जलवायु परिवर्तन आज एक गंभीर वास्तविकता है, जो हमारे जीवन और आजीविका के लगभग हर पहलू को प्रभावित कर रही है। जैसे-जैसे जलवायु से संबंधित खतरे बढ़ रहे हैं, उससे निबटने के लिए भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है चाहे वह ग्रीन कवर बढ़ाना हो, अक्षय ऊर्जा का दोहन हो, उत्सर्जन में कमी लाना हो या मौसम की चुनौतियों से निपटना हो। हाल के वर्षों में भारत ने एआई असिस्टेड टूल्स की मदद से चक्रवात की भविष्यवाणी करने की अपनी क्षमता को काफी बेहतर बना लिया है। मौसम विभाग समुद्री तूफानों (चक्रवातों) पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट आधारित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स का इस्तेमाल करता है। तूफान कितना ताकतवर है, इसका अंदाज़ा लगाने में एडवांस्ड ड्वोरक तकनीक मदद करती है। इसके साथ ही, आईएमडी मौसम की भविष्यवाणी करने वाले यूरोपीय केंद्र (यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्टिंग) से मिलने वाले एआई बेस्ड गाइडेंस का भी उपयोग करता है। ये सभी आधुनिक तकनीकें यह बताने में मदद करती हैं कि चक्रवात कब बनेगा, किस दिशा में जाएगा और वह कितना शक्तिशाली होगा।
भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा विकसित ट्रांसफॉर्मर-आधारित न्यूरल नेटवर्क मानसून के व्यवहार की 18 दिन पहले ही भविष्यवाणी कर सकते हैं। दुनिया भर के एआई सिस्टम के तुलनात्मक अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि अब चक्रवात के जमीन से टकराने के 96 घंटे पहले ही उसके रास्ते का सटीक पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक कुछ ही सेकंड्स में 200 किलोमीटर के दायरे तक की सटीक जानकारी दे देती है। इन सुधारों की वजह से लोगों को सुरक्षित निकालने की योजना बनाने और बिजली-पानी जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर को बचाने में बहुत मदद मिल रही है।आईआईटी बॉम्बे ने स्पेशली अवेयर डोमेन एडाप्टेशन नेटवर्क नाम का एक एआई मॉडल विकसित किया है। यह मॉडल हवाई तस्वीरों के जरिए चक्रवात और तूफानों से हुए नुकसान का सटीक अंदाजा लगाता है। आईआईटी मद्रास भारत में जलवायु की सटीक भविष्यवाणी करने के लिए रिलायबिलिटी एनसेंबल एवरेजिंग (आरईए) तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है।
भारत में विकसित स्वदेशी एआई-आधारित भूस्खलन चेतावनी प्रणाली अब पहाड़ खिसकने से तीन घंटे पहले ही अलर्ट दे देती है। यह सिस्टम कम लागत वाले सेंसरों का उपयोग करता है जो मिट्टी की नमी, बारिश, नमी, तापमान और जमीन की हलचल को मापते हैं। यह सारा डेटा एक मशीन लर्निंग मॉडल को भेजा जाता है, जिसकी सटीकता 90 प्रतिशत से भी अधिक है। हिमाचल प्रदेश में 60 से अधिक स्थानों पर इसे लगाया गया है, जो जमीन में होने वाली मिलीमीटर जितनी छोटी हलचल को भी पहचान लेता है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामान से बना यह सिस्टम विदेशी तकनीक के मुकाबले बेहद सस्ता है और आपदा से निपटने में भारत की तैयारी को मजबूत करता है। इसकी मदद से भूस्खलन वाले इलाकों में समय रहते लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सकता है।
इसरो द्वारा वित्तपोषित (2021-24) इंडियन लैंड डेटा एसिमिलेशन सिस्टम (आईएलडीएएस), रिमोट सेंसिंग और विशेष कंप्यूटर मॉडल्स की मदद से जमीन की स्थिति और बाढ़ के संभावित इलाकों का सटीक अनुमान लगाता है। गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसे क्षेत्रों में नदियों के बेहतर प्रबंधन के लिए भौतिक विज्ञान और एआई तकनीकों को मिलाकर बाढ़ की भविष्यवाणी करने वाले सिस्टम बनाए गए है।ये सभी एआई आधारित सिस्टम मिलकर खतरे की चेतावनी काफी समय पहले (लीड टाइम) देने में मदद करते हैं, जिससे लोगों को सुरक्षित निकालने की योजना बनाना आसान हो जाता है। इनकी मदद से इमारतों और बिजली-पानी जैसे बुनियादी ढांचे के नुकसान को कम किया जा सकता है और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील इलाकों में रहने वाले समुदायों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
भारतीय मौसम विभाग ने पंचायती राज मंत्रालय के सहयोग से ग्राम पंचायत स्तर मौसम पूर्वानुमान (जीपीएलडब्ल्यूएफ) सेवा शुरू की है। यह सेवा भारत की लगभग सभी ग्राम पंचायतों को कवर करती है। इसमें एक साथ कई मौसम पूर्वानुमान मॉडलों का उपयोग किया जाता है। किसान इन भविष्यवाणियों को ई-ग्राम स्वराज, मेरी पंचायत और मौसम ग्राम जैसे ऐप्स के माध्यम से देख सकते हैं। इन सूचनाओं में तापमान, बारिश, नमी, हवा और बादलों की स्थिति की जानकारी शामिल होती है। इससे किसानों को बुवाई, कटाई और सिंचाई से जुड़े बेहतर फैसले लेने में मदद मिलती है।
एआई का उपयोग अब आग की घटनाओं, कोहरा, बिजली गिरने और गरज के साथ तूफान आने की भविष्यवाणी करने के लिए किया जा रहा है। डीप लर्निंग तकनीक मौसम में बारिश की सटीक भविष्यवाणियों को बेहतर बनाने में मदद करती है।
एआई उन्नत निगरानी और मॉनिटरिंग तकनीकों के माध्यम से भारतीय वनों की रक्षा करता है। यह वन क्षेत्रों के आसपास लगाए गए कैमरों से प्राप्त रियल-टाइम फुटेज का विश्लेषण करने के लिए मशीन विजन (एमवी) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करता है।एआई जंगल की आग और उसका कारण बनने वाली मानवीय गतिविधियों के लिए एक मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य करता है। यह आग को फैलने से पहले ही रोकने या नियंत्रित करने में मदद करता है, जो कि अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया भर में लगने वाली 75 प्रतिशत आग के लिए इंसान ही जिम्मेदार हैं।जंगल की सीमाओं पर लगाए गए एआई और मशीन विजन (एमवी) से लैस कैमरे उन जानवरों का पता लगा लेते हैं जो जंगल के बाहर भटक जाते हैं। यह मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने में मदद करता है, जो जंगल के इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा खतरा है।एआई निगरानी तकनीकें संरक्षित वन क्षेत्रों में अवैध अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई जैसी गतिविधियों का पता लगाती हैं।
आईआईटी कानपुर के रिसर्च फाउंडेशन और आईआईटी दिल्ली ने मिलकर सस्टेनेबल शहरों के लिए एआई तकनीक विकसित करने का एक समझौता किया है। यह साझेदारी शहरों की बड़ी समस्याओं जैसे वायु गुणवत्ता, बिजली, ट्रैफिक, कचरा प्रबंधन और डिजिटल सरकारी सेवाओं को सुधारने पर काम करेगी। इसमें खास तौर पर ऐसे स्मार्ट सेंसर बनाए जाएंगे जो हवा में प्रदूषण के साथ-साथ हानिकारक कीटाणुओं (बायोएरोसोल) की भी तुरंत पहचान कर सकें। इस तकनीक का उद्देश्य शहरों को स्मार्ट, स्वस्थ और सुरक्षित बनाना है, ताकि वे जलवायु परिवर्तन के खतरों का मजबूती से सामना कर सकें। आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने भारत के पेयजल में आर्सेनिक प्रदूषण का पता लगाने के लिए एक एआई-आधारित प्रेडिक्शन मॉडल विकसित किया है। यह तकनीक गंगा के किनारों पर रहने वाले उन लाखों लोगों की समस्या का समाधान करती है जो इस संकट से प्रभावित हैं।
भारत एआई-आधारित जलवायु समाधानों में एक वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में आगे बढ़ रहा है। भारत 2070 तक अपने नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। एआई-संचालित समाधान अक्षय ऊर्जा, पर्यावरण-अनुकूल खेती और आपदा पूर्वानुमान जैसे क्षेत्रों में मदद कर रहे हैं। ये केवल तकनीकी उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए अनिवार्य उपकरण हैं। भारत यह साबित कर रहा है कि जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में एआई एक शक्तिशाली हथियार हो सकता है, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के संवेदनशील समुदायों के लिए।
पर्यावरण संरक्षण व मौसम पूर्वानुमान में एआई की चमत्कारी भूमिका
एस एन वर्मा - 2026-10-15 14:53 UTC
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में एक शक्तिशाली टूल बनकर उभरा है। एआई कंप्यूटरों को डेटा से सीखने और मनुष्यों की तरह निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। एआई प्रणालियां जलवायु से संबंधित डेटा का विश्लेषण करती हैं और बेहतर जलवायु मॉडलिंग, अक्षय ऊर्जा उत्पादन, कृषि के समाधान और आपदा प्रबंधन के लिए प्रभावी ढंग से कार्य करती हैं। जमीनी स्तर पर, एआई-आधारित मौसम पूर्वानुमान अब लगभग सभी गांवों तक पहुंच चुका है। ग्राम पंचायत-स्तरीय कवरेज के साथ, भारत फोरकास्टिंग सिस्टम अब 6 किलोमीटर के हाई-रिज़ॉल्यूशन वाले सटीक पूर्वानुमान प्रदान करता है। एआई समुद्र के जलस्तर में वृद्धि की निगरानी और एडवांस्ड ड्वोरक तकनीक के माध्यम से चक्रवात के पूर्वानुमानों में सुधार करके जलवायु जोखिम प्रबंधन को सुदृढ़ कर रहा है।