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कुल

किसी भी व्यक्ति के वंश को उस व्यक्ति का कुल कहा जाता है। प्रत्येक कुल की एक परम्परा होती है जिसे सामान्यतः कुल परंपरा कहा जाता है, परन्तु बोलचाल में कई बार कुल परम्परा को भी संक्षिप्त में कुल कहा जाता है।

उदाहरण के लिए, जब कोई कहता है कि हमारे कुल में ऐसा होता है, तो यहां कुल का अर्थ कुल परंपरा ही है।

यह तो जन्मवंश के आधार पर हुआ। परन्तु कौल मार्ग में विद्यावंश भी एक मान्य परम्परा है। परमशिव से लेकर परमगुरु तक एक ही ज्ञान परम्परा चली आ रही है। उनके अनुसार यही विद्याक्रम कुल है, और इसी कुल के अनुवर्ती होने के कारण वे स्वयं को कौल कहते हैं।

कुल परम्परा में गोत्र या सगोत्र का भी नाम लिया जाता है। यह जन्मवंश भी होता है, प्रायः ब्राह्मणों में, और यह विद्यावंश भी होता है जैसे कुलगुरु के के गोत्र के रूप में।

वैसे अध्यात्म में, विशेषकर कौल मार्ग में कुल शक्ति को कहते हैं। ऐसा इसलिए कि शक्ति सृष्टि की हेतु है, वही समस्त जगत प्रपंच का प्रवर्तन करती है। इसी शक्ति से सभी पदार्थ उत्पन्न हुए हैं, और यही शक्ति शिव की प्रिया हैं।

दार्शनिक अर्थ में इस जगत के सभी पदार्थों को एक कुल कहा जाता है। चूंकि यह संसार त्रिविध - ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेय - रूप में त्रिपुटीकृत है, इसलिए ज्ञान रूप धर्म सभी का एक ही हुआ। ऐसा होने के कारण सभी सजातीय और एक ही कुल के हुए।

कुल का एक रहस्यपरक अर्थ जाति भी है। इसके तहत कहा जाता है कि एक ही जाति की वस्तुओं में भिन्न जातीयता का आभास केवल मायाजन्य है। कौल मार्ग में इसी कारण उपास्य (शिव या शक्ति) तथा उपासक दोनों को सजातीय या एक ही कुल का माना जाता है। इसके लिए तर्क दिया जाता है कि उपास्य भी चेतन है और उपासक भी चेतन है इसलिए दोनों सजातीय तथा एक ही कुल के हुए।

योग में मूलाधार चक्र को कुल कहा जाता है। क्योंकि कु का अर्थ होता है पृथ्वी तथा ल का अर्थ होता है लीन। यह पृथ्वी तत्व मूलाधार चक्र में लीन है इसलिए इसे भी कुल कहा गया। इसी मूलाधार से सुषुम्ना नाड़ी जुड़ी हुई है जिससे होकर कुण्डलिनी शक्ति ऊपर उठकर सहस्रार में जाकर मिलती है। इसलिए सुषुम्ना को भी कुल कहते हैं। शक्तिरूपा कुण्डलिनी के संदर्भ में माना जाता है कि शक्ति ही सृष्टि है तथा सृष्टि ही कुण्डली। इसलिए कुण्डली भी कुल या कुलकुण्डली कहलाती है।

बौद्ध तांत्रिकों में कुल सेवा से ही सभी कामनाओं को तुष्ट करनेवाली शुभ सिद्धि के प्राप्त होने की बात कही गयी है। सन् 777 में इस मत के एक आचार्य डोम्बी हेरुक ने कहा था - कुल सेवातो भवेत् सिद्धिः सर्व कामप्रदा शुभा। उन्होंने कहा कि पांच ध्यानी बुद्धों से पांच कुलों की उत्पत्ति हुई है - अक्षोभ्य से वज्रकुल, अमिताभ से पद्मकुल, रत्नसम्भव से भावरत्नकुल, वैरोचन से चक्रकुल तथा अमोधसिद्धि से कर्म कुल।


Page last modified on Sunday August 24, 2014 16:43:52 GMT-0000