सवाल उठता है कि विपक्षी पार्टियां चुनाव के इतने कम दिनों के बाद ही सरकार के खिलाफ आंदोलन करने के मूड में क्यों आ गई है? इसका जवाब पाना कठिन नहीं है। आज भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में लोग आंदोलत हो रहे हैं और केरल में भी यह एक बड़ा मुद्दा है। इस माहौल में राज्य सरकार द्वारा अपने तीन मंत्रियों के खिलाफ जांचसे जुड़े अधिकारियों का तबादला करना एक बड़ा मुद्दा बन गया है।

केरल के तीन मंत्रियों के खिलाफ जांच चल रही है। यह जांच पिछले दिनों हुए चुनाव के बाद उनके मंत्री बनने के पहले से ही चल रही थी। लोगों को उम्मीद थी कि मंत्री बनाए जाने के बावजूद मुख्यमंत्री उन तीनों के खिलाफ जांच को जारी रखेंगै। उन्होंने कुछ वैसा ही करने का वायदा भी किया था। यह कहना गलत होगा कि उन मंत्रियों के खिलाफ जांच की कार्रवाई औपचारिक रूप से रोक दी गई है। लेकिन सच यह भी है कि जो अधिकारी जांच कर रहे थे, उनका तबादला कर दिया गया है। उन तबादलों से जांच पर असर पड़ना लाजिमी है। लिहाजा, इसे लेकर विपक्षी पार्टियां सरकार को जनता के बीच बेनकाब करना चाह रही है और इसके लिए वह राज्य सरकार के गठन के 6 महीने पूरे होने का इंतजार भी नहीं करना चाहती।

आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जा रही है। विपक्षी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता अपने आंदोलन को राज्य सरकार की जन विरोधी नीतियों को निशाना बनाते हुए चलाएंगे। सीपीएएम सचिवालय और विपक्ष के नेता वीएस अच्युतानंदन की ओर से जो बयान जारी किए गए हैं, वे बहुत ही तीखे हैं।

अधिकारियों के तबादलों के अलावा निजी मेडिकल कॉलेज के प्रबंधन के प्रति राज्य सरकार की नीति को भी निशाना बनाया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि राज्य सरकार ने उन कॉलेजों के प्रबंधन के सामने पूरी तरह आत्मसर्पण कर दिया है और उसके कारण विद्यार्थियों के दाखिले में कॉलेज प्रबंधन की मनमानी चल रही है।

विधानसभा का सत्र भी शुरू हो गया है। यह सत्र दो सप्ताह के लिए है। राजनैतिक ताप इस सत्र को भी प्रभावित करेगी। इसी बीच केरल हाईकोर्ट के एक आदेश ने भी विपक्ष को सरकार पर प्रहार करने के लिए एक हथियार उपलब्ध करा दिया है। वह आदेश आदिवासियों की जमीन के एक टुकड़े से संबंधित है। आदेश में यूडीएफ की घटक सोशलिस्ट जनता पार्टी (डेमोक्रेटिक) के विधायक श्रेयांस कुमार के कब्जे वाले 14 एकड़ के एक भूखंड को आदिवासियों के बीच बांटने को कहा गया है। (संवाद)