Loading...
 
Skip to main content
(Cached)

अस्तित्ववाद

अस्तित्ववाद एक यूरोपीय दर्शन है। इस विचारधारा के तहत कहा गया कि मानव जीवन मूलतः निरर्थक है। यह तर्क को अक्षम समझकर त्याग देती है तथा परम्परागत ईश्वर में आस्था को अस्वीकार करती है। मानव जीवन को धर्मनिरपेक्ष आधार पर देखते हुए इसकी चिंता करना अस्तित्ववाद का मूल कार्य है और इसी आधार पर जीवन को मानवीय अर्थ और मूल्य प्रदान करने का प्रयत्न करता है।


दर्शन के रूप में इसका प्रारम्भ जर्मन दार्शनिक हसरेल तथा हेडेगर एवं डेनिश दार्शनिक कीर्कगार्ड (1813-55) की रचनाओं से माना जाता है। परन्तु साहित्य में अस्तित्वाद का समग्र रूप ज्यां पॉल सार्त्र की रचनाओं से फ्रांस में सामने आया। यह 1905 से 1943 के बीच की रचनाओं में मुख्य रूप से देखा जाता है।

अस्तित्वाद में मानव जीवन का प्रत्येक क्षण अतुलनीय महत्व का है। अतियथार्थ इसे स्वीकार्य नहीं है। अपनी सभी अवशता में भी मानव के लिए यह मानवीय स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक है।

अस्तित्व अपने मौलिक तत्व से पहले आता है, यही अस्तित्ववाद का सूत्र है। अर्थात् मनुष्य की मौलिक प्रकृति से पूर्व ही उसका कर्मसमूह आता है। इसलिए यह मनुष्य का आकलन उसके जीवन के सन्दर्भ में करने पर यह बल देता है। इस सिद्धान्त का प्रारम्भ होता है मनुष्य की अवश तथा निरूपाय अवस्था से। इसलिए यह कहता है कि अपने अल्प जीवन काल में ही मनुष्य को अपने जीवन को अर्थ देना है क्योंकि जन्म के साथ ही वह अनिवार्य मृत्यु की चुनौति का सामना करता है परन्तु कुछ कर नहीं सकता।

अस्तित्ववादी चिंतकों के दो वर्ग हैं। एक तो मानव जीवन को ईश्वर से जोड़कर उसे वास्तविक मूल्य देता है और दूसरा पूर्णतः निरीश्वरवादी मानवतावादी है। सार्त्र दूसरे वर्ग के चिंतक हैं। कीर्कगार्ड, यास्पर्स तथा ऐलेन पहले तरह के जिन्हें ईसाई अस्तित्ववादी भी कहा जाता है।

आसपास के पृष्ठ
अस्फुट व्यंग्य, अहंता, अहंता-इदन्ता, अहम्, अहिंसा, अहीर

Page last modified on Monday June 26, 2023 06:34:10 GMT-0000