भारत में, कच्चे तेल का ज़्यादातर आयात किया जाता है। घरेलू उत्पादन देश की ज़रूरत का सिर्फ़ लगभग 10 प्रतिशत है। इस वजह से, घरेलू बाजार पूरी तरह से वैश्विक आयात कीमतों से तय होता है। माना जाता है कि घरेलू कच्चे तेल का उत्पादक मूल्य, आयात मूल्य से बहुत कम होता है। हालांकि भारत में इस तेल को निकालने की असली लागत कम है, लेकिन घरेलू उत्पादक इसे जिस कीमत पर बेचते हैं, वह काफी हद तक अन्तर्राष्ट्रीय बाजार दर और सरकारी फ़ॉर्मूले (जैसे, आयातित कच्चे तेल से जुड़े मूल्य गणना के फ़ॉर्मूले) से जुड़ा होता है। भारत मूल्यवहन करने वाला है इस के कारण, यह आयात मूल्य उथल-पुथल भरा है और अन्तर्राष्ट्रीय भूराजनीति, आपूर्ति-मांग गत्यात्मकता और रुपये-से-डॉलर विनिमय दर के आधार पर रोज़ ऊपर-नीचे होता रहता है। इसी तरह, दवाओं, खासकर प्रिस्क्रिप्शन दवाओं के उत्पादक मूल्य का उनके थोक और उपभोक्ता मूल्य से बहुत कम सम्बंध होता है, जिसमें उत्पादन के बाद का खर्च (पीएमई) शामिल होता है, जो 500 प्रतिशत से 2,000 प्रतिशत या उससे भी ज़्यादा हो सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत का अनंतिम थोक मूल्य सूचकांक आधारित मूद्रास्फीति अप्रैल 2026 में साल-दर-साल बढ़कर 8.30 प्रतिशत हो गया, जो मार्च में 3.88 प्रतिशत था। यह अक्टूबर 2022 के बाद से सबसे ज़्यादा थोक महंगाई दर है, जो मुख्य रूप से ईँधन, खाने-पीने की चीज़ों और मैन्युफैक्चरिंग की लागत में बढ़ोतरी की वजह से है। इसके उलट, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से मापी गई भारत की ताजा खुदरा मुद्रस्फीति दर, पिछले साल के इसी महीने की तुलना में अप्रैल 2026 में 3.48 प्रतिशत (अनंतिम) रही। हेडलाइन सीपीआई 105.12 है। यह डेटा 2024 = 100 के आधार वर्ष का इस्तेमाल करता है।

कई देश महंगाई को ज़्यादा सही तरीके से निगरानी करने के लिए पीपीआई और डब्ल्यूपीआई दोनों का इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए, जापान सक्रिय रूप से कॉर्पोरेट गुड्स प्राइस इंडेक्स (सीजीपीआई) पर नजर करता है, जो उनके पीपीआई के तौर पर काम करता है, जो उत्पादक लागत और उत्पादन मूल्य पर नजर रखता है, साथ ही व्यवसाय के बीच हस्तांतरण की कीमतों पर नज़र रखने के लिए एक परम्परागत डब्ल्यूपीआई को इकट्ठा और रिलीज़ भी करता है। फिलीपींस सरकार सक्रिय रूप से दोनों सूचकांक को बनाए रखती है, जिसमें डब्ल्यूपीआई थोक बिक्री के लिए एक ज़रूरी महंगाई निर्देशिका के तौर पर काम करता है, जबकि बड़ा पीपीआई औद्योगिक उत्पादन मूल्य पर नज़र रखता है। लेकिन, यह ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका, चीन, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और यूनाईटेड किंगडम जैसी कई अन्य अर्थव्यवस्थाएं उत्पादक मुद्रास्फीति को मापने के लिए सिर्फ़ पीपीआई पर निर्भर करती हैं, क्योंकि इसमें सामान और सेवा दोनों शामिल हैं और यह आधुनिक आर्थिक गणना के हिसाब से है। पीपीआई मुद्रास्फीति के एक ज़रूरी अग्रणी संकेतक के तौर पर काम करता है, क्योंकि फ़ैक्टरी गेट की कीमतों में बदलाव आमतौर पर समय के साथ उपभोक्ता कीमतों तक पहुंचते हैं।

डब्ल्यूपीआई थोक में बेचे जाने वाले सामान की कीमतों में औसत बदलाव को मापता है। जबकि बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने वैश्विक मानक पीपीआई को अपनाया है। कई देश अभी भी डब्ल्यूपीआई आधारित मुद्रास्फीति पर नजर रखते हैं और उन्हें प्रकाशित करते हैं। जापान डब्ल्यूपीआई जैसे तरीकों का इस्तेमाल करके घरेलू कॉर्पोरेट सामान की कीमतों पर नजर रखता है। जर्मनी का अर्जयूजरप्राइस उनके उत्पादक और थोक मूल्य के बैरोमीटर के तौर पर काम करता है। केनडा का औद्योगिक उत्पादन मूल्य (आईपीपी) में औद्योगिक उत्पादन मूल्य में बदलाव पर नजर रखता है। इंडोनेशिया थोक वस्तुओं की की कीमतों पर नज़र रखने के लिए स्टैटिस्टिक्स इंडोनेशिया (बीपीएस) प्रकाशित करता है। इटली घरेलू और आयातित सामान की थोक कीमतों पर नजर रखता है (जिसे अक्सर मूडीज़ एनालिटिक्स होलसेल प्राइस इंडेक्स के ज़रिए रिपोर्ट किया जाता है।) दक्षिण कोरिया घरेलू बाज़ारों से आने वाले और उनमें व्यापार होने वाले सामान की कीमतों में उतार-चढ़ाव को मापता है। ब्राज़ील औद्योगिक और थोक मूल्य (कुल जोड़) पर नजर रखता है (अक्सर ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स होलसेल प्राइस के ज़रिए मॉनिटर किया जाता है)।

लेकिन, यह समझना होगा कि डब्ल्यूपीआई के मुकाबले महंगाई पर नजर रखने के लिए पीपीआई को ज़्यादा सही उपकरण माना जाता है। असल में, पीपीआई के कई ढांचागत फ़ायदे हैं। डब्ल्यूपीआई सिर्फ़ सामान पर नजर रखता है। क्योंकि अब भारत की आर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का हिस्सा 50 प्रतिशत से ज़्यादा है, इसलिए डब्ल्यूपीआई आर्थिक गतिविधि के एक बड़े हिस्से से चूक जाता है। पीपीआई सामान के साथ-साथ सेवा क्षेत्र (जैसे बैंकिंग, टेलीकॉम और इंश्योरेंस) पर भी नजर रखता है। डब्ल्यूपीआई माध्यमिक सामान को कई बार गिनता है क्योंकि वे उत्पादन के अलग-अलग चरण (जैसे, स्टील, फिर ऑटो-पार्ट्स, फिर आख़िरी कार) से गुज़रते हैं। इससे मापी गई महंगाई दर कृत्रिम रूप से बढ़ जाती है। इससे बचने के लिए पीपीआई लागत और उत्पादन कीमतों पर अलग-अलग ढंग से नजर रखता है।

पीपीआई में एक लागत सूचकांक और एक उत्पादन सूचकांक दोनों शामिल हैं। यह एक अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम बनाता है जो दिखाता है कि कैसे उत्पादन की बढ़ती लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ता है। डब्ल्यूपीआई सिर्फ़ घरेलू थोक लेन-देन को मापता है और निर्यात किए जाने वाले सामान को पूरी तरह से इसमें शामिल नहीं करता है। पीपीआई दुनिया भर में उत्पादक मूल्य बदलावों पर नजर रखता है। भारत में, लंबे समय से वाणिज्याक ठेकों और सरकारी मूल्यवृद्धि नियम में डब्ल्यूपीआई का इस्तेमाल होता रहा है। इसलिए, इससे हटकर दूसरी प्रणाली को अपनाने की प्रक्रिया धीरे-धीरे होनी चाहिए। कई देशों ने उत्पादक स्तर पर महंगाई को मापने के लिए पीपीआई को अपना मुख्य पैमाना बनाया है।

आखिर में, यह कहा जा सकता है कि न तो डब्ल्यूपीआई और न ही पीपीआई जीवन-यापन की लागत को मापने का सबसे अच्छा तरीका है। कुल मिलाकर कोई भी सूचकांक दूसरे से "बेहतर" नहीं है। वे बस अलग-अलग नज़रिए से महंगाई को ट्रैक करते हैं। खुदरा महंगाई और रिजर्व बैंक द्वारा तय की जाने वाली ब्याज दरों के लिए, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) सबसे अहम है क्योंकि यह आखिरी उपभोक्ता द्वारा चुकाई जाने वाली असल कीमतों को दिखाता है। जहां पीपीआई उत्पादन और व्यवसाय की लागत को ट्रैक करने का सबसे अच्छा तरीका है, वहीं डब्ल्यूपीआई और पीपीआई दोनों ही जीवन-यापन की लागत को ट्रैक करने के लिए सबसे अच्छे पैमाने नहीं हैं।

खुदरा महंगाई और रिजर्व बैंक द्वारा तय की जाने वाली ब्याज दरों के लिए, सीपीआई मुख्य पैमाना है क्योंकि यह आखिरी उपभोक्ता द्वारा चुकाई जाने वाली असली कीमतों को दिखाता है। बड़े देश और वैश्विक अर्थव्यवस्था सीपीआई, पीपीआई और जीडीपी डिफ्लेटर का इस्तेमाल करके महंगाई पर नजर रखते हैं। अर्थशास्त्री नॉमिनल ग्रोथ डेटा (वर्तमान) से महंगाई के असर को हटाने के लिए पीपीआई का इस्तेमाल करते हैं। चूंकि पीपीआई अप्रत्यक्ष कर और व्यापार मार्जिन को अलग करता है, इसलिए यह असल आर्थिक उत्पादन को ट्रैक करने के लिए एक बेहतर जीडीपी डिफ्लेटर का काम करता है। इसे अपनाना अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के दिशानिर्देश के मुताबिक है, जिससे विदेशी निवेशकों को तुलना करने में आसानी होती है। (संवाद)