99 विधायकों और 11 सांसदों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसके कारण आंध्र प्रदेश में ही नहीं, बल्कि केन्द्र में भी सांवैधानिक संकट पैदा होने की आशंका बन रही है। 11 सांसदों के इस्तीफे के कारण केन्द्र सरकार और भी अल्पमत में चली जाएगी। इस्तीफों का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है। सच कहा जाए तो अलग राज्य के मसले पर तेलंगाना की सभी पार्टियां एक मत हैं।

आखिर इस्तीफों का यह दौर शुरू क्यों हुआ? इसके लिए दो कारण जिम्मेदार हैं। एक कारण तो यह है कि इस क्षेत्र के लोगों को विधायकों और सांसदों पर जबर्दस्त दबाव हैं। उस दबाव के कारण सांसद और विधायक अपने घर से बाहर पैर रखने मे भी घबराते थे। जनता चाहती थी कि प्रतिनिधि अपने पदों से इस्तीफा दे दें। दूसरा कारण यह है कि लोगों के बीच यह बात फेली कि तेलंगाना को एक पैकेज देने की तैयारी चल रही है, जिसके तहत उपमुख्यमंत्री का पद इस क्षेत्र के किसी विधायक के लिए तय हो जाएगा और इस क्षेत्र से आने वाले मंत्रियों की संख्या भी तय हो जाएगी। इसके अलावा क्षेत्र के विकास के लिए आर्थिक पैकेज की बात भी सुनाई पड़ रही थी। यहां के लोग और नेता किसी प्रकार के पैकेज में दिलचस्पी नहीं रखते, बल्कि एक अलग प्रदेश चाहते हैं, इसलिए किसी प्रकार के पैकेज मिलने के पहले ही विधायक और सांसद अपने अपने पदों से इस्तीफा देने लगे।

सरकार के पास विकल्प बहुत सीमित हैं। एक विकल्प तो अलग तेलंगाना राज्य का गठन कर देना है। पर यह विकल्प आसान नहीं है। इसका कारण यह है कि शेष आंध्र प्रदेश के लोग अलग राज्य का भारी विरोध कर रहे हैं। वे राज्य को एकीकृत रखना चाहते हैं। यदि केन्द्र सरकार ने अलग राज्य के गठन का फेसला कर भी लिया, तो सवाल उठेगा कि हैदराबाद कहां जाए? हैदराबाद तेलंगाना क्षेत्र में पड़ता है। जाहिर है तेलंगाना के लोग इसे अपने राज्य में रखना चाहेंगे और इसे ही अपनी राजधानी बनाकर रखना चाहेंगे। दूसरी तरफ शेष आंध्र के लोग इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे कि हैदराबाद उनके राज्य के पास नहीं रहे, क्योंकि उन्होंने यहां काफी निवेश कर रखा है और इस महानगर की समृद्धि में उनका भी योगदान है। जाहिर हैण् हैदराबाद प्रतिष्ठा का एक ऐसा सवाल बनकर उभरेगा, जिसका हल शायद ही किसी के पास हो।

एक दूसरा विकल्प यह है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर दी जाए और राज्य विधानसभा को निलंबित कर दिया जाए। विधानसभा के निलंबित रहने के कारण इस्तीफा देने वाले विधायको का इस्तीफा स्वीकार करने का मामला भी पेंडिंग पड़ा रहेगा। ज्यदा उम्मीद है कि केन्द्र सरकार इस दूसरे विकल्प को ही अपनाएगी। वैसे उसके पास एक तीसरा विकल्प भी है और वह विकल्प है एक राज्य पुनर्गठन आयोग के गठन का। लेकिन यह विकल्प लोगों के बीच और भी आक्रोश पैदा करेगा, क्योंकि पहले ही श्रीकुष्ण आयोग का गठन कर केन्द्र सरकार ने मामले को टालने की कोशिश की थी। लोग कितने आयोग को बर्दाश्त करेंगे?

अबतक तो तेलंगाना का संकट राज्य तक ही सीमित था, पर अब केन्द्र की यूपीए सरकार की स्थिरता भी इसकी गिरफ्त में आ गई है। राज्य के 11 कांग्रेसी सांसदों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इनमें 9 तो लोकसभा के सांसद हैं। कांग्रेस हालांकि कह रही है कि उनके इस्तीफे के कारण उनकी केन्द्र सरकार पर कोई खतरा नहीं पैदा होगा। वे कोशिश कर रहे हैं कि उन सांसदों का इस्तीफा स्वीकार ही नहीं हो और उन्हें समय रहते अपनी सदस्यता बरकरार रखने के लिए तैयार कर लिया जाए।

फिलहाल कांग्रेस को थोड़ा समय लि गया है, क्योंकि आंध्र विधानसभा और लोकसभा के अध्यक्षो ने इस्तीफों पर फैसला लेने में जल्दबाजी नहीं दिखाने का संकेत दिया है। आंध्र प्रदेश के स्पीकर तो विदेश गए हुए हैं और लोकसभा स्पकीर मीरा कुमार को भी इस्तीफा पर फैसला लेने में कोई हड़बड़ी नहीं है। लेकिन समस्या गंभीरतर होती जा रही है, क्योंकि आंदोलन में अराजकतावादी तत्व कभी भी शामिल हो सकते हैं और राज्य में अराजकता फेल सकती है। (संवाद)