इन तीन विश्व प्रसिद्ध संस्थाओं विश्व मौसम संगठन, अंतरसरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल और भारतीय मौसम विभाग की नवीनतम रिपोर्टें सुझाती हैं कि विज्ञान आधारित शहरी नियोजन, प्रभावी जल निकासी, जल और वन संरक्षण, आर्द्रभूमियों की सुरक्षा तथा स्थानीय स्तर पर जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल को राष्ट्रीय प्राथमिकता देना ही इस संकट का स्थायी समाधान हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन संकट के मानव जीवन के विभिन्न अति महत्वपूर्ण पहलुओं पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के विस्तृत आकलनों के बाद जारी इन रिपोर्टों का सार यह है कि जलवायु परिवर्तन आर्थिक दृष्टि से भी विकास की गति पर सीधा प्रहार कर रहा है। बाढ़, सूखा, चक्रवात और भूस्खलन हर वर्ष अरबों रुपये की सार्वजनिक-निजी संपत्ति नष्ट कर रहे हैं। सड़कें, पुल, रेलमार्ग, बिजली व्यवस्था और औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखलाएं बार-बार बाधित हो रही हैं।
इनके कारण राहत और पुनर्वास पर सरकारी खर्च बढ़ रहा है, जबकि उत्पादन और श्रम क्षमता घट रही है। विश्व बैंक और आईएमएफ भी इसे पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा मानते हैं।
विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़े बताते हैं कि सन् 2021 में ऊष्मा तनाव से लगभग 159 अरब डॉलर की आर्थिक क्षति का अनुमान था जो 2024- 2026 में बढ़कर लगभग 194 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
इन नामचीन वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि घटती उत्पादकता, श्रम समय की हानि और बढ़ते बीमा दावों के परिप्रेक्ष्य में यदि जलवायु संकट पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया, तो विकास की पारंपरिक अवधारणा में भी आमूल चूल बदलाव करना पड़ सकता है।
इसी कड़ी में भारतीय मौसम विभाग ने भी देश में जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों पर गंभीर चिंता जताते हुए कुछ समय पहले जारी अपने एक अध्ययन पत्र में लिखा है कि जलवायु असंतुलन का सबसे गहरा प्रभाव कृषि पर पड़ रहा है, क्योंकि भारत की बड़ी आबादी आज भी मानसून और प्रकृति पर निर्भर है। अनिश्चित वर्षा, बढ़ता तापमान, मिट्टी की घटती नमी और प्राकृतिक आपदाएं पारंपरिक खेती को कमजोर कर रही हैं।
इस दस्तावेज का आकलन यह है कि वर्ष 2015 - 2021 के बीच अतिवृष्टि से 33.9 मिलियन हेक्टेयर और सूखे से लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई।
इसी प्रकार 2026 में एल-नीनो चक्रवात और मानसून की देरी ने खरीफ उत्पादन की चिंता बढ़ा दी है। फसल चक्र बिगड़ रहे हैं, पारंपरिक बीज कम प्रभावी हो रहे हैं और सिंचाई लागत बढ़ रही है। इसका असर किसानों की आय से आगे बढ़कर खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
मौसम वैज्ञानिक भी अपने विभाग की इस राय से सहमत हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो कृषि संकट आर्थिक ही नहीं, सामाजिक अस्थिरता का कारण बनेगा। इसलिए जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय मुद्दा मानना उसकी गंभीरता को कम करके आंकना माना जा सकता है।
वैज्ञानिक मानते हैं कि कृषि प्रधान भारत देश सदियों से खेती के लिए नदियों, मौसम की नियमितता पर निर्भर था और अभी भी है। लेकिन अब प्रकृति चेतावनी दे रही है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल–मई 2026 में कई शहरों का तापमान 46–48° सेंटीग्रेट तक पहुंचा, लू लगने से भारी संख्या में जानें गईं और बिजली की मांग में लगभग 270 गीगावाट तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।
मौसम विभाग के आंकड़ों की माने तो जुलाई के आरंभ में महाराष्ट्र के कई इलाकों में अधिक वर्षा ने जनजीवन और आधारभूत ढांचे को तहस नहस कर दिया। हिमालय में भूस्खलन, मैदानी क्षेत्रों में बाढ़, तटीय इलाकों में चक्रवात और सूखे की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की बात नहीं, बल्कि वर्तमान काल की वास्तविकता है।
उत्तर में हिमालय, दक्षिण में हिंद महासागर, विस्तृत तटीय क्षेत्र, विशाल मैदान और शुष्क भूभाग के कारण मौसम का मामूली असंतुलन भी करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है।
वर्ष 2026 में मानसूनपूर्व लू के थपेड़ों ने गर्मी के रिकॉर्ड तोड़े, जबकि असमान में मानसून ने कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ ला दी। यह चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति है।
कंक्रीट का अनियंत्रित विस्तार, नदी तटों पर अतिक्रमण, आर्द्रभूमियों का विनाश और अवैज्ञानिक शहरी नियोजन ने प्राकृतिक आपदाओं को मानवीय त्रासदी बना दिया है। आज अधिकांश आपदाएं प्रकृति से अधिक हमारी विकास नीतियों का परिणाम हैं। मौसम विभाग का दावा है कि लू की अवधि और तीव्रता से बढ़ रही है, जिससे मौसमी संतुलन बिगड़ने लगा है।
जलवायु असंतुलन को लेकर कृषि मंत्रालय ने भी इस पर अपनी चिंता जताते हुए यह कहा है कि अनिश्चित वर्षा, बढ़ता तापमान, मिट्टी की घटती नमी और प्राकृतिक आपदाएं पारंपरिक खेती को कमजोर कर रही हैं। वर्ष 2015-2021 के बीच अतिवृष्टि से 33.9 मिलियन हेक्टेयर और सूखे से लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई।
वर्ष 2026 में एल-नीनो और मानसून की देरी ने खरीफ उत्पादन की चिंता बढ़ा दी। फसल चक्र बिगड़ रहे हैं, पारंपरिक बीज कम प्रभावी हो रहे हैं और सिंचाई लागत बढ़ रही है। इसका असर किसानों की आय से आगे बढ़कर खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। यदि यह स्थिति बनी रही, तो कृषि संकट आर्थिक ही नहीं, सामाजिक अस्थिरता का कारण बनेगा। इसलिए जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय मुद्दा मानना उसकी गंभीरता को कम करके आंकना होगा।
इधर, भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय भी मानता है कि जलवायु परिवर्तन का गंभीर प्रभाव जन जीवन के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। तीव्र गर्मी लू, डिहाइड्रेशन और हृदय रोग की घटनाओं को बढ़ा रही है । बाढ़ के बाद मलेरिया, डेंगू और जलजनित बीमारियां फैल रही हैं। बढ़ता तापमान और वायु प्रदूषण श्वसन रोगों को और गंभीर बना रहे हैं। बच्चे, बुजुर्ग, निर्माण श्रमिक, खेतिहर मजदूर और खुले में काम करने वाले लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही चेतावनी दे चुका है कि आने वाले दशकों में जलवायु परिवर्तन सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा।
जलवायु परिवर्तन और इसके प्रतिकूल प्रभावों के अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं कि इस संकट का सामना करने के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी बल्कि स्थानीय स्तर पर जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में अपनाकर ही इस संकट का स्थायी समाधान हासिल किया जा सकता है।
यदि हालत पर समय रहते काबू नहीं किया गया तो चरम मौसम की घटनाएं हर वर्ष बढ़ेगी और उसकी पृष्ठभूमि में फिलहाल अदृश्य आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संकट स्थायी रूप धारण कर लेगा।
बदलते मौसम का साफ संदेश है कि जलवायु परिवर्तन पर निर्णायक, वैज्ञानिक और सामूहिक कार्रवाई अब केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि भारत सहित सभी देशों के सुरक्षित और सतत भविष्य की अनिवार्य अवश्यकता है जिसे और अधिक टाला जाना मानवीयता के अस्तित्व के लिए घातक साबित होगा।
विकास की गति पर सीधा हमला कर रहा है जलवायु परिवर्तन संकट
कुशाल जीना - 2026-08-06 05:31 UTC
नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर संकट के स्थाई समाधान से जुड़ी तीन अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय संस्थाओं की हाल की रिपोर्टों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि जलवायु परिवर्तन संकट विकास की गति पर सीधा हमला करके उसे तबाह कर रहा है जिससे मानव जीवन खतरे में पड़ रहा है।