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एकेश्वरवाद

एकेश्वरवाद वह मत है जिसमें कहा गया कि ईश्वर एक है। उसी एक ईश्वर से सृष्टि, स्थिति और लय है, वही नित्यज्ञान और आनन्द का आश्रय है। वह सर्वशक्तिमान, अन्तर्यामी तथा सर्वत्र विद्यमान है।

एकेश्वरवाद चार प्रकार के हैं।

1. सर्वेश्वरवाद – इस संसार में जो कुछ भी है वह ब्रह्म या ईश्वर ही है। ईश्वर ही जगत् है और सम्पूर्ण जगत ही ईश्वर है। श्रीमद्भगवद्गीता में इसे ही 'येन सर्वमिदं ततम्' कहा गया। यह निर्गुण या निराकार ब्रह्म है।
2. ईश्वरकारणवाद – इसमें ईश्वर का अस्तित्व जगत् से बाहर बताया गया। इसके अनुसार जगत् की सृष्टि करने के बाद ईश्वर इससे पृथक हो जाता है तथा उसके बाद यह जगत् अपने आप अपनी प्रकृति आदि गुणों से चलता है। ईश्वर इस सृष्टि का निमित्त कारण है उपादान कारण नहीं।
3. ईश्वरवाद – इस मत में ईश्वर सम्पूर्ण जगत में व्याप्त, अन्तर्यामी, बहिर्यामी और इसका नियन्ता है। यह निर्गुण और सगुण, निराकार और साकार, दोनों प्रकार का है। इसे ही पुरुषोत्तम माना गया है।
4. योगेश्वरवाद - इस मत में ईश्वर या पुरुष कर्म, कर्मफल तथा आशय (कर्मजनित संस्कार के संपर्क) से शून्य रहता है। ऐश्वर्य और ज्ञान की पराकाष्ठा से वह परिपूर्ण है। वह गुरुओं का भी गुरु है तथा योगियों को समाधि की सिद्धि देता है। यह योगेश्वर 'योगक्षेम वहाम्यहम्' के भावना के तहत तारक ज्ञान का दाता तथा विघ्नों को दूर करते हुए योगी को समाधि अवस्था में पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करता है। श्रीमद्भगवद्गीता में योगेश्वरवाद का व्यापक वर्णन है।

इन सभी वादों में एक ही ईश्वर होने के अनेक प्रकार से प्रमाण दिये गये हैं। इनमें से प्रमुख ये हैं -

सम्पूर्ण जगत उत्पन्न वस्तु है इसलिए उत्पत्ति का कोई निमित्त कारण होना ही चाहिए। इसे कार्य के कारण का अनुमान कहा जाता है। यही निमित्त कारण ईश्वर है।

प्रकृति के जड़ पदार्थों में एक आयोजन है, और इस आयोजन का कोई कारक होना ही चाहिए। जड़ पदार्थ आयोजन की प्रदात्री नहीं हो सकती। आयोजनपूर्ण वस्तुओं में संघटन की पराकाष्ठा से प्रतीत होता है कि कोई महामहिम चेतन प्राणी या ईश्वर ही ऐसे आयोजन का रचयिता है और यही ईश्वर है।

संसार में कर्मों का फल देखा जाता है। यदि यह विधान है तो इसका विधाता होना ही चाहिए। वही ईश्वर है।

कोई चेतन प्राणी जगत के मूल में है और वही ईश्वर है, निष्पक्ष अनुशीलन से ऐसा ही अनुमान होता है।

पतंजलि ने ज्ञान की पराकाष्ठा है ऐसा माना और इसी पराकाष्ठा को ईश्वर कहा।

एकेश्वरवाद का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में मिलता है जिसमें विष्णु, वरुण, इन्द्र आदि देवताओं ने एक परमेश्वर माना। इसमें जो पुरुषसूक्त है वह शुद्ध ईश्वरवाद है।

वैदिक काल के ऋषियों का धर्म था कि वह एक देव को जानें, उसकी उपासना परमात्मा के रूप में करें और उसके लिए यज्ञादि करें। ज्ञानकांड, कर्मकांड तथा उपासनाकांड के रूप में उनकी की त्रिविध उपासना की बाद वेदों में कही गयी है।

ईश्वरवाद का दार्शनिक वर्णन श्वेताश्वतरोपनिषद् में मिलता है।

पुराणकाल में ईश्वरवाद में अवतारवाद तथा मूर्तिपूजा का प्रवेश हुआ।

संतों ने इसी एक ईश्वर को अनेक रूपों में वर्णन किया है।


Page last modified on Sunday August 3, 2014 16:15:50 GMT-0000