पी चिदंबरम ही नहीं, वर्तमान संचार मंत्री कचिल सिब्बल और कंपनी मामलों के मंत्री मुरली देवड़ा तक संचार घोटाले में शामिल दिखाई पड़ने लगे हैं। दिलचस्प बात यह है कि कपिल सिब्बल को संचार मंत्रालय ए राजा के इस्तीफे के बाद मिला था और उनपर घोटाला करने का जो आरोप है वह उनके मंत्री बनने के बाद का आरोप है। उसी तरह मुरली देवड़ा पर भी संचार घोटाले में लिप्त एक कंपनी को बचाने के लिए कंपनी मंत्री के रूप में अपने पद के बेजा इस्तेमाल का आरोप है।

सबसे पहले पी चिदंबरम की बात करें। जब ए राजा के समय संचार का 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ था, तो वे उस समय वित्त मंत्री थे। वित्त मंत्री की भूमिका 2 जी स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने मे अहम थी। पहले श्री चिदंबरम ने कहा था कि 2 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी होनी चाहिए। यदि नीलामी होती, तो शायद इतना बड़ा घोटाला नहीं होता और भी 2 लाख करोड़ रूपए के राजस्व का भी नुकसान नहीं होता। पर उसके बाद उन्होंने भी 2001 की कीमत पर 2 जी स्पेक्ट्रम को बेचने की इजाजत दे दी और वह भी पहले आओ और पहले पाओ की नीति के तहत। जाहिर है, शुरुआती आपत्ति दबाव डालने का एक महज ड्रामा था और बाद में अपना हिस्सा तय करने के बाद पी चिदंबरम भी उस लूट में शामिल हो गए थे। यह नहीं कहा जा सकता कि उनके इस लूट में शामिल होने की यह बात महज अटकलबाजी है। राडिया टेप्स में पी चिदंबरम के खिलाफ सबूत छिपे हुए हैं। बातचीत के एक टेप में ए राजा राडिया से कह रहे होते हैं कि पी चिदंबरम ने भी 2 जी स्पेक्ट्रम की बिक्री में बहुत पैसे खाए हैं।

एक अंग्रेजी साप्ताहिक संडे गार्जियन ने उस टेप की बातचीत को प्रकाशित किया है। बाद में रिलायंस कंपनी का एक मैनेजर के आर राजा उसमें अपनी आवाज शामिल होने का दावा करते हुए पी चिदंबरम से माफी मांगता है कि उसने राडिया के साथ बातचीत में गलतबयानी की थी। लेकिन संडे गार्जियन यह मानने को तैयार नहीं है कि वह आवाज ए राजा की नहीं, बल्कि किसी और राजा की है, क्योंकि वह बातचीत सीबीआई के पास जो दस्तावेज है, उसमें मौजूद है। सीबीआई ने संसद की लोक लेखा समिति में वे दस्तावेज जमा भी करवाया है। उसमें सीबीआई ने यह नहीं कहा है कि वह आवाज रिलायंस कंपनी के किसी मैनेजर की है, बल्कि सीबीआई ने टेप के साथ जो अपनी रिपार्ट दी है, उसमें ए राजा की आवाज होने का ही जिक्र है।

सवाल उठता है कि एक मंत्री जब कह रहा हो कि वित्त मंत्री ने किसी काम में घूस खाया है, तो उसे हल्के से कैसे लिया जा सकता? एक बार तो हवाला कारोबारी सुरेन्द्र जैन की एक डायरी में लिखे राजनेताओं के नाम पर ही उन पर मुकदमा चला दिया गया था। फिर तो यहां एक मंत्री दूसरे मंत्री के बारे में घूस खाने की बात कर रहा है। जो मंत्री कह रहा है, वह जेल में है और जिसके बारे मे कहा जा रहा है, वह अभी भी सरकार में एक शक्तिशाली मंत्रालय का नेतृत्व कर रहा है। यह कैसे हो सकता है?

चिदंबरम पर सिर्फ 2 जी घोटाले मेे शामिल होने का ही आरोप नहीं है, बल्कि केजी (कृष्णा गोदावरी) गैस बेसिन घोटाले मे भी सरकारी खजाने को लाखों करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने का आरोप है। उस घोटाले की जांच होनी अभी बाकी है। संसद के अगले सत्र में जब उससे संबंधित कैग की रिपोर्ट सदन में रखी जाएगी, तब वह मामला गर्म होगा और देश को पता लगेगा कि केजी गैस बेसिन में हुए घोटाले में देश को कितने लाख करोड़ का नुकसान हुआ। उस घोटाले में पी चिदंबरम के अलावा तब के पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा के शामिल होने की भी बात सामने आ रही है।

मुरली देवड़ा अभी कंपनी मामलों के मंत्री हैं। इस मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कथित तौर पर शामिल एक कंपनी को फायदा पहंुचाने का आरोप है। वह कंपनी है एस्सार और आरोप है कि उसने लूप्स नाम की एक कंपनी खड़ी कर 2 जी स्पेक्ट्रम की लूट में अपने आपको शामिल किया। उसे बचाने के लिए मुरली देवड़ा अब कंपनी मंत्री के रूप में अपनी हैसियत का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि लूप्स में एस्सार का मात्र दो फीसदी हिस्सा है। जब सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है, तो फिर मुरली देवड़ा को उसकी जांच प्रभावित करने की जरूरत क्यों आ पड़ी? जाहिर है, जांच को गलत तरीके से प्रभावित करने और शायद गलत जानकारी देने के कारण वे भी 2 जी स्पेक्ट्रम जांच के दायरे में आ गए हैं।

2 जी स्पेक्ट्रम जांच के दायरे में अब कपिल सिब्बल भी आ गए दिखाई देते हैं। यह बात तो पुरानी पड़ गई है कि उन्होंने ए राजा का बचाव करते हुए कहा था कि 2 जी स्पेक्ट्रम की बिक्री में केन्द्र सरकार को कोई नुकसान हुआ ही नहीं। उस बयान के कारण वे हंसी के पात्र तो बन ही गए थे, अब उनपर खुद संचार घोटाले में शामिल होने का आरोप लग गया है। यह आरोप लगाया है वकील प्रशांत भूषण ने। उनका कहना है कि 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में ही अनिल अंबानी की कंपनी को 650 करोड़ रुपए का जुर्माना देना था। कपिल सिब्बल ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए उनसे सिर्फ 5 करोड़ रुपए का जुर्माना वसूलना ही मुनासिब समझा। अब कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि जुर्माना 650 करोड़ नहीं, बल्कि सिर्फ 50 करोड़ ही बनता था। यदि उनकी बात मान लें तो फिर भी उनके पास इस सवाल का क्या जवाब होगा कि उन्होंने महज 5 करोड़ रूपए का जुर्माना वसूलना ही मुनासिब क्यों समझा?

यानी अब मनमोहन सरकार के तीन कांगेसी मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिर गए हैं और जो तथ्य आ रहे हैं, उनके कारण वे दोषी दिखाई पड़ रहे हैं। सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री उन्हें अपने मंत्रिमंडल से कब हटाएंगे और उनके खिलाफ मुकदमा कब चलेगा? (संवाद)