पिछले साल बिहार में एसआईआर की शुरुआत के बाद से, यह न केवल चुनावी विवादों रहा, बल्कि देश की बड़ी राजनीतिक प्रक्रिया पर हावी हो गया है। अंत में, प्रक्रिया जनित आंकड़ों के अलावा, स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के रूप में भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) की अखंडता भी संदेह के घेरे में आ गयी। एसआईआर शुरु करने के समय, ईसीआई ने दावा किया था कि यह कुछ भी असामान्य नहीं है और यह मतदाता सूची को साफ करने के लिए 2002-03 में किए गए कार्यों की प्रतिकृति है। ईसीआई सच्चाई को बताया नहीं, क्योंकि न तो संदर्भ बिंदु का चयन किया गया था और न ही 2002-03 में अपनाए गए तरीके को कभी भी सार्वजनिक रूप में रखा गया। हालांकि, हाल ही में 2002-03 एसआईआर के लिए दिशानिर्देश खुले में आ गए हैं।
यह पूरे विवाद को पूरी तरह गलत बयानी और झूठ के रूप में स्थापित करता है। शुरुआत से ही मतदाता सूची तैयार करने में अपनाए गए तरीकों को ध्यान में रखते हुए, 2002-03 की प्रक्रिया में मतदाता को खुद को नामावली में शामिल करने के लिए आवेदन जमा करने की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन 2025 में शुरू की गई कवायद ने मतदाताओं के आवेदन पत्रों के साथ आवश्यक 11 दस्तावेजों को सूचीबद्ध करके एक मौलिक बदलाव किया, जो कि नामावली में उनकी जगह को मजबूती से सुरक्षित करेगा। यह उनके नाम 2002-03 से पहले के चुनावों की सूची में उनके माता-पिता में से किसी एक के नाम से जुड़े होने के अलावा था। यह घोषणा करने के बाद चालाकी से कहा गया कि ऐसे माता-पिता के संबंधों वाले व्यक्तियों को कोई और दस्तावेज़ जमा नहीं करना होगा।
एक समयसीमा भी थी जो संपूर्ण पुनरीक्षण करने के लिए बहुत छोटी थी। भाजपा का विरोध करने वाले सभी लोगों के कड़े विरोध के बावजूद, ईसीआई अहंकार की हद तक लापरवाही बरतते हुए आगे बढ़ी। यह अब तक चली आ रही परंपरा के बिल्कुल विपरीत था, जिसमें कहा गया था कि अतीत में जब भी ऐसे कठोर कदमों की परिकल्पना की गई थी, तब ईसीआई केवल राजनीतिक परिदृश्य में आम सहमति के आधार पर कार्य करता था। बिहार एसआईआर के परिणाम ही चेतावनी संकेत भेजने के लिए पर्याप्त थे जिसके कारण 65 लाख नाम हटा दिए गए थे। चुनाव विशेषज्ञों और इस विषय के विशेषज्ञों ने स्पष्ट रूप से अपनी आशंका व्यक्त की थी कि देश भर में यह 10 करोड़ नामों तक पहुंच सकता है। ईसीआई और सत्तारूढ़ व्यवस्था के समर्थकों ने इस अनुमान की आलोचना की थी। लेकिन अब ड्राफ्ट रोल के प्रकाशन के बाद जहां एसआईआर हुआ है, नागालैंड और त्रिपुरा को छोड़, यह संख्या वास्तव में 13 करोड़ 37 लाख है। इसमें हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर शामिल नहीं है जहां एसआईआर अभी होना बाकी है। असम में भी एसआईआर नहीं हुआ।
जो बात अधिक चिंताजनक है वह केवल संख्या मात्र नहीं है, बल्कि विशिष्ट राज्यों के संदर्भ में देश की जनसंख्या के साथ तुलना भी है। आंकड़ों में वास्तव में केवल दो ही संभावनाएं हो सकती हैं - या तो मतदाताओं की कम गिनती या जनसंख्या की अधिक गिनती। चूंकि दोनों गणनाएं सरकारी एजंसियों द्वारा की जाती हैं, इसलिए केवल एक ही स्पष्टीकरण हो सकता है कि एसआईआर ड्राफ्ट मतदाता सूची ने स्वयं बड़े पैमाने पर नाम हटा दिया है।
लेकिन यह कैसे संभव है, क्योंकि मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता संविधान के अनुच्छेद 326 द्वारा परिभाषित की गई है, जिसे बाद में 18 साल के बच्चों के अधिकार का विस्तार करने के लिए संशोधित किया गया है?
मतदाता की नागरिकता का संदर्भ मूर्त है। ईसीआई के पास किसी मतदाता की नागरिकता तय करने का संवैधानिक विशेषाधिकार नहीं है। यह किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से बाहर करने के लिए केवल गृह मंत्रालय के संबंधित अधिकारियों से जांच करा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय में चली लंबी न्यायिक कार्यवाही में भी सर्वोच्च न्यायपालिका ने बिना किसी अस्पष्टता के इस बात को दोहराया है।
फिर भी वोटरों को हटा दिया गया है और इसलिए एसआईआर अभ्यास निश्चित रूप से बहिष्करणीय रहा है। राज्यवार नतीजों की जांच से यह और अधिक स्पष्ट हो गया कि पूरी प्रक्रिया बेपरवाही से सम्पन्न की गयी है। सबसे विवादास्पद अभ्यास पश्चिम बंगाल में किया गया है, जहां मैपिंग और प्रारंभिक ड्राफ्ट जारी होने के बाद, 'तार्किक विसंगति' को चिह्नित करने के लिए एक यादृच्छिक एल्गोरिदम संचालित फ़्लैगिंग के आधार पर एक तीसरी परत बनाई गई थी। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से, ईसीआई के बहिष्कार के फैसले की प्रभावकारिता की जांच करने के लिए न्यायिक अधिकारियों सहित 19 न्यायिक न्यायाधिकरण बनाए गए। अंततः, इन न्यायाधिकरणों द्वारा 38,10,620 अपीलों की जांच की जानी थी। प्रारंभिक धारणा यह थी कि इनमें से अधिकांश उन मतदाताओं के नाम होंगे जिनके नाम हटा दिये गये हैं। लेकिन अब जो बात सामने आई है वह यह है कि इनमें से 31 लाख अपीलें पहले से शामिल नामों को हटाने की थीं। छोटी 82,782 अपीलों में से जिनकी जांच की गई और फैसला सुनाया गया, 91 प्रतिशत बहाल कर दी गई हैं।
जहां तक नाम खारिज करने के आवेदनों की बात है तो न केवल पश्चिम बंगाल में, बल्कि अन्य जगहों पर भी बड़े पैमाने पर अनियमितता के आरोप हैं। यह मुख्य रूप से भाजपा द्वारा तैयार किया गया था और बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) पर फॉर्म 7 को थोक में जमा करके नाम हटाने के लिए दबाव डाला गया था। यह पूरी तरह से संसद द्वारा अधिनियमित चुनाव कानूनों का उल्लंघन है। 11 सितंबर के इंडियन एक्सप्रेस संपादकीय का संदर्भ लेना उपयोगी होगा। "गोड्डा में कम से कम चार बूथों पर, चुनाव अधिकारियों और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच गतिरोध ने एक परेशान करने वाला पैटर्न पेश किया है। भाजपा कार्यकर्ता बड़ी संख्या में फॉर्म 7 जमा कर रहे हैं, ड्राफ्ट रोल से नाम हटाने की मांग कर रहे हैं। मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत, फॉर्म 7 प्रस्तावित समावेशन पर आपत्ति, या मौजूदा नाम हटाने के अनुरोध की अनुमति देता है। यहां लाल झंडे स्पष्ट हैं - भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा थोक आपत्तियां केवल प्रक्रियात्मक आरोपों को आमंत्रित नहीं करती हैं, बल्कि उल्लंघन के कारण, वे अल्पसंख्यक मतदाताओं को लक्षित रूप से हटाने की गंभीर चिंता जताते हैं। हटाए जाने के लिए चिह्नित किए गए लोगों में से कई ने आवश्यक दस्तावेज़ जमा किए थे, पीढ़ियों से एक ही घर में रह रहे थे, या 2003 की सूची में शामिल थे।
राज्यों में, एसआईआर तेजी से रोल साफ करने के लिए नहीं, बल्कि परेशान करने और इस प्रक्रिया में, कमजोर मतदाता को मताधिकार से वंचित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह उसके प्रति अविश्वास है, यह उसे अपनापन स्थापित करने के लिए कहता है, या, अधिक सही ढंग से, अविश्वास के आरोप का मुकाबला करने के लिए कहता है जो कि अभ्यास में निहित है। राष्ट्रव्यापी, एसआईआर मतदाता पर सुबूत पेश करने का बोझ डालता है, उन दस्तावेजों की मांग करता है जिन्हें प्राप्त करना अक्सर मुश्किल होता है, अवास्तविक समय सीमा निर्धारित करता है और, ऐसा करने पर, प्रक्रिया को ही सजा बना देता है। इसकी जिम्मेदारी सीईसी ज्ञानेश कुमार की निगरानी में चुनाव आयोग के पास होनी चाहिए।
लेकिन फॉर्म 7 का दुरुपयोग सिर्फ झारखंड तक ही सीमित नहीं है। इसी तरह के आरोप उत्तराखंड के बारे में भी लगे थे और ऐसा लगता है कि भाजपा कार्यकर्ता न केवल सूची में गंभीर रूप से हेराफेरी करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि चुनाव प्राधिकरण की अंतिम कार्रवाई, बीएलओ से लेकर चुनाव रिटर्निंग ऑफिसर (ईआरओ) तक, इन बेशर्म प्रयासों को आधिकारिक संरक्षण मिल रहा है। इन सभी को एक साथ जोड़ने वाला सामान्य सूत्र ऐसी अनियमितताओं पर ईसीआई की स्पष्ट चुप्पी है।
दूसरी बात जो पश्चिम बंगाल अभ्यास के दौरान स्पष्ट हुई वह यह थी कि बहाली के लिए लगभग 7 लाख आवेदनों में से, न्यायिक न्यायाधिकरणों द्वारा जांच के परिणाम जो किसी भी मामले में बेहद सीमित थे और भौगोलिक रूप से कोलकाता में केंद्रित थे (उन जिलों में नहीं जिन्हें न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए और अधिक फैलाया जाना चाहिए था), 91 प्रतिशत को वापस मतदाता सूची में बहाल करने के लिए उपयुक्त पाया गया। तथ्य यह है कि मनमाने ढंग से तार्किक विसंगतियों के आधार पर 'अंडरजुडिकेशन' सूची में रहने वाले सभी लोगों को वोट देने से वंचित कर दिया गया, जिससे रिकॉर्ड और भी खराब हो गया है।
स्पष्ट दस्तावेजी और सांख्यिकीय रिकॉर्ड के साथ-साथ बिहार में अभ्यास की स्पष्ट त्रुटिपूर्ण प्रकृति के बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि ईसीआई को संविधान के अनुच्छेद 324 में निहित स्वतंत्र होने का अधिकार है, लेकिन स्पष्ट सुबूतों के बावजूद इस अधिकार को पूर्ण बनाने के लिए शीर्ष अदालत की जिद निराशाजनक है। ईसीआई नागरिकों के संवैधानिक अधिकार को सुनिश्चित करने के प्रति समान रूप से जागरूक नहीं है। किसी भी संवैधानिक प्राधिकारी के पास ऐसी शक्तियां नहीं हो सकतीं जो मतदाताओं को सूची से बाहर करने और हेराफेरी करने की ओर ले जाएं।
इसके अलावा, देश और राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए खतरा इस तथ्य में निहित है कि अल्पसंख्यकों, दलितों, महिलाओं और गरीब मेहनतकश लोगों को मताधिकार से वंचित करने के साथ अत्यधिक असमानता दर्शाता है। राज्यवार मतदाता सूची के मसौदे और नाम हटाने के विशेष रूझान की जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ है। भले ही कोई यह स्वीकार करने में इच्छुक हो कि मताधिकार से वंचित करने के ऐसे प्रयास राजनीतिक रूप से सत्तारूढ़ भाजपा के हितों के अनुकूल थे, पहचान विशिष्ट परिणाम हमारी संवैधानिक भावना और नींव के खिलाफ थे। आज इस पृष्ठभूमि में इस तरह की भ्रष्ट और हेराफेरी भरी कवायद के साथ, आसन्न जनगणना भी उन परिवर्तनों से भरी हुई है जो जुड़ते हुए प्रतीत होते हैं। नागरिकता संबंधी मुद्दे इसमें जुड़े हैं। नए तथाकथित जनसांख्यिकी आयोग के लॉन्च ने इस प्रक्रिया को और पेचीदा बना दिया है। संवैधानिक योजना के अनुसार, जनगणना प्रक्रिया निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का आधार बनेगी। ऐसा प्रतीत होता है कि संपूर्ण प्रयास ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों का निर्माण और पुनर्गठन करना है जो सत्तारूढ़ व्यवस्था के पक्ष में चुनावी रूप से पक्षपाती होंगे।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनावी बांडों को खारिज करने और उन्हें असंवैधानिक करार देने के साथ, गुप्त कॉर्पोरेट फंडिंग और स्पष्ट बदले की भावना की दिशा में एक बेशर्म कदम विफल हो गया। लेकिन राजनीतिक दलों की आय के विस्तृत खातों की जांच से भाजपा तक धन की पहुंच की खगोलीय रूप से विषम प्रकृति सामने आई है। ऐसी फंडिंग असामान्यताओं के संदर्भ में, बीबीसी की एक रिपोर्ट के नवीनतम खुलासे से संकेत मिलता है कि राजनीतिक दलों की अवैध फंडिंग के माध्यम से और अधिक विकृतियां होने का खतरा है। पहले से ही ऐसी रिपोर्ट थी कि वित्तीय वर्ष 2022-23 में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की आय में 223 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। बीबीसी की रिपोर्ट से पता चला है कि गुजरात स्थित छह पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों ने 2023-24 में दान में लगभग 1,700.78 करोड़ रुपये जुटाए। यह भाजपा को छोड़कर पांच राष्ट्रीय दलों की संचयी आय से कम से कम 200 करोड़ रुपये अधिक है। यह इस तथ्य के बावजूद था कि ये पार्टियां मुश्किल से ही उम्मीदवार उतारती थीं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इनमें से पांच गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल गुजरात आधारित थे और उनकी संचयी आय 2019 से 2024 के बीच 2,316 करोड़ रुपये थी।
बीबीसी ने इनमें से चार पार्टियों का पता अहमदाबाद में लगाया, जबकि दो अन्य का मुख्यालय गुजरात के अन्य हिस्सों में है। फंडिंग की ऐसी अजीब प्रकृति का सुबूत किसी भी तरह से गलत काम को स्थापित नहीं कर सकता है। हालांकि, जो बात अस्वीकार्य है, वह यह है कि चुनाव में भाग नहीं लेने वाली पार्टियों के लिए इस तरह की अस्पष्ट फंडिंग के सवाल को आयकर और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी एजंसियों को भेजने में ईसीआई की विफलता है। ईडी ने विशेष रूप से वित्तीय गड़बड़ी के हर छोटे संकेत पर कूदने के लिए कुख्याति अर्जित की है जो विपक्षी पार्टियों से जुड़ी हो सकती है। इस तरह के अति-उत्साही और अक्सर गलत और पक्षपाती प्रयासों के कारण चुनावों से पहले विपक्षी मुख्यमंत्रियों की गिरफ्तारियां हुई है। लेकिन बीबीसी की रिपोर्ट के बाद भी किसी संबंधित अधिकारी की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
भारतीय संविधान को अपनाने और 1952 में आम चुनाव होने के बाद से, भारत ने सबसे बड़े चुनावी लोकतंत्र होने की प्रतिष्ठा अर्जित की थी। दुनिया भर से चुनाव अधिकारी उन प्रथाओं का अध्ययन करने आए थे जो काफी हद तक अद्वितीय साबित हुई हैं और स्पष्ट विश्वसनीयता के साथ कायम हैं। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक बीती हुई बात है। चुनाव के संचालन की वर्तमान दिशा मुख्य और अन्य आयुक्तों की चयन प्रक्रिया के माध्यम से ईसीआई को एक कार्यकारी शाखा में बदलने वाली सरकार की विधायी कार्रवाई के परिणामस्वरूप एक गतिरोध पर पहुंच गई है। नागरिकों का विश्वास अब कायम नहीं रह सकता। समान अवसर और स्वतंत्र ईसीआई के साथ पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित किए बिना, भविष्य अंधकारमय है। विपक्षी दलों को भी स्वतंत्र चुनावों के संचालन के अधिक विश्वसनीय सुबूतों की मांग करने के लिए एक साथ आना होगा जिसमें चुनाव निकाय के शीर्ष पर मौजूदा पदाधिकारियों को हटाना भी शामिल हो सकता है। (संवाद)
एसआईआर भारत के चुनावी लोकतंत्र में एक व्यवस्थित हेराफेरी
चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं
नीलोत्पल बसु - 2026-09-23 10:25 UTC
अभी हाल ही में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की वाक्पटु मितव्ययिता ने एक अत्यंत संक्षिप्त अवलोकन का मार्ग प्रशस्त किया है। उन्होंने राय दी है कि कुछ नागरिकों की 'थोड़ी असुविधा' के बावजूद, 'निष्पक्ष चुनाव' कराने के लिए मतदाता सूची को साफ करने के लिए देश भर में किया गया विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) आवश्यक था। इसे तथ्यों को कम करके बताने वाला सबसे खराब बयान माना जा सकता है।