हाल के वर्षों में भारत ने उद्योगीकरण पर जो ज़ोर दिया है, उसके पीछे मुख्य मकसद अपने विशाल श्रम बल को कारखानों और उनसे जुड़ी सेवाओं में रोज़गार दिलाना था। लेकिन इस मोर्चे पर कोई खास सफलता नहीं मिली है। इसकी बुनियादी वजह यह है कि पिछले कुछ दशकों से - यहां तक कि कोविड से पहले से ही - दुनिया 'बिना इंसानों के उत्पादन' अर्थात् स्वचालित मशीनी उत्पादन की ओर बढ़ रही है। बड़ी संख्या में सस्ते श्रम बल की उपलब्धता को अब कोई विशेष लाभ नहीं माना जाता।

पिछले दो दशकों में भारत सहित पूरी दुनिया में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ा है और संपत्ति भी पैदा हुई है, लेकिन अफ़सोस कि इसका लाभ बड़े पैमाने पर लोगों तक नहीं पहुंचा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यापार और वाणिज्य में मूल्य सृजन के लिए अब इंसानों की ज़रूरत नहीं रह गई है। आप इसे राजनीतिक रूप से "बिना नौकरियों वाला विकास" कहकर आलोचना कर सकते हैं, लेकिन असल में यह मानवीय श्रम पर तकनीक का इतना हावी हो जाना है, जिसने यह खालीपन पैदा कर दिया है। सरकार के पास अब कल्याणकारी योजनाओं के ज़रिए इतनी बड़ी आबादी का पेट भरने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है। वरना, एक बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो सकता था।

अब तक, भारत के लिए यह एक सुनहरा दौर था, जब जीडीपी को बेहतर बनाने के लिए तकनीक के साथ-साथ बड़ी संख्या में श्रम शक्ति (लेबर फोर्स) की जरूरत थी - चाहे वह सॉफ्टवेयर, वित्तीय सेवाएं हों या औद्योगिक उत्पादन। अब नई तकनीक खुद को इस तरह विकसित कर रही है कि वह आर्थिक गतिविधियों में इंसानी भूमिका (जो एक अहम हिस्सा थी) की जगह ले सके, जिससे संतुलन बिगड़ गया है। ऐसे में, ऐसा लगता है कि इंसानी श्रम की - चाहे वह उच्च-मूल्य वाला हो या निम्न-मूल्य वाला - अब कोई खास मांग नहीं रह गई है। इंजीनियरिंग कॉलेजों या यहां तक कि आईआईटी में दाखिला लेने से भी अच्छी नौकरी की गारंटी नहीं मिलती। दूसरी ओर, मध्यम योग्यता वाले युवाओं के लिए पॉलिटेक्निक कोर्स या आईटीआई जैसे विकल्प भी अब कोई खास उम्मीद नहीं जगाते। चारों तरफ निराशा का माहौल है।

हम यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि चीन ने अपनी बढ़ती आबादी के बीच नौकरियों के सृजन और नीतियों को कैसे संभाला। चीन का सफर अलग था, और कई सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कारणों से भारत उस कहानी को दोहरा नहीं सकता। आंकड़ों के अनुसार, 1975 में चीन की आबादी लगभग 92 करोड़ थी, जबकि भारत की आबादी लगभग 62 करोड़ थी। 2025 तक भारत की आबादी 141 करोड़ से अधिक हो गई है और लगातार बढ़ रही है, जबकि चीन की आबादी 140 करोड़ से कम है और उसमें गिरावट आ रही है। असल बात यह है कि चीन ने पिछले 50 वर्षों में अपने मानव संसाधनों का उपयोग करके और कृषि से लेकर उद्योग तक सही आर्थिक नीतियां लागू करके भारी संपत्ति का निर्माण किया। उनकी सबसे बड़ी सफलता कृषि क्षेत्र के मजदूरों को कम उत्पादकता वाले कामों से निकालकर, अधिक मूल्य पैदा करने वाले औद्योगिक कार्यों में लगाना रहा। लेकिन ऐसा किसी एक नीतिगत फैसले से नहीं हुआ। बल्कि यह चीन द्वारा लिए गए कई रणनीतिक नीतिगत फैसलों का नतीजा था।

चीन ने 1978 में कृषि उदारीकरण के साथ अपने बड़े नीतिगत बदलाव की शुरुआत की। इसके बाद, देश ने एक क्रम में ग्रामीण उद्योगों का विकास किया, फिर निर्यात-आधारित विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) की ओर कदम बढ़ाया, निर्यात क्षेत्र (एक्सपोर्ट ज़ोन) बनाए, और अंत में विदेशी निवेश को आकर्षित किया। वह दौर अलग था। कृषि क्षेत्र से मुक्त होने वाली श्रम शक्ति को उसी गति से अधिक उत्पादकता वाले, निर्यात-आधारित औद्योगिक कार्यों में खपा लिया गया। भारी पूंजी वाले उद्योगों के बजाय, चीन ने शुरुआत में उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जहां उसकी विशाल श्रम शक्ति एक बड़ा फायदा साबित हो सकती थी। एफडीआई और निर्यात अपने साथ तकनीक, प्रबंधन और चीन के अपने उपभोक्ताओं से कहीं बड़ा बाज़ार लेकर आए। सस्ते लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा और सप्लायर नेटवर्क ने लागत को कम कर दिया, जिससे कारखाने की हर एक नौकरी के साथ-साथ उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी कई और नौकरियां पैदा हुईं। अनुकूल आयु संरचना की बदौलत उच्च निवेश और बचत संभव हो पाई, जिसने इस विस्तार के लिए ज़रूरी फंड मुहैया कराया। 'हुकोउ' प्रणाली ने शहरों और नियोक्ताओं के लिए प्रवासियों से जुड़े सामाजिक खर्चों को कम रखा, जिससे इनपुट लागत और भी कम हो गई (हालांकि, प्रवासियों को इसके लिए एक मानवीय कीमत चुकानी पड़ी)।

अगर आप इसकी तुलना भारत के सफर से करें, तो आप पाएंगे कि उसी दौर में भारत को आकार देने वाले नीतिगत फैसलों में बहुत बड़ा अंतर था। भारत ने कभी भी भूमि सुधारों और उच्च उत्पादकता वाले कृषि उदारीकरण को पूरी तरह से नहीं अपनाया, और आज भी स्थिति वैसी ही है। भारत में बड़ा नीतिगत बदलाव 1991 में उदारीकरण के साथ ही आया। इस नीति ने औद्योगिक लाइसेंसिंग को खत्म कर दिया और वैश्विक बाजार के लिए व्यापार के दरवाजे खोल दिए। लेकिन जमीन, श्रम और बिजली के क्षेत्रों में सुधार करना मुश्किल बना रहा। इसी सख्ती के कारण, चीन के विपरीत, भारत की औद्योगिक कहानी उस बड़े पैमाने पर आगे नहीं बढ़ पाई।

हालांकि, वैश्विक बाजार तक पहुंच मिलने से देश की अर्थव्यवस्था सेवा क्षेत्र की ओर झुक गई। इससे आईटी, बिजनेस-प्रोसेस आउटसोर्सिंग, टेलीकॉम, फाइनैंस और हाल के दिनों में 'ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स' का विकास हुआ। लेकिन इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर, अत्यधिक उत्पादक विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्रों की तुलना में काफी कम हैं। नीतिगत सख्ती के कारण, भारत का औद्योगिक विकास मुख्य रूप से फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों तक ही सीमित रहा, जिनमें बहुत अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है। लेकिन यह उन उद्योगों को बढ़ावा देने में विफल रहा, जैसे कि बड़े पैमाने पर कपड़ों, खिलौनों और इलेक्ट्रॉनिक असेंबली का निर्माण, जो अकुशल श्रमिकों को रोजगार दे सकते थे।

आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे एक ऐसी विकास रणनीति की जरूरत है, जो उसकी 140 करोड़ से अधिक की आबादी को उत्पादक रोजगार दे सके। इसे इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती कहा जा सकता है। इस चुनौती की जड़ यह है कि आज भी 45-46% आबादी कृषि कार्यों में लगी हुई है। यह क्षेत्र भारत की जीडीपी में 16-18% का योगदान देता है, जो कि वैश्विक जीडीपी के हिसाब से केवल 0.5-0.6% है। अब समय आ गया है कि कृषि में प्रति व्यक्ति उत्पादकता बढ़ाने के लिए हाई-टेक कृषि उत्पादन और खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोसेसिंग) को मजबूती दी जाए। एआई, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन के इस दौर में, देश को अपने श्रम संसाधनों को बचाने के लिए कपड़ों, जूतों और इलेक्ट्रॉनिक असेंबली जैसे श्रम-प्रधान विनिर्माण क्षेत्रों में कदम रखना चाहिए। निजी कंपनियां अपने प्रोमोटरों के लिए तो काफी संपत्ति बना सकती हैं, लेकिन वे बड़े पैमाने पर श्रम शक्ति को रोजगार देने में सक्षम नहीं होंगी।

आने वाले 20 वर्षों में मानवीय संकट से बचने के लिए, सरकार को अपने जन-कल्याण मॉडल पर फिर से विचार करना होगा और श्रम-प्रधान विनिर्माण क्षेत्रों में निवेश करना होगा। भारत की स्थिति अलग है, इसलिए इसका समाधान भी चीन से अलग होगा। पिछले 50 वर्षों में, चीन में लोगों की संख्या की तुलना में रोजगार के अवसर तेजी से बढ़े हैं, जबकि भारत में अच्छी नौकरियों की तुलना में लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अब से, यह केवल रोजगार सृजन की योजना नहीं होगी, बल्कि एक ऐसा स्वदेशी विकास मॉडल होगा जो भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देगा और यहां के लोगों के लिए रोजगार व भोजन उपलब्ध कराएगा। (संवाद)