सबसे पहले तेलंगाना के मसले को ले लें। वहां आज तूफान मचा हुआ है। विधायकों और सांसदों के इस्तीफे के बाद पूरे क्षेत्र में भूचाल आया हुआ है। आज जिस संकट में वहां कांग्रेस व केन्द्र सरकार अपने आपको पा रही है, उसके लिए खुद कांग्रेस के नेता ही जिम्मेदार हैं। के चंद्रशेखर राव की भुख हड़ताल के दबाव में आकर केन्द्रीय गृहमंत्री ने बिना आगे पीछे सोचे पृथक तेलंगाना राज्य की माग को स्वीकार करने की घोषणा कर दी और रातों रात कह डाला कि नये राज्य का गठन कर दिया जाएगा। बाद में जब उसे पता चला कि अलग राज्य का गठन आसान नहीं है, तो फिर उसने राज्य के गठन पर टालमटोल करना शुरू कर दिया। श्रीकृष्णा आयांग का गठन करके उसने अपने कुछ समय तो खरीद लिया, लेकिन कभी न कभी तो उसे उस स्थिति का सामना करना ही था, जिस स्थिति का सामना वह आज कर रही है।

यदि पी चिदंबरम ने अलग राज्य बनाने की घोषणा के पहले सोच विचार किया होता, तो वह स्थिति आज पैदा नहीं होती। सच कहा जाय, तो 2009 में हुए विधानसभा व लोकसभा चुनाव में टीआरएस के नेता के चंद्रशेखर राव बहुत कमजोर हो गए थे। कांग्रेस ने वहां दूसरी बार लगातार सत्ता पर कब्जा कर लिया था। राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में कांग्रेस को वहां जबर्दरूत जीत हासिल हुई थी और श्री राव की टीआरएस को मात्र 10 सीटों पर ही विजय मिली थी। अलग राज्य की मांग करने वाले नेता की हालत खस्ता थी। उनके पांव के नीचे से जमीन खिसक रही थी और अपनी जमीन को बचाए रखने के लिए ही उन्होंने अलग राज्य की मांग करते हुए आमरण अनशन की घोषणा कर दी थी।

वे अनशन पर भी बैठे। उनके अनशन को समर्थन भी मिल रहा था। दुर्भाग्य से उस समय राज्य में राजशेखर रेड्डी जैसा कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं था। दिसंबर में वह अनशन हो रहा था और सितंबर महीने में ही उनकी एक दुर्घटना में मौत हो गई थी। केन्द्र और राज्य सरकार यह समझ नहीं पाई कि चंद्रशेखर राव के अनशन का सामना किस तरह किया जाय और गृहमंत्री ने आनन फानन में अलग राज्य के गठन की घोषणा कर दी और चंद्रशेखर राव को वहां का एक बड़ा हीरो बना दिया।

जिस तरह की गलती के चंद्रशेखर राव के अनशन के मामले में केन्द्र सरकार ने की थी, उसी तरह की गलती अन्ना हजारे के अनशन के समय भी उसने की। उसने अन्ना की सभी मांग मान ली और उनके अनशन तोड़ने के पहले ही उनके बताए 5 लोगों को लोकपाल विधेयक तैयार करने वाली एक समिति में शामिल कर लिया। बाद में उस समिति के साथ वैसा ही किया गया, जैसा तेलंगाना राज्य की मांग के साथ किया गया।

तेलंगाना की तरह ही लोकपाल के मसले पर भी केन्द्र सरकार और कांग्रेस फंस गई है। अब अन्य राजनैतिक दलों का साथ लेकर वह अन्ना और उनकी टीम के लोगों को काटने की सोच रही है। इसमें उसे शायद कुछ सफलता भी मिल रही है, लेकिन लोकपाल के मसले पर अन्ना नहीं तो फिर विपक्ष के दबाव का शिकार उसे होना ही है। अन्ना को दबाकर इस मसले पर सरकार अपनी मनमानी नहीं कर सकती, क्योंकि उसने जिस विपक्ष का साथ अन्ना से छुटकारा पाने के लिए लिया है, अब वही विपक्ष उससे उसकी कीमत मांगेगा।

सवाल उठता है कि लोकपाल और अन्ना के मसले पर फंसने की गलती केन्द्र सरकार ने क्यों कर दी? अनशन की राजनीति हमारे देश के लिए कोई नई चीज नहीं है। मणिपुर में शर्मिला पिछले 10 सालों से अनशन कर रही हैं। उन्हें नली के द्वारा सरकार जबर्दस्ती खाना खिला रही है। यदि चंद्रशेखर राव अथवा अन्ना के मरने का डर केन्द्र सरकार को हो गया था, तो उसी तरह जबर्दस्ती खाना खिलाकर उन्हें मरने से रोका जा सकता था। अन्य राजनैतिक तरीके थे, जिनसे मामले को सुलझाया जा सकता था, पर केन्द्र सरकार तो सीघे सीघे उनके दबाव में आ गई। मांग मान लेने के बाद फिर उनसे पीछे हटने की उसकी यह नीति अब उसे परेशान कर रही है। (संवाद)