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घनाक्षरी

घनाक्षरी, जिसे कवित्त तथा मनहरण भी कहा जाता है, एक लोकप्रिय छन्द है। हिन्दी ब्रजभाषा का यह अपना छन्द मुक्तक दण्डक का एक भेद है। इसमें 31 अक्षर होते हैं जिसमें 16 तथा 15 अक्षरों पर यति होती है। इसके समस्त चरणों में 8, 8, 8, और सात की यति का प्रयोग भी मिलता है। जब कभी शब्द के बीच में यति पड़ती है तब साता या नौ वर्णों पर यति प्रतीत होती है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें गण, मात्रा आदि का कोई बन्धन नहीं होता, केवल अक्षरों पर ही विशेष ध्यान दिया जाता है।

सामान्यत: इसका प्रारम्भ 14वीं शताब्दी में मार्दगिकसेन नामक कवि से माना जाता है, परन्तु इसमें विवाद है, क्योंकि सूरदास के पूर्व किसी की रचना इस छन्द में उपलब्ध नहीं है। ध्रुपद में यह छन्द ठीक बैठता है। यह छन्द सूरदास के सूरसागर तथा तुलसीदास की विनयपत्रिका में मिलता है। यह रीतिकाल का प्रिय और प्रचलित छन्द है।

आधुनिक हिन्दी (ब्रजभाषा) में इस छन्द का प्रयोग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र तथा रत्नाकर, एवं खड़ी बोली में हरिऔध नें रसकलश में, मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत में, तथा दिनकर ने कुरुक्षेत्र में किया है।

अनेक लोगों के मत में यह भारत का रष्ट्रीय छन्द है।

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Page last modified on Monday June 26, 2023 16:04:05 GMT-0000