 3.5% रही है, जो मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों की कीमतों के कारण 2026 की शुरुआत से बढ़ी है; लेकिन मूलभूत मुद्रास्फीति मोटे तौर पर स्थिर रही है और सेंट्रल बैंक के 4% ± 2% के लक्षित दायरे के मध्य-बिंदु से नीचे बनी हुई है। साल की शुरुआत से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में लगभग 7% की गिरावट आई है। इससे आयात की लागत (खासकर ईंधन और फर्टिलाइज़र के लिए) बढ़ गई है, जिससे महंगाई का दबाव भी बढ़ा है और इसका कुछ असर कंज्यूमर कीमतों पर भी पड़ा है। श्रम बाजार की स्थिति कमजोर हो रही है तथा कामगारों की आबादी का अनुपात दिसंबर में 40.5% से घटकर अप्रैल में 39.5% हो गया है।
कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के लिए भारत की मध्य-पूर्व पर काफी निर्भरता है। 2024 में कुल आयात में कच्चे तेल का हिस्सा लगभग 46% और प्राकृतिक गैस का हिस्सा लगभग 57% रहा। हाल के महीनों में ऊर्जा आयात की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसका सिर्फ़ कुछ हिस्सा ही घरेलू ऊर्जा की कीमतों में शामिल हुआ है।
पेट्रोल और डीज़ल पर उत्पाद कर में कटौती, कुछ पेट्रोकेमिकल इनपुट पर आयात कर हटाना और परिशोधित उत्पादनों पर निर्यात लेवी लगाने जैसे कदमों ने अन्तर्राष्ट्रीय कीमतों का घरेलू महंगाई पर असर कम करने में मदद की है।
राशनिंग के उपायों के तहत घरों और ट्रांसपोर्ट के लिए प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को प्राथमिकता दी गई है। साथ ही, जन वितरण प्रणाली के ज़रिए केरोसिन की उपलब्धता बढ़ाई गई है और प्रवासी मज़दूरों के लिए छोटे एलपीजी सिलेंडर उपलब्ध कराए गए हैं। हाल ही में अमेरिकी आयात टैरिफ में कटौती से भारत पर औसत प्रभावी टैरिफ दर 23 प्रतिशत अंक कम हो गई है, जिससे निर्यात सेक्टर पर दबाव कम हुआ है।
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने मुद्रा नीति दर को जनवरी 2025 में 6.5% से घटाकर फरवरी 2026 में 5.25% (जो कि मोटे तौर पर न्यूट्रल स्तर है) कर दिया है और औसत कर्ज दर भी कम हुए हैं। मार्च में गैर खाद्य बैंक क्रेडिट (खाद्य से जुड़े कर्ज को छोड़कर) में सालाना आधार पर 15.9% की बढ़ोतरी हुई है।
हालांकि, आउटलुक बताता है कि हाल की घटनाओं से महंगाई का दबाव फिर से बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। मुद्रास्फीति बढ़ने लगी है, जिसकी मुख्य वजह खाने-पीने की चीज़ों की ऊंची कीमतें हैं, क्योंकि अनुकूल बेस इफ़ेक्ट का असर कम हो रहा है। तेल और गैस की ऊंची कीमतों से प्रतक्ष्य और अप्रतक्ष्य दोनों तरह का दबाव बढ़ रहा है, जिससे सभी क्षेत्रों में मालढुलाई और उत्पादन लागत बढ़ रही है।
रुपये की कीमत में गिरावट से ईंधन, फर्टिलाइज़र और व्यापार योग्य अन्य सामान की घरेलू लागत बढ़ रही है, जिससे आयातित मुद्रास्फीति और बढ़ रही है। इस संदर्भ में, महंगाई को 4% ± 2% के लक्ष्य के दायरे में बनाए रखने और उम्मीदों को स्थिर करने के लिए, 2026-27 की पहली तिमाही के आखिर तक नीति दर में लगभग 25 आधार बिंदु की अस्थायी बढ़ोतरी का अनुमान है। जैसे-जैसे अनुमान की अवधि में महंगाई का दबाव कम होगा, 2027-28 में मौद्रित नीति के आसान होने की उम्मीद है।
ऊर्जा की ऊंची कीमतों के असर को कम करने के लिए 2026-27 में वित्त नीति के विस्तारवादी होने का अनुमान है। 2026-27 के बजट में राजकोषीय घाटे को 2025-26 में जीडीपी के 4.4% से घटाकर 4.3% करने की योजना थी। हालांकि, ऊर्जा की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी (शॉक) से निपटने के लिए अपनाए गए उपायों से बजट में तय रास्ते की तुलना में घाटा जीडीपी के लगभग 0.4% बढ़ने की उम्मीद है।
ओईसीडी आउटलुक का कहना है कि ये उपाय परिवारों की वास्तविक आय को निकट भविष्य में सहारा देंगे और खपत पर असर को सीमित करेंगे, लेकिन इससे सार्वजनिक कर्ज को कम करने की रफ्तार भी धीमी हो जाएगी, जिसके 2027-28 में 54.7% तक पहुंचने का अनुमान है। ऊर्जा की कीमतें स्थिर होने और अस्थायी सहायता उपायों को धीरे-धीरे खत्म करने के साथ, 2027-28 में वित्त नीति के मध्यम स्तर पर सुधार के रास्ते पर लौटने की उम्मीद है।
हालांकि अमेरिका के कम आयात शुल्क से निर्यात को कुछ मदद मिल रही है, फिर भी राशनिंग, वैश्विक मांग में कमी और उत्पादन की ज़्यादा लागत का असर निवेश और निर्यात पर पड़ने की उम्मीद है। महंगाई की वजह से परिवारों की खरीदने की क्षमता कम होने से निजी उपभोग की विकास दर धीमी होने का अनुमान है।
2027-28 में जब ये रुकावटें कुछ कम होंगी, तो विकास के 6.4% तक वापस आने की उम्मीद है। 2026-27 में महंगाई बढ़कर 4.8% होने का अनुमान है, जिसकी वजह खाने-पीने की चीज़ों और ऊर्जा की ज़्यादा कीमतें और मुद्रा विनिमय दर में गिरावट होगी। इसके बाद 2027-28 में कमोडिटी की कीमतें स्थिर होने और मुद्रा नीति के सख्त होने से महंगाई कम हो सकती है। ऊर्जा आयात की ज़्यादा लागत और बाहरी मांग में कमी के कारण 2026-27 में चालू खाता घाटा बढ़ने की उम्मीद है।
जोखिम के बढ़ने की उम्मीद है। ऊर्जा आपूर्ति में लगातार रुकावटें, जैसे कि लंबे समय तक गैस राशनिंग, उत्पादन को और सीमित कर सकती हैं और महंगाई बढ़ा सकती हैं, जिसमें फर्टिलाइज़र की आपूर्ति और खेती के उत्पादन में कमी भी शामिल है। व्यापार नीति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, और अतिरिक्त प्रतिबंध या वैश्विक मांग में कमी का असर निर्यात और निवेश पर पड़ सकता है।
अच्छी बात यह हो सकती है कि अगर ऊर्जा सहयोग उपाय अल्पावधि महंगाई को प्रभावी ढंग से कम करते हैं और अनुमान से ज़्यादा बेहतर तरीके से असली खर्च करने योग्य आय में कमी को रोकते हैं – खासकर उन परिवारों के लिए जिनके पास नकद की कमी है – तो निजी उपभोग अनुमान से ज़्यादा मज़बूत हो सकता है।
आउटलुक में कहा गया है कि ऊर्जा सहयोग से असली आय और उपभोग को उम्मीद से ज़्यादा सहारा मिल सकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि भारत की वित्त नीति 2026-27 में ऊर्जा की ज़्यादा कीमतों के असर को कम करने के लिए विस्तारवादी होने वाली है, खासकर सब्सिडी के ज़रिए। कीमत के आधार पर समर्थन से हटकर लक्षित हस्तांतरण की ओर बढ़ने से नीति समर्थन की वित्तीय लागत कम हो सकती है।
नरमी के दौर के बाद, महंगाई को लक्षित दायरे में रखने में मदद के लिए 2026-27 की शुरुआत में नीति दर में बढ़ोतरी के साथ मुद्रा नीति के सख्त होने का अनुमान है। नियमों को आसान और एक जैसा करने से प्रशासनिक बोझ कम होगा, जिससे उत्पादकता और निवेश में बढ़ोतरी होगी। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को तेज़ी से लागू करने से ऊर्जा सुरक्षा मज़बूत होगी और कार्बन उत्सर्जन कम होगा।
ओईसीडी आउटलुक में कहा गया है कि भारत के ऊर्जा समर्थन उपाय ज़्यादातर लक्षित मदद के बजाय व्यापक, कीमत को प्रभावित करने वाले हस्तक्षेपों पर निर्भर रहे हैं। इस तरीके में वित्तीय लागत ज़्यादा होती है, जिससे बफ़र को फिर से बनाने की गति धीमी हो जाती है। कमज़ोर परिवारों और ठीक-ठाक चल रही कंपनियों को सीधे ट्रांसफर करने से काफी कम वित्तीय लागत पर वही मकसद हासिल किए जा सकते हैं। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विस्तार करने के साथ-साथ ग्रिड अवसंरचना और भंडारण क्षमता को मजबूत करने से कार्बन उत्सर्जन कम होगा और आयातित ऊर्जा पर निर्भरता भी कम होगी, जिससे विकास अधिक टिकाऊ बनेगा।
हालांकि, केंद्र और राज्य स्तर पर नियामक जटिलता और प्रशासनिक आवश्यकताओं की अधिकता के कारण अनुपालन लागत बढ़ रही है, परियोजनाओं के कार्यान्वयन में देरी हो रही है और निवेश में बाधा आ रही है, खासकर विनिर्माण और अवसंरचना क्षेत्र में। नियामक ढांचों को सुव्यवस्थित और सुसंगत बनाना, एकल-खिड़की मंजूरी प्रणालियों का विस्तार करना, अनुमोदनों का डिजिटलीकरण करना और स्पष्ट प्रशासनिक समयसीमा निर्धारित करना अनिश्चितता को कम करेगा और पारदर्शिता में सुधार करेगा। (संवाद)
2026-27 में विकास दर में भारी गिरावट के साथ आ रही भारत की मुश्किलें
ओईसीडी आउटलुक के शुरुआती अनुमान के मुताबिक जीडीपी घटकर 6.3% हो जायेगी
डॉ. ज्ञान पाठक - 2026-06-05 10:39 UTC
3 जून, 2026 को जारी ओईसीडी आउटलुक के शुरुआती अनुमान में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक GDP में 6.3% की वृद्धि होगी। यह दिसंबर 2025 में खत्म हुई तिमाही (2025–26) में रही 7.8% की मजबूत सालाना विकास दर, और उसके पिछली तिमाही के 8.4% के मुकाबले भारी गिरावट है। हालांकि, 2027-28 में जीडीपी विकास दर में मामूली सुधार के साथ इसके 6.4% तक पहुंचने की उम्मीद है।