भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्री दोनों देशों के रिश्ते सुधारने के लिए बातचीत करने वाले हैं। क्या श्री आडवाणी नेहरू और कश्मीर का यह मसला उठाकर उनकी बातचीत के रंग में भंग करना चाहते हैं? अथवा वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अपने लिए समर्थन हासिल करना चाहते हैं ताकि लोकसभा के आगामी आमचुनाव में उन्हें फिर भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप मे पेश किया जाय?

गौरतलब है कि संध परिवार के दबाव में उन्हें लोकसभा में विपक्ष का पद छोड़ना पड़ा है और एक तरह से अघोषित रूप से यह मान लिया गया है कि वे भाजपा का आने वाले दिनों में औपचारिक रूप से नेतृत्व नहीं करेंगे और उनकी भूमिका अभिभावक की रहेगी, नायक की नहीं। लेकिन लगता है कि अब श्री आडवाणी नायक बनने की ओर बढ़ रहे हैं और चाहते हैं कि 2009 लोकसभा चुनाव में जिस तरह से उन्हें भाजपा और राजग की ओर से प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित किया गया था, उसी तरह 2014 में भी उन्हें दावेदार घोषित किया जाय। इसके लिए आरएसएस का सहमत होना जरूरी है और लगता है कि उसका समर्थन हासिल करने के लिए ही श्री आडवाणी ने नेहरू की कश्मीर नीति से संबंधित उस गड़े मुर्दे को उखाड़ना शुरू कर दिया है, जो संघ परिवार का बेहद प्यारा विषय है।

संघ परिवार कश्मीर को लेकर नेहरू पर आरोप लगता है कि यह मसला उनकी गलत नीतियों की उपज है। यदि आज कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है, तो उसके लिए नेहरू ही जिम्मेदार हैं। उन्हें पूरे कश्मीर को विद्राहियों और पाकिस्तान के कब्जे से खाली करवाना चाहिए था। हमारी सेना उन्हें बाहर खदेड़ भी रही थी, पर नेहरू ने उन्हें वैसा नहीे करने दिया और संयुक्त राष्ट्र जाकर युद्ध विराम घोषित करवा दिया। इस तरह कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में रह गया। फिर नेहरू जी ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए जनमतसंग्रह का प्रस्ताव रख दिया, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। इस तरह कश्मीर मसले पर नेहरूजी ने काफी गड़बड़ी की, जिसके कारण इसका एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है और भारत के हिस्से वाले कश्मीर में भी समस्याएं बनी हुई हैं।

यह सच है कि कश्मीर समस्या पैदा करने में नेहरू का योगदान था, लेकिन नेहरू ने भारत में एक स्थिर लांकतंत्र की बुनियाद भी रखी है और उसके कारण कश्मीर समस्या पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत का पक्ष मजबूत हो गया है। यह तो रही नेहरू जी की बात। सवाल उठता है कि लालकृष्ण आडवाणी का भारत के लिए अपना योगदान क्या रहा है? वे रामरथ यात्रा के लिए जाने जाते हैं। उनका रामरथ सोमनाथ से शुरू हुआ था और अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के रूप् में उसकी परिणति हुई। उससे देश को कितना नुकसान हुआ, उसके बारे में श्री आडवाणी की अपनी क्या राय है?

लालकृष्ण आडवाणी की रामरथ यात्रा से भाजपा को 1990 के दशक के कुछ चुनावों में फायदा भी मिला, लेकिन इसके कारण उसे नुकसान भी हुआ। 6 साल तक केन्द्र में अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार बनी और उस दौरान हिंदुवादियों को भी पता चल गया है कि भाजपा की मंदिर राजनीति महज हिंदू वोट पाने का तरीका है और उसका हिंदू हितों से कोई लेना देना नहीं है। इसके कारण अब भाजपा हिंदुत्व की राजनीति करके सफलता प्राप्त करने में विफल होने लगी। अटल बिहारी वसजपेयी की तरह ज्यादा स्वीकार्यता प्राप्त करने के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने भी कोशिशें शुरू कर दीं, जिसके तहत उनका जिन्ना वाला बयान आया था। हालांकि उसके कारण संघ परिवार उनसे नाराज हो गया और वे राजनीति के बियावान में जाते दिखाई दी। पर अप्रत्यशित रूप से 2009 के चुनाव के पहले पार्टी की बागडोर फिर उनके हाथ में थमा दी गई।

अब आडवाणी की नजर 2014 के लोकसभा चुनाव पर है। कश्मीर जैसे मसले को उठाकर वे संध का समर्थन हासिल करना चाहते हैं और घर्म की राजनीति में पिछले कुछ चुनावों से विफल रहने के बाद लगता है कि भाजपा एक बार फिर उसी रास्ते पर बढ़ना चाह रही है। श्री आडवाणी इसे समझ रहे हैं और एक बार फिर खुद भी उसी रास्ते पर चलना चाह रहे हैं, जिसे उन्होंने अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए कुछ समय के लिए स्थगित कर रखा था। (संवाद)