महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) एक बार फिर राजनीतिक संकट का सामना कर रही है। पार्टी के छह सांसद एकनाथ शिंदे की पार्टी में जा चुके हैं। उद्धव ठाकरे ने अपने विधायकों और सांसदों की बैठक बुलाई थी और स्पष्ट संदेश दिया था कि जो नेता पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे स्वतंत्र हैं। कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि उन्होंने नेतृत्व छोड़ने की पेशकश तक कर दी। पंजाब सहित राष्ट्रीय स्तर पर आम आदमी पार्टी भी चुनौतियों कासामना कर रही है। राज्यसभा के सात सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद पंजाब में आम आदमी पार्टी की स्थिति को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसी तरह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़ी संख्या में विधायकों और सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद अभी भी असंतोष की खबरें हैं।

उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक हलचल जारी है। भाजपा के सहयोगी दलों के कुछ नेताओं ने समाजवादी पार्टी में संभावित टूट की बात कही है, हालांकि समाजवादी पार्टी के नेतृत्व ने इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है। तमिलनाडु में भी द्रविड़ राजनीति के दोनों प्रमुख दलों के भीतर भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों और नेतृत्व संबंधी समीकरणों को लेकर चर्चाएं होती रही हैं।

इन घटनाक्रमों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक दलों की अस्थिरता केवल आंतरिक कारणों का परिणाम है या इसके पीछे बाहरी राजनीतिक दबाव और रणनीतियां भी भूमिका निभाती हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि सत्तारूढ़ दल विभिन्न क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है। वहीं सत्तापक्ष का तर्क है कि दलों के भीतर की कमजोरियां और नेतृत्व संबंधी समस्याएं ही असंतोष को जन्म देती हैं।

दलबदल भारतीय राजनीति में कोई नई घटना नहीं है। लेकिन हाल के वर्षों में इसकी प्रकृति बदल गई है। पहले व्यक्तिगत स्तर पर दलबदल होता था, जबकि अब बड़े पैमाने पर विधायक और सांसद एक साथ दल बदलते दिखाई देते हैं। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। मतदाता किसी व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक दल, विचारधारा और नेतृत्व को ध्यान में रखकर वोट देते हैं। ऐसे में चुनाव जीतने के बाद दल बदल लेना मतदाता के जनादेश की भावना के विपरीत माना जा सकता है।

इसी समस्या को रोकने के लिए 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दलबदल विरोधी कानून बनाया गया था। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों को राजनीतिक अवसरवाद से रोकना और सरकारों की स्थिरता बनाए रखना था। लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट हुआ है कि यह कानून अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया है। दलबदल की घटनाएं जारी हैं और राजनीतिक दल कानून की खामियों का लाभ उठाने के नए तरीके खोज लेते हैं।

आलोचकों का मानना है कि वर्तमान कानून ने निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को सीमित किया है, लेकिन दलबदल को प्रभावी ढंग से रोक नहीं पाया। कई मामलों में विधायकों और सांसदों के सामूहिक रूप से अलग होने या इस्तीफा देकर पुनः चुनाव लड़ने जैसी रणनीतियों ने कानून की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर होती दिखाई देती है।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की स्थिरता और मतदाताओं के विश्वास का विशेष महत्व होता है। जब निर्वाचित प्रतिनिधि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं या राजनीतिक लाभ के आधार पर बार-बार दल बदलते हैं, तो जनता के मन में राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ सकता है। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता और प्रभावशीलता दोनों प्रभावित होती हैं।

इसलिए अब दलबदल विरोधी कानून की व्यापक समीक्षा की जरूरत है। यदि कोई विधायक या सांसद उस दल को छोड़ना चाहता है जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ है, तो उसे पहले अपने पद से इस्तीफा देकर जनता के बीच दोबारा जाना चाहिए। इससे मतदाताओं को यह तय करने का अवसर मिलेगा कि वे उसके नए राजनीतिक निर्णय का समर्थन करते हैं या नहीं।

भारतीय लोकतंत्र विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में सम्मानित है। इसकी मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि जनादेश का सम्मान, राजनीतिक जवाबदेही और संस्थागत स्थिरता से सुनिश्चित होती है। संसद और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे दलबदल विरोधी कानून की कमियों को दूर करने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक सुधारों पर गंभीरता से विचार करें। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। (संवाद)