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जिकड़ी

जिकड़ी एक लोकगीत है जिसे ब्रज में होली के अवसर पर और चैत्र माह में गांव की मंडलियां गाती हैं।जिकड़ी भजन उत्तर प्रदेश के मथुरा, अलीगढ़ और आगरा समेत सम्पूर्ण ब्रज में लोकप्रिय हैं। जिकड़ी में कई बार व्यंग्योक्तियां भी होती हैं जिन्हें फुटकर कहा जाता है।

जिकड़ी एक मंडली भी गाती है और दो मंडली भी। जब दो मंडलियां होती हैं तब उनमें प्रतियोगित हो जाती है। गीतों में ही प्रश्नोत्तर होते हैं। ऐसी होड़ में उत्तर ठीक बैठने पर जीत होती है, और यदि उत्तर ठीक नहीं बैठा तो उसे गाने वाली मंडली की हार हो जाती है। हारी हुई मंडली का जिकड़ी भजन कटा हुआ मान लिया जाता है।

जिकड़ी गाने की एक विशिष्ट शैली है जिसमें चार चौक होते हैं। इसे गाने वालों को रसिया कहा जाता है। जो बोल उठाते हैं उन्हें अगेड़िया और जो उन्हें दुहराते हैं उन्हें पिछेड़िया कहा जाता है। गीतों को जो लम्बा खींचते हैं उन्हें हेकड़ा कहा जाता है।

इसकी शुरूआत गाहे से होती है, जो छह चरणों का होता है।

इस प्रकार जिकड़ी के पांच अंग हुए – गाह्यो, टेक, साखी या फूल, झड़ावन तथा उड़ान या टूटन।

Page last modified on Sunday February 26, 2017 07:32:28 GMT-0000