गुरु
गुरु का सामान्य अर्थ है ज्ञान देने वाला व्यक्ति। परन्तु धर्म और अध्यात्म में गुरु एक विशेष अर्थ में प्रयुक्त होता है। वह अर्थ है दीक्षा देने वाला व्यक्ति। मध्यकालीन धर्मसाधना में तो गुरु का अत्यन्त महत्व था और कहा गया कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं होता। परन्तु प्राचीन काल से ही भारत में गुरु का महत्व रहा है। जब धर्म के विभिन्न सप्रदायों जैसे वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन आदि में गुह्य साधनाओं का समावेश हुआ तब गुरु का महत्व पूर्व के अनुपात में बढ़ गया क्योंकि ऐसी गुप्त साधनाओं की दुरुह प्रक्रियाओं का ज्ञान गुरु के बिना सम्भव ही नहीं था। तान्त्रिक साधना का ज्ञान प्राप्त करने वालों के लिए तो गुरु ही एक मात्र ज्ञान स्रोत बन गये। यही कारण है कि गुरु को भारत में बहुत ऊंचा दर्जा प्राप्त है।सिद्धों, नाथों और संतों की परम्परा में तो गुरु का महत्व है ही, बौद्धों की परम्परा में भी गुरु का महत्व कम नहीं, यह अलग बात है कि स्वयं भगवान बुद्ध के कोई गुरु नहीं थे तथा उन्होंने स्वयं अपनी साधना से ज्ञान प्राप्त किया था। बौद्धों के गुह्य समाजतन्त्र में प्रत्येक तथागत का गुरु एक वज्राचार्य बताया गया है।
सिक्खों में पहले गुरु होते थे परन्तु दसवें गुरु के बाद अब उनका गुरु गुरुग्रंथ साहब ही है।
सनातान धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को जगद्गुरु माना गया है। परन्तु साक्षात् जीवित गुरु का महत्व भी बना हुआ है।
कहा जाता है कि निगुरे को अर्थात् गुरुहीन व्यक्ति को ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकती तथा उसे मुक्ति भी नहीं मिल सकती। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि समस्त लोक तथा पंडितों के लिए भी जो दुर्लभ है उसे गुरु सुलभ करा देते हैं, परन्तु साथ में यह भी कहा जाता है कि अज्ञानी गुरु स्वयं का एवं अपने शिष्य का नाश कर देते हैं।
लेकिन नाथ पंथियों में गुरु मत्स्येन्द्रनाथ एवं उनके शिष्य का उदाहरण देकर कहा जाता है कि यदि शिष्य अच्छा निकल गया तो वह गोरखनाथ की तरह अपने गुरु को भी उपदेश देकर मुक्ति दिला देते हैं।
संत तुलसीदास करते हैं - गुरू बिन भवनिधि तरहिं न कोई। जो बिरंचि संकर सम होई।।
गुरु नहीं होने की पीड़ा की अभिव्यक्ति को मार्मिक ढंग से इस पद में व्यक्त किया गया है - बिना गुरु ज्ञान कहां से पाऊं...। सूरदास ने इसी लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाकर उन्हीं से ज्ञान प्राप्त करने की बात कही।