आज़ादी के बाद की राजनीतिक अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक रूप से ज़मीन, राज्य प्रशासन और नौकरशाही पर ऊंची जातियों के नियंत्रण पर टिकी थी। 1990 के दशक के मंडल आंदोलन ने समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के ज़रिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दलितों को राजनीतिक सत्ता तक पहुंचाया। 2017 से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के तहत, विकास की गति को बढ़ावा देने और उसे नया रूप देने के लिए किसी स्पष्ट रास्ते का पूरी तरह से अभाव है।

हालांकि योगी की भाजपा सरकार सामाजिक संकेतकों को बेहतर बनाने के लिए भारी निवेश का दावा करती है, स्वास्थ्य और प्राथमिक शिक्षा में संरचनात्मक रूप से कम निधि और ऐतिहासिक सामाजिक-आर्थिक विभाजन, दक्षिणी भारतीय राज्यों की तुलना में व्यापक मानव पूंजी निर्माण को सीमित करते हैं। अपने पिछले 10 वर्षों के शासन के दौरान, भाजपा ने राज्य में बढ़ने और विस्तार करने के लिए केवल नफ़रत की राजनीति और हिंदू-मुस्लिम समीकरण का इस्तेमाल किया।

ऐसा प्रतीत होता है कि पारंपरिक ऊंची जाति के सामाजिक अधिकार और तेज़ी से बढ़ते निचली जाति के गठबंधन के बीच का तालमेल राज्य के चुनावी नक्शे को तय करेगा। भाजपा पारंपरिक रूप से अपने मुख्य आधार के तौर पर ऊंची जातियों (मुख्य रूप से ब्राह्मण, ठाकुर/क्षत्रिय और वैश्य) पर निर्भर रही है। इन समूहों के पास ज़रूरत से ज़्यादा धन, ज़मीन का मालिकाना हक और प्रशासनिक ताकत है।

2027 से पहले इस राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए, भाजपा सोची-समझी सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर रही है। राज्यसभा चुनावों के लिए नामांकन से यह साफ़ संदेश जाता है कि पार्टी ने अपने पारंपरिक ऊंची जाति वाले गठबंधन को मज़बूत करने के लिए सावधानी से टिकट बांटे हैं और साथ ही गैर-यादव ओबीसी और दलितों को भी जगह दी है। फिर भी, ऊंची जातियों की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह एकजुट नहीं है, और अंदरूनी खींचतान से कमज़ोरियां पैदा हो रही हैं। राज्य-स्तरीय नियमों और विश्वविद्यालयों में समानता से जुड़े दिशा-निर्देशों को लेकर विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के मतदाताओं में बेचैनी है, जिससे घरेलू राजनीतिक चुनौतियां और स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनका फ़ायदा विपक्ष उठाना चाहता है।

विपक्षी पार्टियां दोतरफा रणनीति अपनाकर ऊंची जातियों की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था का सामना कर रही हैं। पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) गठबंधन सपा के नेतृत्व में एकजुट हो रहा है, ब्राह्मण वोटों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है और "जातिगत समीकरणों को नए सिरे से तय करने" की कोशिश कर रहा है।

उत्तर प्रदेश में चुनावी मुकाबला बहुत कड़ा होगा। ऐसा लगता है कि चुनावी माहौल इंडिया गठबंधन के पक्ष में झुका है। इसकी वजह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मनमाना कामकाज का तरीका है, जिसे अक्सर अपराध के प्रति सख्त "ज़ीरो-टॉलरेंस नीति" के नाम पर "मसलमैन" या "बुलडोज़र पॉलिटिक्स" कहा जाता है।

अपने दस साल के शासनकाल में योगी ने ब्राह्मणों, राजपूतों और अन्य ऊंची जातियों के बीच की खाई को और चौड़ा ही किया है। योगी पर अपनी जाति के लोगों, यानी राजपूतों को बढ़ावा देने और राजपूत अपराधियों को खुली छूट देने के आरोप राजनीतिक विश्लेषकों, विपक्षी दलों और पार्टी के अंदरूनी गुटों के बीच काफी बहस का विषय रहे हैं। जिन ब्राह्मणों का पारंपरिक रूप से राजनीति और प्रशासन पर नियंत्रण रहा है, उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया है।

ऊंची जातियों में भी एकजुटता नहीं रही है। उनमें सत्ता और संसाधनों को लेकर काफी प्रतिस्पर्धा है। अपनी ही जाति के योगी के सत्ता में आने के बाद ठाकुर आक्रामक हो गए। राजपूतों और ब्राह्मणों के बीच दुश्मनी कोई छिपी हुई बात नहीं है। मंडल के बाद के राजनीतिक माहौल ने ऊंची जातियों के समीकरण बदल दिए। पिछड़ी जातियों और दलितों की मुखर राजनीति के उदय ने ऊंची जातियों को साझा राजनीतिक जगहों पर काम करने के लिए मजबूर किया, जिससे कभी-कभी क्षेत्रीय राजनीतिक संरक्षण पर नियंत्रण के लिए ऊंची जातियों के भीतर ही आपसी टकराव बढ़ गया।

कांग्रेस का उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (यूपीसीसी) का नया अध्यक्ष एक प्रमुख ब्राह्मण नेता प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा 'मोना' को बनाना, ब्राह्मणों तक पहुंचने की उसकी रणनीति का हिस्सा है। लेकिन राजनीतिक हलकों में उनकी इस क्षमता को लेकर संदेह है कि क्या वह ब्राह्मणों का सार्वजनिक चेहरा बन पाएंगी और उनकी आकांक्षाओं को समझ पाएंगी। उनकी ब्राह्मण पृष्ठभूमि शायद बहुत मददगार साबित न हो।

कांग्रेस ने इमरान मसूद (एक मुस्लिम नेता) को कार्यकारी अध्यक्ष, और देवेंद्र निषाद (अति पिछड़ी जातियों से) और आलोक प्रसाद (एक दलित नेता) को वरिष्ठ उपाध्यक्ष नियुक्त किया। इससे ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित-ईबीसी का एक मिला-जुला गठबंधन बनता है, जिससे उनकी वोटर अपील बढ़ सके। चूंकि प्रमोद तिवारी के सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ अच्छे कामकाजी संबंध हैं, इसलिए कांग्रेस नेतृत्व को भरोसा है कि सीट बंटवारे में कोई दिक्कत नहीं आएगी।

भाजपा ने केंद्रीय नेताओं के दौरों और अपनी संगठनात्मक रणनीति व वैचारिक एजेंडे पर ध्यान केंद्रित करते हुए पहले ही तैयारियां तेज़ कर दी हैं। पार्टी ने 2022 में जिन 376 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से 255 जीतीं और 41.29% वोट हासिल किए। समाजवादी पार्टी ने 2022 में जिन 347 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से 111 जीतीं और 32.06% वोट शेयर हासिल किया। कांग्रेस, जिसने 2022 में 399 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था, ने 2.33% वोट शेयर के साथ दो सीटें जीतीं।

2027 के विधानसभा चुनावों में छोटी दलित और पिछड़ी जाति की पार्टियों की भूमिका अहम होगी। उप-जाति के आधार पर राजनीतिक वफादारी बनाए रखने वाली इन पार्टियों ने दलितों और पिछड़ी जातियों को एक एकजुट और संगठित ताकत के तौर पर उभरने नहीं दिया है। लेकिन यूपी में बीजेपी को सत्ता में लाने में इनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। हालांकि, बीजेपी की उत्तर प्रदेश इकाई के मुख्य समूह ने जेन जेड और महिलाओं तक पहुंचने की रणनीति बनाने के लिए कई बैठकें कीं, लेकिन वे अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाए। राहुल गांधी और सीजेपी जेन जेड की पसंद रहे हैं। वे योगी की जाति और सांप्रदायिक राजनीति से निराश हैं। जिस बात ने उन्हें और ज़्यादा नाराज़ किया है, वह है विरोध की आवाज़ को दबाने के लिए योगी का सख़्त रवैया अपनाना।

राहुल गांधी की हालिया बड़ी रैलियां "छात्रों की गूंज" इसके सुबूत हैं। ज़ाहिर है, भाजपा की रणनीति में शासन का प्रदर्शन, आक्रामक सोशल इंजीनियरिंग और खास डेमोग्राफिक ग्रुप्स तक पहुंचने की कोशिशों का 'जेन जेडZ' पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। ओबीसी को एकजुट करने और उन्हें अपने पाले में लाने की उनकी आक्रामक राजनीतिक रणनीति यूपी की राजनीति का मुख्य केंद्र है। कांग्रेस पार्टी की मुख्य विचारधारा को सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की ओर मजबूती से मोड़कर, गांधी ने जाति जनगणना की बहस को राष्ट्रीय स्तर पर मुख्यधारा में ला दिया है।

देश भर में जाति जनगणना, 50% आरक्षण की सीमा हटाने और ज़्यादा प्रतिनिधित्व के लिए राहुल गांधी के लगातार अभियान ने दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों के साथ कांग्रेस पार्टी के जुड़ाव को काफी हद तक बदल दिया है। यह रणनीतिक बदलाव सीधे तौर पर 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की लंबी अवधि की तैयारी का आधार बनता है।

यूपी में दलितों के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव और हिंसा एक गंभीर और गहरी चुनौती बनी हुई है। मानवाधिकार संगठन और कानूनी संस्थाएं लगातार इस क्षेत्र में हाशिए पर मौजूद दलित समुदायों और दबदबा रखने वाले उच्च-जाति समूहों के बीच व्यवस्थागत टकराव को उजागर करती रही हैं। लोकसभा चुनावों के दौरान, संविधान और पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व पर फोकस ने हाशिए पर मौजूद वोटरों को काफी प्रभावित किया, जिससे कांग्रेस की सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उम्मीद है कि 2027 के विधानसभा चुनावों में, ये मुद्दे राहुल की राजनीतिक लाइन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इस बात की संभावना कम है कि हिंदुत्व या राष्ट्रवाद आम वोटरों, खासकर 'जेन जेड' को भाजपा का समर्थन करने के लिए प्रेरित कर पाएगा।

विपक्षी गठबंधन ने 2024 में BJP के गढ़ में बड़ी सेंध लगाई, जिसमें सपा ने 37 सीटें और कांग्रेस ने 9 सीटें जीतीं। चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि गठबंधन ने बड़ी संख्या में विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाई (सपा 184 और कांग्रेस 39 क्षेत्रों में आगे रही, यानी कुल 403 में से 223 क्षेत्रों में)। हालांकि अखिलेश के पीडीए एजेंडे ने उनके पारंपरिक यादव-मुस्लिम मतदाता आधार का सफलतापूर्वक विस्तार किया है, एक रणनीतिक कदम के तौर पर सपा-कांग्रेस का जोर इंडिया गठबंधन पर होगा। खास बात यह है कि अखिलेश और आराधना लगातार इंडिया गठबंधन की बात कर रहे हैं।

योगी के अपनी सरकार को साफ़-सुथरी और जन-हितैषी बताने के प्रयासों के बावजूद इंडिया गठबंधन सरकारी रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके उनके दावों की पोल खोलने के लिए तैयार है। गौरतलब है कि 30 सितंबर, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक आपराधिक जांच के दौरान गंभीर चूक और रिकॉर्ड रखने में खामियों के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस की कड़ी आलोचना की थी। शीर्ष अदालत ने बिना किसी ठोस वजह के संभल हिंसा के एक आरोपी को एक साल तक एहतियाती हिरासत में रखने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसलों ने पुलिस की मनमानी शक्तियों पर रोक लगाई है और जवाबदेही पर ज़ोर दिया है। (संवाद)