राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि भाजपा नेतृत्व 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों को कमजोर करने और संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की रणनीति पर काम कर रहा है। माना जा रहा है कि परिसीमन के बाद बढ़ने वाली लोकसभा सीटों से जुड़े संभावित संवैधानिक संशोधनों के संदर्भ में भी भाजपा अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करना चाहती है।

समाजवादी पार्टी में संभावित टूट की चर्चा सबसे पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य तथा सहयोगी दलों के नेताओं ने उठाई। इनमें सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और मंत्री ओम प्रकाश राजभर तथा निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद प्रमुख हैं।

जिस समय समाजवादी पार्टी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) गठजोड़ को मजबूत करने की बात कर रही है, उसी समय भाजपा ने भी पिछड़े वर्ग के प्रमुख नेताओं को आगे कर समाजवादी पार्टी में टूट की संभावनाओं का संदेश फैलाने का प्रयास किया है।

ओम प्रकाश राजभर ने यह दावा कर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी कि समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और अखिलेश यादव के रिश्तेदार ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र सौंपा है, जिसमें 22 सांसदों की सूची है जो पार्टी छोड़कर अलग समूह बना सकते हैं। राजभर ने यह भी आरोप लगाया कि वर्ष 2012 से 2017 के दौरान समाजवादी पार्टी सरकार में हुई कथित अनियमितताओं की जांच के कारण पार्टी दबाव में है।

केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया कि समाजवादी पार्टी के 25 से अधिक सांसद पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होना चाहते हैं। इसके बाद योगी सरकार में मंत्री डॉ. संजय निषाद ने भी कहा कि समाजवादी पार्टी के कई सांसद उनके संपर्क में हैं और पार्टी छोड़ने के इच्छुक हैं।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इन सभी दावों को पूरी तरह निराधार बताते हुए खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और कोई भी सांसद पार्टी नहीं छोड़ेगा। अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों को कमजोर करने के लिए सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

तथ्य यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीतकर भाजपा को पीछे छोड़ दिया था, जबकि भाजपा 33 सीटों तक सीमित रह गई थी। विधानसभा क्षेत्रों के स्तर पर भी समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन भाजपा के मुकाबले बेहतर माना गया था।ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों की रणनीति उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े विपक्षी दल को अस्थिर दिखाने, उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम पैदा करने तथा संभावित टूट का माहौल बनाने की है। आलोचकों का आरोप है कि इससे राम मंदिर की दान राशि से जुड़े विवादों और केंद्र तथा राज्य की भाजपा सरकारों के कामकाज से जुड़े अन्य मुद्दों से भी लोगों का ध्यान हटाया जा सकता है।

समाजवादी पार्टी में टूट की इन चर्चाओं के समर्थन में अब तक कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में ये दावे राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहते हैं या वास्तव में उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई बड़ा घटनाक्रम सामने आता है, या यह पूरा मामला अयोध्या के राम मंदिर में दान राशि के कथित घोटाले से लोगों का ध्यान हटाने के लिए है। (संवाद)