बेफिक्र जापानी निवेशक कम लागत वाले विनिर्माण और निर्यात के बजाय अपने निवेश के लिए घरेलू मांग पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। भारत की विकास दर ने वैश्विक आर्थिक तनाव (जो ट्रंप के ऊंचे टैरिफ़ के कारण पैदा हुआ) के बावजूद मज़बूती दिखाई है और खर्च पर आधारित अर्थव्यवस्था के लिए एक नए खिलाड़ी के तौर पर उभरा है, जो "नए भारत" की तस्वीर पेश करता है। नेल्सन आईक्यू वर्ल्ड डेटा लैब की रिपोर्ट के अनुसार, अगले दशक में भारत अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा घरेलू बाज़ार बन सकता है। अपनी मौजूदा विकास दर के आधार पर यह चीन से आगे निकल जाएगा।

भारत ने दुनिया में सबसे ज़्यादा जीडीपी विकास दरों में से एक दर्ज की है, जो 2025-26 में 7.9 प्रतिशत रही। आने वाले वर्षों में भी इसी तरह की विकास दर दर्ज करने की उम्मीद है। इसकी उच्च जीडीपी विकास दर निर्यात के बजाय घरेलू मांग से प्रेरित थी, जिसका कारण इसकी भूजनसांख्यिकी बढ़त (युवा आबादी का लाभ) है। चीन की घरेलू खपत भारत से पीछे है, क्योंकि भारत में मध्यम आयु वर्ग और अमीर आबादी का हिस्सा ज़्यादा है।

इसका मतलब है कि भारत में विदेशी निवेश के लिए एक नई गतिशीलता आई है, जो आसियान-10 और चीन से आगे निकल रही है। जहां भारत में जापानी निवेश का लक्ष्य घरेलू मांग और कम लागत वाली वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला पर केंद्रित है, वहीं आसियान-10 में चीनी निवेश अमेरिका को सामान के निर्यात के लिए बढ़ा है।

चीन की तुलना में आसियान पर अमेरिकी टैरिफ़ कम है। जहां चीनी सामानों के सीधे अमेरिका निर्यात पर 47.5 प्रतिशत का अमेरिकी टैरिफ़ लगता है, वहीं आसियान सदस्य देशों के निर्यात पर टैरिफ़ 10 प्रतिशत से 49 प्रतिशत के बीच होता है। भले ही आसियान-10 सदस्य देशों के बीच टैरिफ में काफी अंतर है, लेकिन चीनी एफडीआई वाले सदस्य देशों में बने सामान पर अमेरिका को सीधे किए जाने वाले चीन के निर्यात की तुलना में कम टैरिफ लगता है।

आसियान में चीनी निवेश मुख्य रूप से 4 सदस्य देशों में केंद्रित है। ये देश हैं - मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड और वियतनाम। वियतनाम को छोड़कर, बाकी तीन सदस्य देशों पर अमेरिका का पारस्परिक टैरिफ 24% से 36% के बीच है। यह चीन के निर्यात पर लगने वाले टैरिफ से काफी कम है। इससे आसियान में चीनी निवेशकों को सामान बनाने और उसे अमेरिका निर्यात करने का खास फायदा मिलता है।

आखिरकार, अमेरिका के ऊंचे पारस्परिक टैरिफ के बावजूद 2024 और 2025 में आसियान से अमेरिका को होने वाले निर्यात में तेज़ी आई।

भारत में जापानी निवेश का हालिया ट्रेंड निवेश के क्षेत्रों की दिशा में काफी बदलाव दिखाता है। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा और फार्मास्यूटिकल्स जैसे विनिर्माण क्षेत्र के बजाय वित्तीय सेवाओं में बड़ा निवेश किया गया।

सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग, मिज़ुहो सिक्योरिटीज और एमयूएफजी बैंक का बड़ा निवेश इसके उदाहरण हैं। यस बैंक, एवेन्डस कैपिटल और श्रीराम फाइनेंस में उनके बड़े निवेश से भारत में जापानी निवेश की एक नई दिशा का पता चलता है, जिसमें ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा और फार्मास्यूटिकल्स जैसे विनिर्माण क्षेत्र पीछे छूट गए हैं।

एक आधिकारिक दस्तावेज़ के अनुसार, सेवा क्षेत्र में जापानी निवेश विनिर्माण क्षेत्र से आगे निकल गया। 2000 से 2025 के दौरान, भारत में कुल जापानी निवेश में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 18.1% थी, जिसके बाद ऑटोमोबाइल और अन्य क्षेत्रों का स्थान रहा।

भारत में जापानी निवेश का वित्तीय सेवा की ओर झुकाव बढ़ने के कारणों में घरेलू उपभोक्ता बाजार का बढ़ना और उससे जुड़े बड़े कर्ज बाजार का विकास शामिल है। जापानी वित्तीय संस्थान तेज़ी से भारत की स्थानीय नॉन-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) और निजी वाणिज्यक बैंकों के साथ जुड़ रहे हैं।

उदाहरण के लिए, मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंस कॉर्पोरेशन (एमयूएफजी) ने रिटेल और व्हीकल कर्ज का विस्तार करने के लिए श्रीराम फाइनेंस में 20% हिस्सेदारी के लिए $ 4.4 अरब का निवेश करने का वादा किया। सुमितोमो मित्सुई फाइनेंस ग्रुप ने यस बैंक में 24.2% की बड़ी हिस्सेदारी हासिल करके सबसे बड़ा शेयरहोल्डर बनने का मुकाम हासिल किया।

जेटरो के एक सर्वे के अनुसार, भारत में 80.3% जापानी निवेशक विस्तार करने पर विचार कर रहे हैं, जो सबसे अधिक है। इसके विपरीत, थाईलैंड में व्यापार विस्तार की इच्छा में कमी आई और चीन में यह रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई। सर्वे से पता चला है कि जापानी निवेशकों के लिए मुनाफ़ा कमाने के मामले में भारत तीसरे नंबर पर है, और इसके बाद दक्षिण कोरिया और ताइवान का स्थान है।

जापानी निवेश को आकर्षित करने में भारत ने आसियान-10 देशों को पीछे क्यों छोड़ दिया है, जबकि जापान दुनिया के सबसे बड़े फ़्री ट्रेड ब्लॉक आरसीईपी (रीजनल कोऑपरेशन ऑफ़ इकोनॉमिक पार्टनरशिप) का सदस्य है? भारत आरसीईपी का सदस्य नहीं है।

इसके पीछे जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की दूरदर्शिता का अहम योगदान है, जिन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए यह पहल की थी। जापान के ऐतिहासिक और राजनीतिक संबंध चीन के साथ विवाद के कारण जापान, अमेरिका, भारत और ऑस्ट्रेलिया की सदस्यता वाला एफओआईपी (फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक) बना। इसका मकसद चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करना है।

इसलिए, जापान के दिवंगत प्रधानमंत्री शिंजो आबे की दूरदृष्टि की विरासत भारत-जापान संबंधों का मुख्य आधार बनी हुई है। चीन से आगे निकलना और एपओआईपी को मजबूत करना, मजबूत आर्थिक आधार वाले भारत के 'विकसित भारत' के लक्ष्य के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। (संवाद)