गृह मंत्री अमित शाह का यह जोर देकर कहना कि इस आंदोलन से 2029 में राहुल गांधी या कांग्रेस को कोई चुनावी फायदा नहीं होगा, काफी कुछ बयां करता है। अगले आम चुनाव में अभी लगभग तीन साल का समय है, फिर भी सरकार के सबसे ताकतवर राजनीतिक रणनीतिकार इन विरोध-प्रदर्शनों को इस नजरिए से देख रहे हैं कि इनका भाजपा की सत्ता पर पकड़ बनाए रखने की क्षमता पर क्या असर पड़ सकता है। हो सकता है कि ऐसे बयान पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आश्वस्त करने के लिए दिए गए हों, लेकिन इनसे यह भी पता चलता है कि पार्टी नेतृत्व इस चुनौती को कितनी गंभीरता से ले रहा है। अगर किसी आंदोलन का कोई बड़ा राजनीतिक परिणाम न होने वाला हो, तो सरकार के शीर्ष स्तर से उसे इतनी सख्ती से खारिज करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि 'कॉकरोच आंदोलन' उसके स्थापित राजनीतिक समीकरणों में कहीं फिट नहीं बैठता। सत्ताधारी पार्टी को कांग्रेस के नेतृत्व वाले अभियानों का सामना करने, विपक्ष के भीतर की फूट का फायदा उठाने और सरकार की आलोचना को महज एक पक्षपाती रुकावट के रूप में पेश करने में महारत हासिल है। लेकिन 'कॉकरोच जनता पार्टी' को अपनी ताकत मुख्य रूप से उन युवाओं से मिलती है, जो जरूरी नहीं कि किसी पारंपरिक राजनीतिक दल से जुड़े हों। व्यंग्य से शुरू होकर एक संगठित आंदोलन के रूप में इसके उभरने से लोगों का एक ऐसा जुड़ाव पैदा हुआ है, जिसे सिर्फ राहुल गांधी पर हमला करके या कांग्रेस पार्टी की चुनावी हारों का जिक्र करके बेअसर नहीं किया जा सकता।
यही फर्क सरकार की बेचैनी को समझने की कुंजी है। प्रदर्शनकारी केवल एक चुनाव अधिकारी के इस्तीफे की मांग नहीं कर रहे हैं। वे यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की रक्षा के लिए जिम्मेदार संस्थागत तंत्र पर जनता का भरोसा अभी भी कायम रह सकता है। मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) के खिलाफ उनके अभियान का महत्व अब ज्ञानेश कुमार के भविष्य से कहीं आगे निकल गया है। इसने भारत की चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को एक व्यापक होते राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में ला खड़ा किया है।
मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने को लेकर पैदा हुए विवाद ने इस आंदोलन को एक ऐसा मुद्दा दे दिया है, जो सामाजिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक सीमाओं को पार कर सकता है। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण एक वैध प्रशासनिक प्रक्रिया है; सटीक रिकॉर्ड बनाए रखने के लिए डुप्लिकेट नामों, मृत मतदाताओं और स्थायी रूप से कहीं और चले गए लोगों के नाम हटाना जरूरी होता है। चुनाव आयोग और भाजपा का कहना है कि यह प्रक्रिया कानून सम्मत है और वे पक्षपातपूर्ण हेरफेर के आरोपों को खारिज करते हैं। फिर भी, नाम हटाने का पैमाना और कमजोर समुदायों पर इसके असमान प्रभाव को लेकर आई शिकायतों ने ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका संतोषजनक जवाब केवल राजनीतिक निंदा से नहीं दिया जा सकता।
जिन नागरिकों के नाम मतदाता सूचियों से गायब हो जाते हैं, उनके लिए प्रशासनिक प्रक्रिया और राजनीतिक रूप से बाहर किए जाने के बीच का अंतर बहुत ही कष्टदायक और प्रत्यक्ष हो जाता है। वोट देने का अधिकार सरकार की ओर से दी गई कोई रियायत नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक नागरिकता की नींव है। यहां तक कि यह धारणा भी कि इस अधिकार को मनमाने ढंग से छीना जा सकता है, संस्थागत वैधता के लिए गंभीर परिणाम पैदा करती है। विपक्ष ने इस कमजोरी को एक मौके के रूप में इस्तेमाल किया है, लेकिन इसके पीछे की चिंता केवल विपक्ष के समर्थकों तक ही सीमित नहीं है।
प्रदर्शनों से निपटने के सरकार के तरीके ने समस्या को और बढ़ा दिया है। लोगों को बड़ी संख्या में हिरासत में लेना, प्रदर्शन स्थलों तक पहुंचने पर रोक लगाना, परिवहन व्यवस्था में बाधा डालना और भारी सुरक्षा इंतजाम करना—ये सब प्रशासनिक आत्मविश्वास के बजाय सरकारी घबराहट को दर्शाते हैं। दिल्ली में शुक्रवार को होने वाले प्रदर्शन से पहले 'कॉकरोच आन्दोलन' के संस्थापक अभिजीत दिपके को हिरासत में लिया गया। इसके बाद कनॉट प्लेस के आसपास विरोध प्रदर्शन हुए और अन्य जगहों पर भी समर्थन में आवाजें उठीं। इससे यह साफ हो गया कि केवल पुलिस के दम पर एक विकेंद्रीकृत आंदोलन को दबाने की कोशिश की अपनी सीमाएं हैं।
यह पूरी स्थिति प्रतीकात्मक रूप से भी काफी नुकसानदेह है। जंतर-मंतर लंबे समय से राष्ट्रीय राजधानी में लोकतांत्रिक असहमति जताने की एक स्वीकृत जगह रही है। ऐसी जगहों तक पहुंच को सीमित करना, जबकि साथ ही यह दावा करना कि लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं पूरी तरह सुरक्षित हैं, कई सवाल खड़े करता है।
यह एक स्पष्ट विरोधाभास है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ खड़ी की गई हर रुकावट, उन लोगों के लिए एक और तर्क बन सकती है जो यह आरोप लगाते हैं कि सरकार जनता की निगरानी से असहज है।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि भाजपा नेताओं और समर्थकों के बीच इस आंदोलन को 'सत्ता परिवर्तन', 'अराजकता' और 'चुनी हुई सरकार को गिराने की कोशिश' जैसी शब्दावली से जोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल आमतौर पर विदेशों में हुए विद्रोहों (जैसे 'अरब स्प्रिंग' या 'जैस्मीन क्रांति') के संदर्भ में किया जाता रहा है, जहां सत्ता में बैठे लोगों ने जन-आंदोलनों को अपनी राजनीतिक स्थिरता के लिए एक अस्तित्वगत खतरे के रूप में पेश किया था। भारत की घरेलू राजनीतिक बहस में इस तरह की भाषा का आना यह दर्शाता है कि सत्ताधारी पक्ष इन विरोध-प्रदर्शनों को अपने अस्तित्व को बचाने के नजरिए से देख रहा है।
जाहिर है, चुनाव आयुक्त से जवाबदेही मांगने और सरकार को गिराने की कोशिश करने के बीच बहुत बड़ा अंतर है। भाजपा को पूरा अधिकार है कि वह विपक्षी दलों के इरादों पर सवाल उठाए और बिना किसी ठोस आधार वाले आरोपों के खिलाफ संवैधानिक संस्थाओं का बचाव करे। लेकिन, हर लंबे समय तक चलने वाले विरोध-प्रदर्शन को 'सत्ता परिवर्तन की छिपी हुई कोशिश' मान लेना, लोकतांत्रिक असहमति और असंवैधानिक तरीके से सत्ता पलटने की कोशिश के बीच के फर्क को धुंधला कर सकता है। साथ ही, इससे अनजाने में प्रदर्शनकारियों का महत्व भी बढ़ जाता है, क्योंकि उन्हें एक ऐसी ताकत के रूप में पेश किया जाता है जो प्रशासन के लिए खतरा बन सकती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई दिल्ली के लिए एक नई उलझन पैदा हो गई है। मतदाता सूची से जुड़े विवाद और प्रदर्शनकारियों के साथ किए जा रहे बर्ताव पर विदेशों में भी नजर रखी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अब भाजपा और कांग्रेस के बीच के आम विवादों से आगे बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार तंत्र द्वारा बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लिए जाने की आलोचना ने इस स्थिति को केवल एक 'घरेलू राजनीतिक झगड़ा' बताने की गुंजाइश कम कर दी है, जिसके व्यापक लोकतांत्रिक निहितार्थ हो सकते हैं।
भारत ने हमेशा अपने आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को खारिज किया है, और सरकार का यह तर्क सही हो सकता है कि विदेशी पर्यवेक्षकों को भारत की चुनावी प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी नहीं है। फिर भी, मतदान के अधिकार और शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने की आजादी को लेकर जताई गई अंतरराष्ट्रीय चिंता को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि यह देश के बाहर से आई है। जिस सरकार ने भारत को दुनिया की सबसे सफल लोकतांत्रिक कहानी के रूप में पेश करने के लिए बहुत प्रयास किए हैं, उसके लिए चुनावी संस्थाओं की स्वतंत्रता पर उठने वाले सवाल एक ऐसी साख संबंधी समस्या पैदा करते हैं, जिसे केवल कूटनीतिक बयानों से हल नहीं किया जा सकता।
भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा शायद ज्ञानेश कुमार का तुरंत इस्तीफा देना नहीं है। असली खतरा इस बात में है कि यह आंदोलन संस्थाओं के प्रति अविश्वास को, युवाओं के बीच रोजगार, अवसरों और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर मौजूद व्यापक असंतोष से जोड़ सकता है। 'कॉकरोच आंदोलन' पहले ही यह दिखा चुका है कि वह गुस्से को एक निरंतर चलने वाले सामूहिक कार्य में बदलने की क्षमता रखता है। परीक्षा में हुई गड़बड़ियों को लेकर चले पिछले अभियान से पता चला कि एक छोटी सी समस्या भी आगे चलकर मंत्री के अधिकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने इस मौके को पहचान लिया है। उनके शामिल होने से इस अभियान को संसद में जगह मिली है और इसे राजनीतिक वजन भी मिला है। लेकिन स्थापित राजनीतिक दलों के साथ बहुत ज्यादा जुड़ जाने से इस आंदोलन की अपनी अलग पहचान और अपील कमजोर हो सकती है। भाजपा निश्चित रूप से कांग्रेस के साथ सीधे टकराव को ज्यादा पसंद करेगी, बजाय इसके कि उसे छात्रों, नागरिक समाज के संगठनों और किसी भी राजनीतिक दल से न जुड़े आम नागरिकों के एक बड़े समूह का सामना करना पड़े।
इस आंदोलन ने एक ऐसी उलझन पैदा कर दी है जिसे सिर्फ धौंस दिखाकर हल नहीं किया जा सकता। अगर सरकार कोई रियायत देती है, तो इसे प्रदर्शनकारियों की जीत माना जा सकता है; वहीं, अगर टकराव जारी रहता है, तो इस आंदोलन का दायरा और बढ़ सकता है। किसी भी राजनीतिक कीमत पर ज्ञानेश कुमार को बचाए रखने से यह धारणा और मजबूत हो सकती है कि सरकार ने अपनी साख को एक ऐसी संस्था से जोड़ लिया है, जिसकी निष्पक्षता पर ही सवाल उठ रहे हैं। भाजपा इन प्रदर्शनकारियों को जितना ज्यादा 'कॉकरोच' कहकर मामूली बताने की कोशिश करेगी, उसके लिए यह समझाना उतना ही मुश्किल होता जाएगा कि आखिर इन लोगों के एकजुट होने पर सत्ताधारी खेमे की ओर से इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों आई है। (संवाद)
मताधिकार से वंचित करने के खिलाफ उठ रहे विरोध से डरी हुई भाजपा
सीईसी के खिलाफ आंदोलन ने किया पार्टी की गहरी राजनीतिक बेचैनी को उजागर
के. रवींद्रन - 2026-10-19 10:22 UTC
मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हो रहे आंदोलन पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का लगातार आक्रामक होता रुख एक ऐसी राजनीतिक बेचैनी को दर्शाता है, जिसे छिपाने में पार्टी के नेता संघर्ष कर रहे हैं। आत्मविश्वास के दिखावे, विपक्ष की साजिशों के आरोपों और सरकार को अस्थिर करने की कोशिशों की चेतावनियों के पीछे एक असहज सच्चाई छिपी है: एक ऐसा आंदोलन, जो स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के बाहर शुरू हुआ, वह चुनावी वैधता के बुनियादी सवाल पर सत्ताधारी पार्टी को चुनौती दे रहा है। जंतर-मंतर पर लोगों का भारी जमावड़ा और पुलिस की पाबंदियों के बावजूद 'कॉकरोच जनता पार्टी' का अपने अभियान को जारी रखने का दृढ़ संकल्प—इन सबने मिलकर उस विरोध-प्रदर्शन को, जिसे भाजपा शुरू में आसानी से संभाले जा सकने वाला मामला मान रही थी, एक गंभीर राजनीतिक टकराव में बदल दिया है।