विपक्षी पार्टियों ने ही नहीं, बल्कि टीएमसी और एनसीपी जैसी यूपीए की पार्टियों ने भी केन्द्र सरकार द्वारा की गई इस मूल्य वृद्धि का विरोध किया है। आनेवाले मानसून सत्र में संसद में इस मसले पर भारी हंगामा होगा। विपक्ष को यदि किसी विषय पर सबसे ज्यादा हंगामा करना चाहिए, तो वह मूल्य वृद्धि के मसले पर ही होना चाहिए, क्योंकि महंगाई से आम लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं। यदि अन्ना हजारें और रामदेव इस मसले पर आंदोलन करते हैं, तो लोगों द्वारा उन्हें मिल रहा समर्थन और भी बढ़ जाएगा।

विख्यात अर्थशास्त्री डॉक्टर आर रंगराजन, जो प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष भी है, का मानना है कि मुद्रास्फीति की दर जल्द ही 10 फीसदी से ऊपर हो जाएगी, पर यह मार्च 2012 तक घटकर साढ़े 6 फीसदी तक आ जाएगी। उनका यह अनुमान सही है, तब भी मुद्रास्फीति की दर नीचे आने के पहले लोगों का भारी नुकसान तो हो चुका होगा।

केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार और कांग्रेस पार्टी के लिए स्थिति बहुत विस्फोटक होती जा रही है। देश की आर्थिक विकास दर साढ़़े आठ फीसदी होने का दावा किया जा रहा है। इसके बावजूद अर्थतंत्र की हालत खस्ता है। विदेशी मुद्रा निवेश में कमी आ रही है और औद्योगिक विकास दर भी चिंताजनक रूप ले रही है। राजकोषीय घाटा भी अनियंत्रित होता जा रहा है। टैक्स से होने वाला राजस्व उम्मीद के अनुसार नहीं बढ़ पा रहे हैं।

बढ़ती महंगाई के लिए कांग्रेस को जिम्मेदारी लेनी होगी। उसे यह लोगों को समझाना होगा कि कीमतें क्यों बढ़ रही है और उसकी सरकार इन्हें रोकने मे क्यों विफल हो रही है। पर आज हालत विपरीत हो रहे हैं। कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं को भी यह समझ में नहीं आ रहा है कि वे लोगों को क्या समझाएं।

आखिर सरकार को तेल उत्पादों की कीमतों को बढ़ाने का यह फैसला क्यों करना पड़ा? तेल मंत्री एस जयपाल रेड्डी का कहना है कि सरकार की तेल कंपनियों का घाटा बढ़ता जा रहा था और इस घाटा को सहने की उनमें क्षमता नहीं था। वे बताते हैं कि सरकार डीजल, किरासन तेल और रसोई गैस पर कितना सब्सिडी देती है। वे यह भी बताते हैं कि उनकी कीमतों में की गई ताजा वृद्धि के बाद भी उन पर कितनी सब्सिडी दी जा रही है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी कह रही है कि केन्द्र सरकार तेल उत्पादों पर टैक्स लगाकर 1 लाख 35 हजार करोड़ रुपए का राजस्व उगाही करती है, जबकि उसके द्वारा दी जा रही सब्सिडी मात्र 50 हजार करोड़ रुपए ही है।

जब भी तेल उत्पादों की कीमतें बढ़ती हैं, तो उन पर हमेशा हंगामा करने से कोई फायदा नहीं है। हमेशा एक ही किस्म के आरोप लगाए जाते हैं और सफाई में वही बात दुहराई जाती है। यहां असली सवाल यह है कि तेल के मामले में सबकुछ पारदर्शी बना दिया जाना चाहिए। लोगों को यह जानकारी दी जानी चाहिए कि तेल का अर्थशास्त्र क्या है? कितना देश में इसका उत्पादन होता है कितना विदेशों से मंगाया जाता है। तेल से केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को टैक्स के रूप में कितनी आमदनी होती है। तेल की कंपनियां किस तरह से काम करती हैं और कच्चे तेल के शोधन में कितना खर्च होता है। यानी तेल को लेकर किसी के सामने किसी प्रकार का रहस्य नहीं रहे, सरकार को इसे सुनिश्वित करना चाहिए।

इसके साथ साथ ही सरकार को एक तेल और परिवहन से जुड़ी संयुक्त नीति भी बनानी चाहिए। तेल की समस्या को हल करने के लिए तेल की घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के साथ साथ मांग में कमी करने अथवा मांग में हो रही वृद्धि को कम करने की भी कोशिश की जानी चाहिए। बड़ी बड़ी विलासितावादी गाड़ियों के परिचालन पर रोक लगाई जानी चाहिए और बिजली से चलने वाली गाड़ियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। (संवाद)