इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस तरीके से काम कर रही हैं, उसमें खामियां हैं। विपक्ष की नेता के रूप में वे हमेशा भीड़ को पसंद करती रही हैं। वे वहां जाती रही हैं, जहां भीड़ हुआ करती हैं और वह जहां जाती हैं, वहां खुद भी भीड़ खड़ी कर देती हैं। भीड़ के साथ उनका गहरा लगाव रहा है। सच कहा जाय, तो वे आज सत्ता में भीड़ की बदौलत ही आई हैं।

मुख्यमंत्री का भीड़ से लगाव अथवा मोह अभी भी खत्म नहीं हुआ है। एक विपक्षी नेता के रूप में भीड़ का उनके लिए महत्व था, लेकिन सत्ता में आकर भी वे भीड़ से लगाव रखती हैं और उनकी कार्यशैली पर भीड़तंत्र का प्रभाव देखा जा सकता हैं। वह भीड़ के सामने अधिकारियो से सवाल पूछती हैं और भीड़ के सामने ही अपना फैसला सुना देती हैं। भीड़ के सामने ही किसी समस्या के समाधान के लिए आनन फानन में कमिटी के गठन की घोषणा कर देती हैं।

उनका यह तरीका काम नहीं कर रहा है। उन्होंने अनेक मंत्रालय अपने पास रखे हुए हैं, जिनमें स्वास्थ्य मंत्रालय भी शामिल है। सरकार के अस्पतालों की दशा को सुधारने के लिए ममता ने सत्ता में आने के बाद ही अपनी सक्रियता बढ़ा दी थीं। अस्पतालों का औचक निरीक्षण शुरू कर दिया। बिना बताए वह कहीं भी पहुंच जाती थीं। इससे अस्पतालों में हड़कंप मच गया। डाक्टर तथा अन्य कर्मचारी पहले से ज्यादा सतर्क दिखाई पड़ने लगे। लोगों को लगा कि सरकारी अस्पतालों की सुस्ती अब समाप्त होगी और लोगों को बेहतर मेडिकल सेवा प्राप्त होगी। लेकिन पिछले दिनों सरकारी अस्पतालों की विफलताओं के जो मामले आए हैं, वे चिंता करने वाले हैं। इससे सरकारी अस्पताल कुख्यात तो हो ही रहे हैं, उनमें काम करने वाले डॉकटरों व अन्य कर्मचारियों की सुरक्षा को भी खतरा पैदा हो गया है।

अस्पतालों में बच्चों की मौत की खबरें आई। डॉक्टरों पर हमले की खबरें भी आ रही है। कोई एक घटना नहीं, बल्कि हमले की अनेक घटनाएं सामने आई हैं और उन घटनाओं में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेसे के स्थानीय नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं। तरह तरह से डाक्टरों को प्रताड़ित किया जा रहा है। एक जगह तो उन्हें रात भी अस्पताल से बाहर एक पेड़ के नीचे खड़ा रखा गया। एक जगह उन्हें अस्पताल का वही घटिया खाना जबर्दस्ती खिलाया गया, जो अस्पतालों के मरीजों को खिलाया जा रहा था। उनके साथ मारपीट की घटनाएं भी सामने आ रही हैं।

इस तरह यदि डॉक्टरों पर हमले हुए, तो राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर नहीं, बल्कि बद से बदतर होती चली जाएंगी। कुछ डाक्टरों ने तो इसके कारण अपना इस्तीफा भी दे दिया है। एक अस्पताल के निदेशक को मुख्यमंत्री ने मात्र इसीलिए निलंबित कर दिया कि मीडिया के सामने उसने मुख्यमंत्री के सवाल का जवाब दे दिया था। निदेशक का कहना था कि यदि वे हमेशा डॉक्टरो के सिर पर सवार रहें, तो उनका कामकाज प्रभावित होगा। दिलचस्प बात यह है कि एक बार मुख्यमंत्री ने भी इसी तरह की बात की। उन्होंने कहा कि जिस अस्पताल में बच्चों के मरने की खबर आ रही थी, यदि वे वहां भागी भागी जाती, तो उनके पीछे मीडिया वाले भी आ जाते। उनके वे मीडिया वालों के अस्पताल में भीड़ लगाने से वहां का काम प्रभावित ही होता।

यानी जो बात मुख्यमंत्री ने कहा वही बांगर इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर ने भी कहा था, लेकिन मुख्यमंत्री से जुबान लड़ाने की सजा के तौर पर ममता बनर्जी ने उन्हें निलंबित ही कर दिया। इस तरह से राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर तो नहीें ही किया जा सकता। (संवाद)