देश की राजनैतिक स्थिति जिस तेजी से बदल रही है, उसमें अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल करना प्रधानमंत्री के लिए आसान नहीं है। एक बड़ी समस्या तो डीएमके की तरफ से आ रही है, जिसके कोटे के एक मंत्री को पहले से ही हटा दिया गया है और दूसरे मंत्री को हटाने के लिए भी प्रधानमंत्री पर दबाव है। डीएमके की तरफ से दो नए मंत्रियों को वे अगले विस्तार में अपनी सरकार में शामिल कर सकते हैं और दयानिधि मारन का सरकार से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं। नए मंत्रियों को सरकार में शामिल करना तो आसान है, पर श्री मारन को हटाना कठिन, क्योंकि इसके कारण डीएमके प्रमुख करुणानिधि की नाराजगी कांग्रेस और प्रधानमंत्री से बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी।
कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के कारण भी मंत्रिमंडल के विस्तार में बाधा पहुंच रही है। एक कारण तो खुद राहुल गांधी ही हैं। उन्हें सरकार में शामिल करने का निमंत्रण प्रधानमंत्री पहलंे भी दे चुके हैं, लेकिन वे प्रधानमंत्री बनने के साथ ही सरकार में शिरकत करना चाहते हैं। जब मनमोहन सिंह ने 2009 में दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया था, तो माना जा रहा था कि वे 2014 के लोकसभा चुनाव तक देश के प्रधानमंत्री रहेंगे और उसके बाद ही राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन पाएंगे।
पर बाद के घटनाक्रम ने स्थिति बदल दी। लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद कांग्रेस को एक के बाद एक चुनावी झटके लगने लगे। इसके बाद राहुल गांधी के खास समर्थकों ने महसूस किया कि 2014 के चुनाव के बाद कांग्रेस की स्थिति बेहतर होने की अपेक्षा और भी बिगड़ सकती है और तब हो सकता है कि अपने सहयोगियों के साथ भी कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में नहीं रहे। इसलिए, यह मांग उठने लगी कि इसी लोकसभा की कार्य अवधि में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के पद पर बैठा दिया जाए। इस तरह की अफवाहें आगे बढ़तीं, इसके पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रिंट मीडिया के संपादको की बैठक में घोषणा कर दी कि वे अपना कार्यकाल पूरा करेंगे और उन्होंने अपने हाथ में जो टास्क ले रखा है, उसे पूरा करेंगे।
प्रधानमंत्री के उस बयान के बाद राहुल को उनकी जगह प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम लगभग समाप्त हो गई। एक बार फिर प्रधानमंत्री ने यह कह डाला कि देश में प्रधानमंत्री की कोई वैकेंसी नहीं है। उन्होंने यह कहा था कि लालकृष्ण आडवाणी के संदर्भ में, लेकिन राजनैतिक पंडितों ने माना कि उनका इशारा राहुल गांधी और उनके समर्थकों की ओर था। बहरहाल, उसके बाद तो राहुल के समर्थक उनको इसी लोकसभा के कार्यकाल में प्रधानमंत्री बनाने के अभियान में अपने आपको कमजोर पाने लगे।
अब जब देश की राजनैतिक हालत बहुत ही अस्थिर है और मनमोहन सरकार एक के बाद एक झटके खा रही है, राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का अभियान फिर तेज कर दिया गया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह बार बार राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग सार्वजनिक रूप से कर रहे हैं, हालांकि वे इसके साथ मनमोहन सिंह को हटाने की अपनी मांग का भी खंडन कर देते हैं। जाहिर है, वे बहुत ही चालाकी से राहुल गांधी के पक्ष में माहौल बनाने मेे लगे हैं।
सवाल उठता है कि एकाएक राहुल गांधी को जल्द से जल्द प्रधानमंत्री बनाने का यह अभियान क्यों तेज हो गया है? कुछ कांग्रेसी पहले कह रहे थे कि अगले राष्ट्रपति चुनाव के समय मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित करवा दिया जाएगा और उसके बाद खाली हुए प्रधानमंत्री के पद पर राहुल को बैठा दिया जाएगा, हालांकि इस तरह की बात करने वाले इस तथ्य को नकार देते थे कि क्या कांग्रेस अथवा यूपीए अपने बलबूते किसी को राष्ट्रपति बनाने में सक्षम है भी या नही।
इस सवाल को अभी छोड़ भी दिया जाए, तब भी यह सवाल उठता है कि राहुल समर्थक अब राष्ट्रपति चुनाव तक का इंतजार करने के लिए भी तैयार क्यों नहीं हैं? इसका एक जवाब तो उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव है। राष्ट्रपति चुनाव के पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव होना है और वहां राहुल गांधी की निजी प्रतिष्ठा दाव पर लगी है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिली थी। कांग्रेस समाजवादी पार्टी से महज 20 सीटें मांग रही थी। सपा ने जब उसकी यह मांग मानने से इनकार कर दिया तो पार्टी ने लगभग सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए और 22 सीटों पर जीत भी हासिल कर ली। बाद में एक उपचुनाव में जीतकर उत्तर प्रदेश से लोकसभा में अपने सांसदों की संख्या बढ़ाकर 23 कर ली, जो समाजवादी पार्टी की लोकसभा सांसद संख्या के बराबर और बहुजन समाज पार्टी की सांसद संख्या से ज्यादा है। कां्रगेस की उत्तर प्रदेश में उस जीत को राहुल गांधी की निजी जीत मानी गई, क्योंकि श्री गांधी उत्तर प्रदेश में उसके पहले सघन अभियान चला रहे थे और मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी से गठबंधन का विरोध भी कर रहे थे।
जाहिर है उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन राहुल गांधी की प्रतिष्ठा से सीधे रूप में जुड़ा रहेगा। आज 23 लोकसभा सीटों का नेतृत्व वहां कांग्रेसी सांसद कर रहे हैं। एक लोकसभा क्षेत्र के अंदर उत्तर प्रदेश में 5 विधानसभा क्षेत्र हैं। यानी 115 विधानसभा क्षेत्रो मे जीत हासिल कर ही राहुल गांधी अपनी प्रतिष्ठा वहां बचा सकते हैं। लेकिन कांग्रेस की स्थिति वहां इतनी अच्छी नहीं दिखाई पड़ रही है कि वह 100 सीटों तक भी पहुंचने की उम्मीद कर सके। भ्रष्टाचार और महंगाई दो ऐसे मसले हैं, जिनपर कांग्रेस को देश भर में रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ रहा है। राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश अभियान भी इन दो कारणों से कमजोर पड़ गया है। पिछले साल बिहार के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था और राहुल गांधी ने भी उसमें अपने आपको पूरी तरह झोंक दिया था, लेकिन वहां उसे मात्र 4 सीटें ही हासिल हुईं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति बिहार की राजनीति से मिलती जुलती है। अब यदि उत्तर प्रदेश में भी बिहार ने अपने आपको दुहरा दिया, तो फिर राहुल गांधी का क्या होगा? निश्चय तौर पर उनकी प्रतिष्ठा काफी नीचे गिरेगी और यह माना जाएगा कि लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जीत राहुल के कारण नहीं, बल्कि मनमोहन सिंह के कारण हुई थी। शायद यही कारण है कि दिग्विजय सिंह जैसे राहुल समर्थ्रक अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार नहीं करना चाहते। (संवाद)
राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की हड़बड़ी
उत्तर प्रदेश कहीं बिहार न बन जाए?
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-06-27 05:09
मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के विस्तार की प्रतीक्षा बहुत दिनांे से की जा रही है। प्रधानमंत्री ने खुद कहा था कि बजट सत्र की समाप्ति के बाद वे अपनी मंत्रिपरिषद का विस्तार करेंगे और मंत्रालयों का भी फिर से बंटवारा करेगे। कुछ मंत्रियों को हटाए जाने की भी बात की जा रही थी। बजट सत्र कब का समाप्त हो गया है। अब तो मानसून सत्र की तिथि भी घोषित कर दी गई है पर बहुप्रति़िक्षत मंत्रिपरिषद के विस्तार का काम अभी भी लंबित पड़ा है।