वर्ष 2005 में शुरू हुई दिल्ली हाफ मैराथन विश्व एथलेटिक्स की गोल्ड लेबल रोड रेस है। इसमें दुनिया के श्रेष्ठ धावकों के साथ हजारों शौकिया धावक भी हिस्सा लेते हैं। इस वर्ष प्रत्यक्ष और वर्चुअल श्रेणियों में 41 हजार से अधिक प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं, जो नया रिकॉर्ड है। वर्ष 2025 में यह संख्या 39,513 थी।
दौड़ के प्रति बढ़ती रुचि अब महानगरों से आगे निकल चुकी है। देश के अधिकांश राज्यों की राजधानियों के साथ टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी 5 किलोमीटर, 10 किलोमीटर, हाफ मैराथन और पूर्ण मैराथन जैसी प्रतियोगिताएं होने लगी हैं। अलग-अलग आयु और पेशे के लोग इनमें हिस्सा ले रहे हैं। रनिंग क्लबों और सामूहिक अभ्यास ने इसे व्यक्तिगत फिटनेस के साथ सामुदायिक गतिविधि भी बना दिया है। बड़े आयोजनों में भाग लेने का लक्ष्य लोगों को नियमित अभ्यास और अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।
यह आकर्षण चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों तक भी पहुंच रहा है। लद्दाख की लेह मैराथन, 122 किलोमीटर की सिल्क रूट अल्ट्रा और उत्तराखंड की आदि कैलाश परिक्रमा रन इसके उदाहरण हैं। ऊंचाई, कठिन रास्तों और प्रतिकूल मौसम के बीच होने वाली ये प्रतियोगिताएं धावकों की सहनशक्ति और मानसिक दृढ़ता की परीक्षा लेती हैं। रनिंग अब शहरी सड़कों से निकलकर साहसिक खेलों का भी हिस्सा बन रही है।
दिल्ली हाफ मैराथन की एक बड़ी विशेषता इसके सामाजिक सरोकार हैं। इस वर्ष आयोजन से जुड़े 72 गैर-सरकारी संगठनों, 14 कॉरपोरेट संस्थाओं और व्यक्तिगत फंडरेजरों ने प्रतियोगिता से पहले ही 8.87 करोड़ रुपये से अधिक जुटाए हैं। यह पिछले वर्ष के 4.12 करोड़ रुपये से दोगुने से भी अधिक है। वर्ष 2005 से अब तक 97.5 करोड़ रुपये से अधिक जुटाए जा चुके हैं। इससे 500 से अधिक गैर-सरकारी संस्थाओं को स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, लैंगिक समानता, दिव्यांगजन सशक्तीकरण और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में सहयोग मिला है। इस तरह प्रतिभागी अपनी उपलब्धि के साथ किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए भी दौड़ रहे हैं।
वेदांता की 'रन फॉर जीरो हंगर' पहल आयोजन को पोषण और भूख की समस्या से जोड़ती है। धावकों द्वारा तय की गई दूरी के आधार पर पोषण सहायता उपलब्ध कराने की इस पहल के तहत इस वर्ष बच्चों और पशुओं के लिए 50 लाख पोषण पैक देने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है। आयोजकों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में इसके माध्यम से 2.2 करोड़ भोजन उपलब्ध कराने में सहयोग किया गया है।
आयोजन में वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग प्रतिभागियों के लिए भी विशेष श्रेणियां हैं। पिछले वर्ष लगभग एक-चौथाई प्रतिभागी महिलाएं थीं। पर्यावरण संरक्षण के लिए इस वर्ष शत-प्रतिशत कचरा प्रबंधन, प्लास्टिक पुनर्चक्रण और सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य रखा गया है।
हाफ मैराथन होने के बावजूद दिल्ली का यह आयोजन प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय रोड रेस प्रतियोगिताओं में अपनी जगह बना चुका है। किसी दौड़ की प्रतिष्ठा केवल उसकी दूरी नहीं, बल्कि प्रतिभागियों के स्तर, आयोजन की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय मान्यता से भी तय होती है। इस वर्ष इथियोपिया के बिरहानु लेगेसे, केन्या की आइरीन चेप्टाई और भारत की लिली दास जैसे प्रमुख धावक हिस्सा लेंगे। दो बार की ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता शॉने मिलर-यूइबो का अंतरराष्ट्रीय इवेंट एंबेसडर के रूप में जुड़ना भी इसकी प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
दो दशकों से अधिक के सफर में दिल्ली हाफ मैराथन ने प्रतिस्पर्धात्मक खेल को आम लोगों की फिटनेस और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा है। इसकी विरासत केवल रिकॉर्ड या प्रतिभागियों की बढ़ती संख्या में नहीं, बल्कि उन लोगों में भी है, जो ऐसे आयोजनों से प्रेरित होकर दौड़ना शुरू करते हैं या किसी सामाजिक उद्देश्य से जुड़ते हैं। इस मायने में इसकी दौड़ फिनिश लाइन पर समाप्त नहीं होती, बल्कि इससे आगे जाती है। (संवाद)
फिनिश लाइन से आगे : दिल्ली हाफ मैराथन के 21 साल
दिल्ली हाफ मैराथन: दौड़, फिटनेस और सामाजिक बदलाव
राजु कुमार - 2026-10-16 11:14 UTC
पिछले कुछ वर्षों में भारत में दौड़ने के प्रति लोगों का आकर्षण तेजी से बढ़ा है। सुबह सड़कों और पार्कों में दौड़ते लोगों से लेकर विभिन्न शहरों में होने वाली मैराथन प्रतियोगिताओं तक, इसकी झलक दिखाई देती है। दौड़ना अब केवल पेशेवर खिलाड़ियों तक सीमित नहीं, बल्कि आम लोगों की फिटनेस और जीवनशैली का हिस्सा बन रहा है। इस बदलाव में बड़े रनिंग आयोजनों की भी भूमिका रही है। इन्हीं में एक है दिल्ली हाफ मैराथन, जो अपने 21वें संस्करण तक आते-आते अंतरराष्ट्रीय दौड़ प्रतियोगिता से आगे बढ़कर स्वास्थ्य, पोषण, सामाजिक समावेशन, परोपकार और पर्यावरण संरक्षण जैसे सरोकारों से जुड़ चुकी है।